मानव शरीर इस निखिल ब्रह्माण्ड की सबसे सुन्दर कृति है। मानव जीवन को सबसे श्रेष्ठ कहा गया है। देवताओं के लिए भी दुर्लभ मानव शरीर में निखिल ब्रह्माण्ड समहित है। सामान्य मानव जब पतन के मार्ग में पहुंच जाता है, तो बहुत ही दीन-हीन, असमर्थ, असहाय, मानसिक विकलांग और अपंग होकर उस अवस्था में पहुंच जाता है, जहां वह स्वयं के जीवन का भी संचालन नहीं कर पाता। वहीं यह मनुष्य उच्चता की ओर बढ़ता है तथा मानवीय मूल्यों को स्थापित करता हुआ धर्मपथ पर बढ़कर अष्टांग योग के मार्ग में चलता है और अपनी समस्त चित्तवृत्तियों का निरोध करके समाधि की अवस्था वैराग्य को प्राप्त करता है। इस प्रकार वह अपनी पूर्ण आत्मचेतना को जाग्रत् करके अलौकिक दिव्यशक्तियों का मालिक बनता हुआ, अनन्त लोकों से अपना सम्बन्ध स्थापित कर लेता है। अपने अनुसार कुछ भी करने के लिए सामथ्र्यवान् बन जाता है। साथ ही वह प्रकृतिसत्ता का एक सहायक अंग बनकर मानव से महामानव बन जाता है। ऋषित्व पद को प्राप्त करके वह दिव्यधाम का वासी बनता है, जो मानव जीवन का अंतिम पड़ाव और लक्ष्य है।
शून्य से शिखर तक की इस यात्रा को तय करने के लिए हमें अपने तन-मन और बुद्धि को स्वस्थ निर्मल चेतनावान् बनाते हुए बढऩा पड़ता है। मनुष्य को अपनी जीवनचर्या को एक व्यवस्थित स्वरूप देना पड़ता है। आहार-विहार-विचारों को व्यवस्थित रखकर आगे बढऩा पड़ता है। अष्टांग येाग में इस पूरी यात्रा को आठ महत्त्वपूर्ण अंगों में बांटा गया है, जो क्रमश:- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि हैं। इन आठों अंगों में पूर्णतया निष्ठा-विश्वास और समर्पण के साथ चलने पर ही हमें पूर्णत्व का लाभ प्राप्त होता है। यदि मनुष्य साधना की चरम अवस्था को प्राप्त करना चाहता है, तो अष्टांग योग का पूर्णता से पालन करना अनिवार्य है। मगर, इसका तात्पर्य यह नहीं है कि जो पूर्णत्व से पालन नहीं कर सकते, उन्हें कुछ फल प्राप्त होगा ही नहीं। अष्टांग योग का यह पथ एक ऐसी धारा है, जिस पर हम जितना चलेंगे, उतना फल प्राप्त होता जाता है। जिस प्रकार यदि कोई भूखा व्यक्ति अन्न का एक दाना भी खा लेता है, तो उसकी कुछ न कुछ भूख अवश्य मिटती है और भरपेट खा लेता है, तो पूर्णता से भूख मिट जाती है। अत: इस अष्टांग योग का आप जितना पालन करते जायेंगे, उतना फल आपको प्राप्त होता जायेगा। इस पथ पर चलने के लिए ऐसा भी नहीं है कि जब आप एक अंग का पालन कर लें, तभी दूसरे में बढ़ें। आप सभी आठों अंगों को एक साथ अपने जीवन के साथ जोड़ते हुए आगे बढ़ेंगे, तो ज्यादा श्रेष्ठ होगा। धीरे-धीरे अभ्यास के द्वारा योग के आठों अंग मजबूत होते जाते हैं। ये सभी आठों अंग एक-दूसरे के पूरक हैं। इनमें प्रथम पांच अंग यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार बहिरंग योग कहलाते हैं, जो स्थूल जगत् से जुड़े हुए हैं। धारणा, ध्यान और समाधि अंतरंग योग कहलाते हैं, जो सूक्ष्म जगत् से जुड़े हुए हैं।
मानवजीवन के लिए प्रथम दो अंग यम और नियम अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। इन दोनों के मजबूत होने पर शेष सभी अंगों पर सहज भाव से पकड़ मजबूत होती चली जाती है, चूंकि अंतिम तीन अंगों की गहराई को प्राप्त करने के लिए यम-नियम का पूर्णतया पालन करना अत्यन्त अनिवार्य है। इसके बिना समाधि की पूर्णता को प्राप्त किया ही नहीं जा सकता। यह अष्टांग योग वास्तव में एक शक्ति योग है। इसे जिसने कर लिया, वह शक्तिवान् बन गया और जिसने नहीं किया, वह सामान्य रह गया।




























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