मध्यप्रदेश में बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर किए जा रहे तमाम सरकारी दावे खोखले परिलक्षित हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों ने प्रदेश में कुपोषण की भयावह स्थिति प्रस्तुत कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, मध्यप्रदेश में कुपोषण की स्थिति गंभीर श्रेणी में पहुंच गई है, जो राज्य के स्वास्थ्य व्यवस्था पर बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह है।
ताजा आंकड़ों के मुताबिक, प्रदेश के आदिवासी बहुल ज़िलों—श्योपुर, झाबुआ, अलीराजपुर और बड़वानी में हालात सबसे अधिक चिंताजनक हैं। यहां पाँच साल से कम उम्र के बच्चों में ‘वेस्टिंग’ (ऊंचाई के अनुपात में कम वजन) और ‘स्टंटिंग’ (उम्र के अनुपात में कम ऊंचाई) की दर राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है। प्रदेश के कई हिस्सों में बच्चों का वजन और विकास मानक स्तर से काफी नीचे पाया गया है, जिसे स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने ‘पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी’ जैसा बताया है।
कुपोषण के प्रमुख कारण
गर्भावस्था में लापरवाही: गर्भवती महिलाओं में खून की कमी (एनीमिया) और सही पोषण न मिलना, कुपोषित बच्चों के जन्म का सबसे बड़ा कारण है।
योजनाओं का सही क्रियान्वयन नहीं: आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से मिलने वाला ‘टेक होम राशन’ और पोषण आहार की गुणवत्ता पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। गुणवत्ता में कमी के साथ भ्रष्टाचार चरम पर है।
साफ पानी और स्वच्छता: पेयजल की अशुद्धता के कारण बच्चे बार-बार दस्त और संक्रमण का शिकार होते हैं, जिससे उनका शरीर पोषक तत्त्वों को ग्रहण नहीं कर पाता।
विशेषज्ञों की राय
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि कुपोषण केवल भोजन की कमी नहीं, बल्कि एक बहुआयामी समस्या है। इसके लिए केवल राशन बांटना काफी नहीं है, बल्कि ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करना और शुद्ध पेयजल सुनिश्चित करना भी अनिवार्य है। यदि समय रहते ठोस क़दम नहीं उठाए गए, तो बच्चों पर छाया यह संकट और भी बढ़ सकता है।
कुपोषण के ताजा आंकड़े
अक्टूबर 2025 तक के आधिकारिक आंकड़ों और विधानसभा में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार मध्यप्रदेश की स्थिति इस प्रकार है–
कुल कुपोषित बच्चे: राज्य में लगभग 10 लाख से अधिक बच्चे कुपोषित श्रेणी में हैं।
गंभीर कुपोषण: लगभग 1.36 लाख बच्च अत्यंत गंभीर कुपोषण की श्रेणी में आते हैं।
कुपोषण की दर: मध्यप्रदेश में गंभीर और मध्यम कुपोषण की दर 7.79 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत (5.40 प्रतिशत) से काफी अधिक है।
पुनर्वास केंद्रों की स्थिति
आदिवासी विकास खंडों में स्थित पोषण पुनर्वास केंद्रों में बच्चों के भर्ती होने की संख्या में तेजी आई है। वर्ष 2020-21 में जहाँ 11,566 बच्चे भर्ती हुए थे, वहीं 2024-25 में यह संख्या बढ़कर 20,741 हो गई।
साल 2020 से जून 2025 के बीच कुल 85,330 बच्चों को इन केंद्रों में उपचार के लिए भर्ती किया गया




























Views Today : 4
Views Last 7 days : 109
Views Last 30 days : 847
Views This Year : 8221
Total views : 108694
Who's Online : 0
Your IP Address : 162.251.85.8