तीन साल में एक बार आने वाले पावन अधिमास (पुरुषोत्तम मास) का समापन 15 जून को हो रहा है। भारतीय कालगणना (पंचांग) में सौर वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच के 11 दिनों के अंतर को पाटने के लिए बनाया गया यह ‘अतिरिक्त समय’ केवल खगोलीय संतुलन का साधन नहीं है, बल्कि यह हमारी व्यस्त जीवनशैली को अध्यात्म की ओर मोड़ने की एक अनूठी व्यवस्था है। खगोलीय विज्ञान और अध्यात्म का अद्भुत मेल सनातन परंपरा में समय को केवल अंकों में नहीं, बल्कि चेतना के स्तर पर मापा जाता है। विज्ञान के दृष्टिकोण से, जहाँ यह महीना ऋतु चक्र और कैलेंडर को सटीक बनाए रखने का माध्यम है, वहीं धार्मिक दृष्टिकोण से यह समय भौतिक इच्छाओं से दूर हटकर अंतमुर्खी होने का काल था।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जिस चंद्र मास में सूर्य की संक्रांति (राशि परिवर्तन) नहीं होती, उसे मलमास या अधिमास कहा जाता है। भगवान विष्णु ने इस उपेक्षित माने जाने वाले महीने को अपना नाम ‘पुरुषोत्तम’ देकर इसे सर्वश्रेष्ठ बना दिया था।
एक माह की अंतर्यात्रा का निष्कर्ष
बीते एक महीने में विवाह, गृह प्रवेश और नए व्यापार जैसे सांसारिक कार्यों पर लगे विराम का एक गहरा मनोवैज्ञानिक और सामाजिक महत्त्व है। इस अवधि में समाज ने सात्विक जीवनशैली को अपनाया, लोगों ने तामसिक आदतों को छोड़कर खान-पान और विचारों में शुद्धता लाने का प्रयास किया और परोपकार की मंशा को चरितार्थ किया, इससे समाज में सहानुभूति का माहौल बना। इतना ही नहीं, भागदौड़ की जिन्दगी से थोड़ा समय निकालकर लोगों ने स्वाध्याय, ध्यान-साधना के माध्यम से मानसिक तनाव को शांत किया।
समापन का संदेश: 15 जून को इस विशेष कालखंड की समाप्ति के साथ ही जीवन अपनी पुरानी लय में लौटेगा, लेकिन इस समापन का अर्थ यह कतई नहीं है कि आध्यात्मिक अनुशासन को यहीं छोड़ दिया जाए। अधिमास का असली उद्देश्य ही यही था कि हम इन 30 दिनों में अपनी ‘आंतरिक ऊर्जा की बैटरी’ को रिचार्ज करें और अब उस संचित सकारात्मक ऊर्जा के साथ अपने व्यावहारिक संसार और कर्म-क्षेत्र में वापस लौटें। इस महीने जो आत्मसंयम, परोपकार की भावना और मानसिक शांति हमें मिली है, उसे अपने दैनिक व्यवहार और निर्णयों का हिस्सा बनाना ही इस पुरुषोत्तम मास की सच्ची सार्थकता होगी। 15 जून की यह तिथि केवल पुरुषोत्तम महीने का अंत नहीं, बल्कि एक शुद्ध, अनुशासित और ऊर्र्जावान दृष्टिकोण के साथ कर्मपथ पर बढ़ने का संदेश प्रदान करती है।




























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