Homeधर्म अध्यात्मअज्ञानान्धकार को दूर करने का पावन पर्व है गुरुपूर्णिमा

अज्ञानान्धकार को दूर करने का पावन पर्व है गुरुपूर्णिमा

संकल्प शक्ति। हर साल की तरह इस साल भी अध्यात्मिकस्थली पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम में ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के शिष्यों के द्वारा उल्लास-उमंग से गुरु पूर्णिमा पर्व मनाया जायेगा। हज़ारों की संख्या में सिद्धाश्रम पहुँचे परम पूज्य  गुरुवरश्री के शिष्य, प्रात:काल एवं सायंकाल मूलध्वज साधना मंदिर और श्री दुर्गाचालीसा अखण्ड पाठ मंदिर में सम्पन्न होने वाली आरतीक्रम में सम्मिलित होंगे। तत्पश्चात्  अपने आराध्य सद्गुुरुदेव जी महाराज के श्री चरणों पर नतमस्तक होकर अपने जीवन को कृतार्थ करेंगे।

हमारे सनातन संस्कृति में आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। कहते हैं कि  गुरु की कृपा हो जाए, तो इष्ट से साक्षात्कार हो सकता है।  गुरु पूर्णिमा सद्गुरु को समर्पित परम्परा है। इस दिन गुरुपूजन का विधान है। शिष्यगण अपने गुरु  के श्रीचरणों पर नतमस्तक होकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं या उनके चरण पादुकाओं का पूजन करते हैं और इससे साधकों को भक्ति, ज्ञान और आत्मशक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है। शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ बताया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह शिष्यों के अज्ञानान्धकार को दूर करते हैं अर्थात् अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाते हैं।  यह दिन आदिगुरु महर्षि वेद व्यास जी के जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। इस वर्ष गुरुपूर्णिमा पर्व दिनांक 10 जुलाई, दिन-गुरुवार को है।

जो आत्मज्ञानी हैं, वे ही सद्गुरु हैं

अज्ञानान्धकार को मिटाकर अपने शिष्यों के अन्त:करण में जो ज्ञान का प्रकाश भर दे, वहीं सद्गुरु है और वर्तमान समय में इस भूतल पर ऐसे सद्गुरु एक ही हैं और वे हैं- ऋषिवर श्री शक्तिपुत्र जी महाराज, जिनका इस पावनभूमि में मानवता के कल्याण के लिए, शिष्यों-भक्तों के हृदय से अज्ञानान्धकार हटाकर अन्तर्ज्योति प्रकाशित करने के लिए अवतरण हुआ है। केवल धर्मग्रन्थों को रट लेने वाले व बीजमन्त्र प्रदाताओं को हम श्रेष्ठ गुरु नहीं कह सकते। श्रेष्ठ गुरु वे ही हो सकते हैं, जिनकी कुण्डलिनी चेतना जाग्रत् हो, जो आत्मज्ञानी हो। इसीलिए कहा गया है कि पानी पियो छान के और गुरु बनाओ जान के। 

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