इंदौर। देश के कथित स्वच्छतम शहर इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल से फैला संकट किसी एक दिन की ग़लती नहीं, बल्कि लगातार अनदेखी, ग़लत निर्माण और निगरानी के अभाव का नतीजा है। छह दिन में 16 लोगों की मौत हो गई और शहर की जल व्यवस्था की भयावह तस्वीर सामने आ गई।
ज्ञात हो कि रहवासी कई हफ्तों से गंदे पानी की आपूर्ति की शिकायत कर रहे थे, लेकिन प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया। 29 दिसंबर 2025 को स्थिति तब विस्फोटक हो गई, जब 100 से अधिक लोग उल्टी-दस्त से पीड़ित हो गए। अस्पतालों में मरीजों की भीड़ लगने लगी। मरीजों की मौत होने लगी और बीमार लोगों की संख्या 1100 से अधिक पहुंच गई।
नगर निगम ने आनन-फानन में पानी के सैंपल जांच के लिए भेजे। प्रशासनिक कार्रवाई के तौर पर दो अधिकारियों को निलंबित किया गया और एक की सेवा समाप्त कर दी गई। जांच में पता चला कि नर्मदा जल लाइन के ऊपर और आसपास ड्रेनेज चैंबर बने हुए थे। इससे भी गंभीर तथ्य यह था कि एक पुलिस चौकी का टायलेट भी इसी पाइपलाइन के ऊपर बना दिया गया, जिससे सीवेज सीधे पेयजल लाइन में रिसने की आशंका पुख्ता हो गई।
जांच ने उजागर हुआ सच
नए साल के पहले दिन आई पानी की जांच रिपोर्ट ने पूरे मामले की भयावहता साफ कर दी। इसमें पुष्टि हुई कि रहवासी मल-मूत्र मिश्रित पानी पीने को मज़बूर थे। मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मुख्य सचिव को नोटिस जारी किया। मुख्यमंत्री ने नगर निगम कमिश्नर और एडिशनल कमिश्नर को नोटिस जारी किया। हाईकोर्ट में पेश स्टेटस रिपोर्ट में सरकार ने आधिकारिक तौर पर चार मौत स्वीकारी, जो जमीनी हकीकत से बड़ा विरोधाभास है। अब तक 16 लोगों की मौत हो चुकी है, 2800 से ज़्यादा लोग बीमार हुए हैं, अभी 201 का विभिन्न अस्पतालों में इलाज जारी है।




























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