Homeजनजागरण‘माँ’ की साधना बहुत सहज-सरल साधना है: बहन पूजा शुक्ला

‘माँ’ की साधना बहुत सहज-सरल साधना है: बहन पूजा शुक्ला

कटंगी। भगवती मानव कल्याण संगठन एवं पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम ट्रस्ट के संयुक्त तत्त्वावधान में दिनांक 15-16 मार्च को नगर परिषद परिसर, कटंगी, तहसील-पाटन, ज़िला-जबलपुर में 24 घंटे का श्री दुर्गाचालीसा अखंड पाठ कार्यक्रम भव्यतापूर्वक सम्पन्न हुआ।

समापन बेला पर भगवती मानव कल्याण संगठन की केन्द्रीय अध्यक्ष शक्तिस्वरूपा बहन सिद्धाश्रमरत्न पूजा शुक्ला जी ने प्रभावपूर्ण शब्दों में कहा कि ‘‘ निश्चित रूप से सौभाग्य के क्षण होते हैं, जब हम एकसाथ बैठकर माता जगदम्बे की आराधना करते हैं। अनेक साधु-सन्तों, प्रवचनकर्ताओं के द्वारा समाज को समझाया जाता है कि ‘माँ’ की साधना बहुत कठिन है, परन्तु मैं बताना चाहती हूँ की ‘माँ’ की साधना बहुत ही सहज-सरल साधना है। ‘माँ’ की साधना के लिए एक बात आवश्यक है और वह है भक्तिभाव। यदि भक्तिभाव आपके अन्दर नहीं है, तो आप ‘माँ’ की कृपा नहीं प्राप्त कर सकते। हमारा तो सौभाग्य है कि हम सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के शिष्य हैं, जिन्होंने हमें ज्ञान कराया कि माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा ही हमारी इष्ट हैं, हमारी आत्मा की मूल जननी हैं और हमें भटकने नहीं दिया। गुरुवर ने हमें धर्मग्रन्थों का सार बताकर हमारे जीवन को आलोकित कर दिया।

आप सभी परम पूज्य गुरुवरश्री की विचारधारा पर चलकर स्वयं के जीवन में तो परिवर्तन कर ही रहे हैं, जनकल्याण को भी अपना लक्ष्य बना लिया है। गुरुवर ने हमें हमारे कर्त्तव्य बतलाए हैं-धर्मरक्षा, राष्ट्ररक्षा और मानवता की सेवा करना और हम इन तीनों कर्तव्यों को लेकर निरन्तर आगे बढ़ते जा रहे हैं। भगवती मानव कल्याण संगठन 31 वर्षों से समाजसेवा के कार्य में निमग्न है और इस क्षेत्र में सफलता के कई आयाम तय कर चुका है। आप गुरुवर की ऊर्जा को जानिए, पहचानिए, उनके बताए रास्ते पर चलिए, आपका कोई भी काम रुकने नहीं पाएगा। आपका लक्ष्य केवल और केवल जनकल्याण और आत्मकल्याण होना चाहिए।’’

संगठन के केन्द्रीय महासचिव सिद्धाश्रमरत्न अजय अवस्थी जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि ‘‘ माता भगवती से यदि कुछ मांगना है, तो भक्ति, ज्ञान और आत्मशक्ति का वरदान मांगो और यह ज्ञान हमें हमारे सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने दिया है।  जिस दिन से आप यह वरदान मांग लेंगे, उसी दिन से आपके अन्दर सेवा, साधना, पुरुषार्थ और परोपकार के भाव उत्पन्न होने लगेंगे। 

भाइयों और बहनों, समाज हमें हमारे कर्त्तव्यों का बोध कराता है और अध्यात्म हमें पवित्रता एवं आत्मबल का बोध कराता है और जब समाज एवं अध्यात्म का संगम होजाता है, तब हमारा जीवन व्यक्तिगत नहीं  रह जाता। तब, हमारा वही जीवन जनजागरण का माध्यम बन जाता है। 

यदि आप आध्यात्मिक जीवन जी रहे हैं, तो कष्ट तो आएंगे ही, लेकिन आप उन कष्टों का न के बराबर अनुभव करेंगे, यह प्रभाव होता है आध्यात्मिक जीवन का। सजग रहिए, सावधान रहिए, क्योंकि कलियुग का सन्धिकाल चल रहा है और पूरी दुनिया विश्वयुद्ध की चपेट में है। उनके पास कोई रास्ता नहीं है, जबकि हमारे पास रास्ता है कि ‘माँ’-गुरुवर के चरणों में निवेदन कर सकते हैं कि हे माँ, हे गुरुवर, कम-से-कम दुनिया में शान्ति कायम कर दें। बड़े-बड़े ट्रम्प जैसे जो राष्ट्राध्यक्ष हैं उन्हें बुद्धि-विवेक प्रदान करें, जिससे वे शान्ति कायमी का रास्ता पकड़ सकें। वरना एक न्यूक्लियर बम पूरी दुनिया में तबाही मचा सकता है। अन्त में मैं यही कहूँगा कि ‘माँ’-गुरुवर की छवि के समक्ष, उनके चरणों के पास बैठकर नित्यप्रति साधना-आराधना करें और विश्वशांति की कामना करें।

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