सहरसा। कोसी क्षेत्र की जल-जमाव वाली भूमि जो कभी किसानों के लिए अभिशाप मानी जाती थी, अब मखाना की खेती से वरदान बन गई है। सहरसा ज़िले के नौहट्टा प्रखंड के किसान दिलीप सादा की सफलता की कहानी इसका जीता-जागता उदाहरण है। धान-गेहूं की पारंपरिक खेती से मामूली मुनाफा कमाने वाले दिलीप आज मखाने की खेती से लाखों में कमाई कर रहे हैं।
दिलीप सादा बताते हैं कि उन्होंने 10 साल पहले मखाने की खेती शुरू की थी और आज यह उनके लिए सोने की फसल बन चुकी है। वे अकेले चार बीघा में मखाने की खेती कर रहे हैं और उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई है।
सफलता का राज
आमतौर पर मखाने की खेती में पानी के अंदर घंटों मेहनत करके बीज निकालना और फिर उसे लावा बनाने तक की प्रक्रिया काफी जटिल होती है, लेकिन दिलीप ने एक स्मार्ट तरीका अपनाया। वे सिर्फ तालाब से कच्चा मखाना (गुड़ी) निकालकर उसे सीधे व्यापारियों को बेच देते हैं। उन्हें मखाना घर तक ले जाने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती। दिलीप कहते हैं कि व्यापारी पहले से ही तालाब के पास खड़े रहते हैं और जैसे ही मखाना निकलता है वे तुरंत खरीद लेते हैं।
लागत कम, मुनाफा अधिक
दिलीप के अनुसार, एक बीघा मखाने की खेती में लगभग 50,000 रुपये का खर्च आता है और फसल 6 महीने में तैयार होजाती है। इस लागत पर उन्हें लगभग 02 लाख रुपये तक का मुनाफा मिल जाता है। इस तरह चार बीघा से वे सालाना लाखों रुपये कमा रहे हैं। वह एक दिन में 25 से 30 किलो कच्चा मखाना निकाल लेते हैं, जिससे उन्हें एकमुश्त अच्छी रकम मिल जाती है।



























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