Homeधर्म अध्यात्मशक्ति चेतना जनजागरण शिविर, सिद्धाश्रम (म.प्र.) दिनांक- 20-10-2015

शक्ति चेतना जनजागरण शिविर, सिद्धाश्रम (म.प्र.) दिनांक- 20-10-2015

क्रमश:… 

आप इतने असमर्थ, असहाय बन जाओगे कि आपको लगेगा कि हम कुछ कर ही नहीं सकते हैं। चूंकि धीरे-धीरे आपकी शारीरिक क्षमता घटती चली जा रही है, आप नाना प्रकार की बीमारियों से ग्रसित होते चले जा रहे हो और आगे आने वाली पीढ़ी आपसे ज़्यादा बीमारियों से ग्रसित होगी। बचाव का एकमात्र साधन है कि सजग होजाओ। अपने जीवन की जितनी भी समस्यायें हैं, उनका निदान अपने अन्दर से खोजो और जिस पथ पर आपका गुरु आपको बढ़ाना चाहता है, उसी पथ पर चलकर खोजो।

आपको ‘माँ’ से जुड़ने के लिए भक्ति, ज्ञान और आत्मशक्ति का मार्ग दिया गया है, धर्म, राष्ट्र और मानवता की सेवा का पथ दिया गया है और अन्त:करण में झांकने के लिए आपको योगपथ पर चलना अनिवार्य है। उसके बिना कोई भी रास्ता आपको सही दिशा और लक्ष्य पर नहीं पहुंचा सकता है। ‘योग ही जीवन है, वियोग ही मृत्यु है। कुण्डलिनी का जागरण ही जीवन की मुक्ति है।’ ये पंक्तियां कई वर्ष पूर्व से मेरे द्वारा आपको दी हैं और यदि आप ऐसी सोच पैदा कर लो, तो आप अपने जीवन की समस्त समस्याओं का समाधान स्वयं ढूढ़ने में सफल हो जाओगे। आपको यात्रा तय करनी पड़ेगी। जो ग़ल्तियाँ आपने पूर्व में कीं हैं, उसका फल तो आपको भोगना ही पड़ेगा और यदि उस भोग को कुछ कम करना चाहते हो, तो भी वही सत्यपथ का मार्ग है, धर्मपथ का मार्ग है, योगपथ का मार्ग है। उस मार्ग पर चलोगे, तो आपकी समस्याओं का समाधान होता चला जायेगा और उसके लिए आपको योगपथ पर बढ़ना पड़ेगा, जिसके लिए योग को सिर्फ ‘शक्ति योग’ के नाम से सम्बोधित किया जाना चाहिए। चंूकि जहाँ आप जोड़ने का क्रम सोचते हैं, तो अपने आपको सिर्र्फ़ शक्ति से जोड़ना चाहते हैं। एक भी आसन करना चाहते हैं, तो उससे आप ऊर्जा चाहते हैं। हमारे अंदर के सातों चक्रों को ‘माँ’ के रूप में सम्बोधित किया गया है।

प्राय: आप लोगों की एक प्रमुख  ग़ल्ती होती है कि या तो आप जान करके आकाश पर पैर रखना चाहते हो या नीचे ही पड़े रहते हो! बीच की यात्रा में मेहनत बिल्कुल भी नहीं करना चाहते हो। जिस तरह कोई आपसे कह दे कि आप पढ़ाई करके वैज्ञानिक बन सकते हो, किसी भी क्षेत्र में आप अनुसंधान कर सकते हो, आप बड़े से बड़े वैज्ञानिक यंत्रों का निर्माण कर सकते हो, तो यदि कक्षा पाँच में पढ़ने वाला विद्यार्थी चाहे कि मैं अभी प्रोफेसर, लैक्चरर बन जाऊँ, साइन्टिस्ट बन जाऊँ, डॉक्टर बन जाऊँ, तो यह सम्भव नहीं है। 

शेष अगले अंक में…

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