भोपाल। मध्यप्रदेश में भले ही स्कूल चलें हम जैसे अभियान चलाए जा रहे हों और उन पर करोड़ों रुपए खर्च खर्च दर्शाए जा रहे हों, लेकिन सरकारी स्कूलों की हालत बेहद चिंताजनक है। नए आंकड़ों और रिपोर्टों ने प्रदेश के स्कूली शिक्षा प्रणाली की पोल खोल कर रख दी है।
प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग में शिक्षकों के स्वीकृत 2.89 लाख पदों में से लगभग 1,15,678 पद (करीब 40 प्रतिशत) रिक्त पड़े हैं। इतना ही नहीं, राज्य के 12,000 से अधिक स्कूल ऐसे हैं जो मात्र एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं।
जर्जर भवन: नरसिंहपुर और श्योपुर जैसे ज़िलों से ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं जहाँ छात्र 100 साल पुरानी जर्जर इमारतों या टिन शेड के नीचे पढ़ने के लिए मजबूर हैं। कई स्कूलों में बारिश का पानी भरने और ब्लैकबोर्ड तक टूटे हुए हैं।
साक्षरता का गिरता स्तर: सर्वे रिपोर्टों के अनुसार, सरकारी स्कूलों में मूलभूत साक्षरता का स्तर गिरा है। कक्षा 05 और 08 के बच्चों में बुनियादी पढ़ने और लिखने की क्षमता में कमी देखी गई है।
विशेषज्ञों का आरोप है कि आरटीई के तहत मेधावी छात्रों के निजी स्कूलों में जाने और सरकारी स्कूलों के विलय की नीति से सरकारी शिक्षा व्यवस्था कमज़ोर हो रही है।





























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