सभी पाठकों, ‘माँ’ के भक्तों और योग साधकों को जय माता की, जय गुरुवर की!
मेरे जीवन का यह एक बड़ा सौभाग्य है कि धर्मसम्राट् युग चेतना पुरुष सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के पास बैठकर मुझे योग की इस पुस्तक को तथा उनके निर्देशनों एवं विचारों को लिखने का अवसर प्राप्त हुआ। मुझे यह पहली पुस्तक लिखने का सुअवसर गुरुदेव जी ने प्रदान किया है, इसलिए यह और भी महत्त्वपूर्ण है।
गुरुदेव जी ने योग की इस पुस्तक में जीवनोपयोगी आसनों को व उसके साथ ही अष्टांग योग एवं अन्य महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं पर अपने विचार लिखवाये हैं। इसी अंतराल में योग-ध्यान-साधना की कुछ गूढ़तम रहस्यमयी जानकारियां भी मेरी जिज्ञासानुसार गुरुदेव जी मेरे सामने स्पष्ट करते रहे हैं। इस पुस्तक में उन रहस्यों की जानकारी तो नहीं दी गई है, क्योंकि यहां पर उन सब बातों का वर्णन करना आवश्यक नहीं है। किन्तु, मैंने इस बात को गहराई से महसूस किया है कि जीवन में गुरुमार्गदर्शन नितांत आवश्यक है। मैंने स्वयं गुरुमार्गदर्शन में यौगिक क्रियाओं को सीखने का सौभाग्य प्राप्त किया है। वर्तमान समय में मनुष्य के लिए योग पथ पर चलना नितांत आवश्यक है। हर काल में जब-जब भी अनीति-अन्याय-अधर्म अपनी चरम सीमा पर पहुंचता है, तब परमसत्ता माता आदिशक्ति जगज्जननी जगदम्बा अपने चेतना अंशों को भेजती हैं, जो सत्यधर्म की स्थापना करके भटकी हुई मानवता को सत्यपथ की राह दिखाते हैं और समाज में सुख-शांति समृद्धि की स्थापना करते हैं। वर्तमान समय में भी वही प्रक्रिया समाज के बीच चल रही है, जिसके अंतर्गत परमसत्ता की कृपा से सिद्धाश्रम सिरमौर योगेश्वर स्वामी सच्चिदानन्द जी महाराज इस धरती पर परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के रूप में समाज के बीच मौजूद हैं। वे एक महान् तपस्वी ऋषि हैं, जिन्होंने सम्पूर्ण विश्व आध्यात्म जगत् को अपने साधनात्मक तपबल की चुनौती दी है। वे एक बहुत ही सामान्य एवं सादगीपूर्ण साधनात्मक जीवन जीते हैं। वर्तमान में भी परम पूज्य सद्गुरुदेव जी महाराज चौबीस घण्टे में मात्र चार घण्टे का ही विश्राम करते हैं तथा शेष समय साधनात्मक एवं जनकल्याण के क्रमों में व्यतीत करते हैं।
वर्तमान में उन्होंने इस घोर कलियुग में लाखों शक्ति साधकों के साथ सतयुग की स्थापना का महाशंखनाद किया है तथा समाज को नशे-मांस से मुक्त चरित्रवान् एवं चेतनावान् बनाकर मानवता की सेवा, धर्मरक्षा व राष्ट्ररक्षा के लिए अग्रसर किया है। सौभाग्यशाली होंगे वे लोग, जो एक चेतनावान् ऋषि के सान्निध्य एवं मार्गदर्शन में आगे बढ़ सकेंगे। आशा है योग की यह पुस्तक पाठकों को चेतनावान् बनाने में सहायक सिद्ध होगी।
– संध्या शुक्ला
(योगसाधिका, ज्योतिषाचार्य)





























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