नई दिल्ली। डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर 96.89 पर पहुंच गया है, जिससे देश के चालू खाता घाटे और आयात बिल पर भारी दबाव बन गया है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ($110 प्रति बैरल) और विदेशी निवेशकों के द्वारा लगातार की जा रही बिकवाली ने इस गिरावट को तेज कर दिया है।
वैश्विक बाजारों में मची हलचल और घरेलू स्तर पर विदेशी पूंजी की लगातार निकासी के कारण भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के सामने पूरी तरह लाचार नज़र आ रहा है। अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाज़ार में भारी बिकवाली के चलते रुपया इतिहास के सबसे न्यूनतम स्तर रु. 96.89 प्रति डॉलर पहुंच चुका है। गौरतलब है कि वर्ष 2026 की शुरुआत से अब तक रुपये में 07 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आ चुकी है, जिससे यह इस साल एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गया है। वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां जल्द नहीं सुधरीं, तो रुपया बेहद जल्द रु. 100 प्रति डालर के मनोवैज्ञानिक स्तर को भी पार कर सकता है।
क्यों टूट रहा है रुपया?: गिरावट के तीन बड़े कारण हैं- अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में ब्रेंट क्रूड आॅयल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास मंडरा रही हैं। भारत अपनी ज़रूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। तेल महंगा होने से भारत को भुगतान के लिए भारी मात्रा में डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ गया है।
विदेशी निवेशकों का पलायन: वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और पश्चिम एशिया के बिगड़ते हालातों (हॉर्मुज जलडमरूमध्य रूट पर आपूर्ति ठप होने का डर) के चलते विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय शेयर बाज़ार से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी डॉलर में लगा रहे हैं।
मज़बूत होता डॉलर इंडेक्स: अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़त के कारण डॉलर इंडेक्स लगातार मज़बूत हो रहा है, जिससे भारत सहित दुनिया भर की उभरती अर्थव्यवस्थाओं की करेंसी कमज़ोर हो रही हैं।
यदि जल्द ही स्थिति में सुधार नहीं आया तो इसका भारतीय अर्थव्यवस्था और आम आदमी पर गहरा असर पड़ेगा।





























Views Today : 16
Views Last 7 days : 274
Views Last 30 days : 1255
Views This Year : 7151
Total views : 107624
Who's Online : 0
Your IP Address : 216.73.217.5