काठमांडू/नई दिल्ली। नेपाल-तिब्बत सीमा पर स्थित हिमालयीन क्षेत्र में 26 अगस्त 2026 को आई विनाशकारी बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस जलप्रलय में 30 अगस्त तक 579 लोगों की मौत हो चुकी थी और लगभग 1900 से अधिक लोग लापता हैं, जिनमें भारतीय तीर्थयात्रियों सहित सैकड़ों विदेशी नागरिक शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह आपदा किसी भूकंप या ग्लेशियर टूटने (आइस-रॉक एवलांच) के कारण घटित हुई है
हिमालय का रोष
नेपाल त्रासदी का कड़वा सच: प्रकृति जब करवट बदलती है, तो विकास के सारे दावे और मानवीय संरचनाएं कमजोर दीवाल की तरह ढह जाती हैं। नेपाल के भोटे कोशी और त्रिशूली नदी घाटी में आई हालिया बाढ़ ने एक बार फिर इस भयानक सच से दुनिया को रूबरू कराया है। अचानक आए मलबे और पानी के खौफनाक सैलाब ने पूरे गांवों, सड़कों और पुलों का नामोनिशान मिटा दिया है। चारों तरफ मलबे और कीचड़ की मोटी परत जमी है, जिसके नीचे न जाने कितनी जिंदगी और सपने दफन हो चुके हैं।
आर्थिक व ढांचागत क्षति: दर्जनों स्कूल पूरी तरह नष्ट, बिजली और मोबाइल नेटवर्क ठप तथा कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग पूरी तरह तबाह
ताजा खतरा: आपदा के बाद सीमा पर दो नई हिमनद झीलें बन गई हैं। साथ ही पुरेपू सांगपो नदियों के संगम पर मलबे से बनी एक अस्थाई कृत्रिम झील में 20 लाख क्यूबिक मीटर से ज्यादा पानी जमा हो चुका है, जिसके टूटने का खतरा मंडरा रहा है।




























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