आलू की खेती में किसानों की सबसे बड़ी समस्या खरपतवार की है। ऐसे में विषय विशेषज्ञ ने यांत्रिक और रासायनिक नियंत्रण जैसे मेट्रिब्यूजिन, पेंडिमेथालिन, आॅक्सीफ्लोरफे के उपयोग की सलाह देते हैं।
देशभर में किसान इस समय आलू की खेती में जुटे हुए हैं, लेकिन आलू की फसल में सबसे बड़ी समस्या इसमे होने वाले खरपतवार से होता है। खरपतवार न केवल आलू की बढ़वार को रोकते हैं, बल्कि मिट्टी के पोषकतत्त्वों और पानी की खपत को भी बढ़ा देते हैं, जिससे उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, आलू की खेती में खरपतवार नियंत्रण दो तरह से किया जा सकता है। पहला यांत्रिक नियंत्रण और दूसरा, रासायनिक नियंत्रण। दोनों तरीके से खरपतवार का नियंत्रण किया जा सकता है। शुरुआती अवस्था में जब पौधे छोटे होते हैं, तब हल्की गुड़ाई और निदाई करके यांत्रिक तरीके से खरपतवारों को हटाया जा सकता है। इससे मिट्टी में हवा का संचार भी बेहतर होता है। बड़े क्षेत्र या अधिक खरपतवार की स्थिति में रासायनिक उपाय ज़्यादा प्रभावी साबित होते हैं। इसके लिए किसान मेट्रिब्यूजिन का उपयोग कर सकते हैं। यह दवा खेत तैयार करने के बाद या आलू के अंकुर निकलने से पहले छिड़की जाती है। प्रति एकड़ 200-250 ग्राम मेट्रिब्यूजिन को 200 लीटर पानी में घोलकर छिड़कने से चौड़ी पत्ती वाले और संकरी पत्ती वाले दोनों तरह के खरपतवारों पर नियंत्रण मिलता है।
इसके अलावा पेंडिमेथालिन भी एक असरदार दवा है, जिसे बीज बोने के बाद और अंकुर निकलने से पहले छिड़का जाता है। यह खरपतवारों के बीजों के अंकुरण को रोकता है और लंबे समय तक प्रभाव बनाए रखता है। कुछ किसान आॅक्सीफ्लोरफे का भी प्रयोग करते हैं, जो मिट्टी में लंबे समय तक सक्रिय रहकर खरपतवारों की नई वृद्धि को रोकता है। इसका उपयोग भी अंकुरण से पहले किया जाना चाहिए।
दवा छिड़कने से पहले खेत में नमी होना ज़रूरी है, ताकि रासायनिक तत्त्व प्रभावी ढंग से काम कर सकें। साथ ही छिड़काव सुबह या शाम के समय किया जाए, जब तापमान सामान्य हो।




























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