हमारे भारतीय संस्कृति में त्यौहार केवल आस्था के लिए ही नहीं जाने जाते, अपितु ये जीवन के मूल्यों, पर्यावरण के प्रति सम्मान और मानवीय रिश्तों कोे सशक्त बनाने के माध्यम हैं।
इस वर्ष 29 जून को मनाया जाने वाला वट पूर्णिमा पर्व सनातन परंपरा के उस अटूट विश्वास का प्रतीक है, जहां एक पत्नी का समर्पण मृत्यु के देवता यमराज को भी झुकने पर विवश कर देता है।
इस वर्ष का वट पूर्णिमा व्रत पंचांगीय गणना के दृष्टिकोण से भी अतिविशेष है। ज्येष्ठ अधिकमास होने के कारण इस बार वट सावित्री (अमावस्या) और वट पूर्णिमा के बीच लगभग 45 दिनों का एक लंबा अंतराल देखने को मिला है। उदयातिथि के अनुसार, सोमवार और पूर्णिमा का पावन संयोग सुहागिन महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य का वरदान लेकर आया है।
वट पूर्णिमा मुख्य रूप से सती सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा से प्रेरित है। सावित्री ने अपने अथक संकल्प, बुद्धिमत्ता और पातिव्रत्य धर्म के बल पर बरगद के वृक्ष के नीचे ही यमराज से अपने पति के प्राण वापस मांगे थे। आज के आधुनिक युग में भी, जब रिश्तों की परिभाषाएं बदल रही हैं, यह पर्व वैवाहिक जीवन में आपसी सामंजस्य, त्याग और एक-दूसरे के प्रति अगाध प्रेम की याद दिलाता है। सुहागिनें इस दिन अपने पति की दीघार्यु और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
पर्यावरण संरक्षण का संदेश
इस पर्व का एक और सबसे खूबसूरत और प्रासंगिक पहलू है—प्रकृति की आराधना। वट यानी बरगद का वृक्ष हमारी प्रकृति का एक ऐसा अनमोल उपहार है, जो सबसे अधिक ऑक्सीजन देता है और सदियों तक जीवित रहता है। भारतीय ऋषियों ने इस वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास मानकर इसकी महत्ता को रेखांकित किया है। आज जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण असंतुलन के संकट से जूझ रही है, तब महिलाओं के द्वारा बरगद के वृक्ष की परिक्रमा करना, उसे सूत का धागा बांधना और जल सींचना यह संदेश देता है कि प्रकृति की रक्षा में ही मानवजीवन की रक्षा निहित है। यह पर्व प्राचीनकाल से चली आ रही हमारी पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। सामाजिक समरसता और आधुनिक सरोकार बदलते दौर में इस त्योहार का स्वरूप भी व्यापक हुआ है।
वट पूर्णिमा का यह पावन दिन हमें याद दिलाता है कि हमारी जड़ें कितनी गहरी और समृद्ध हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि आत्मबल और संकल्प से विपरीत परिस्थितियों को भी बदला जा सकता है। आइए, इस वट पूर्णिमा पर हम न केवल अपने परिवार की खुशहाली की कामना करें, बल्कि अपनी धरती माँ को भी हरा-भरा रखने का सच्चा संकल्प लें, ताकि परंपरा और प्रगति का यह चक्र अविरल चलता रहे।




























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