17 मार्च को देशभर में श्रद्धा भक्ति के साथ ‘माँ हिंगलाज जयंती’ मनाई जाती है। माँ हिंगलाज, जिन्हें आदिशक्ति का अवतार माना जाता है, न केवल भारत में बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की आस्था की केंद्र हैं। विशेष रूप से क्षत्रिय खत्री समाज और भगवान् परशुराम के अनुयायियों के लिए यह दिन एक महापर्व के समान है।
पौराणिक महत्त्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान् विष्णु ने देवी सती के पार्थिव शरीर को अपने चक्र से 51 हिस्सों में विभाजित किया था, तब सती का ‘ब्रह्मरंध्र’ (सिर का ऊपरी हिस्सा) जिस स्थान पर गिरा, वह ‘हिंगलाज शक्तिपीठ’ कहलाया। यह स्थान वर्तमान में पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में हिंगोल नदी के तट पर स्थित है। 51 शक्तिपीठों में प्रथम और अत्यंत प्रभावशाली होने के कारण इसे ‘नानी की हज’ के नाम से भी जाना जाता है।
माँ हिंगलाज को ‘हिंगुल’ (सिंदूर) की देवी माना जाता है, जिससे इस क्षेत्र का नाम हिंगलाज पड़ा। माता का यह स्वरूप अत्यंत सौम्य और शत्रुओं का दमन करने वाला माना गया है।
सांस्कृतिक एकता का प्रतीक
माँ हिंगलाज की महिमा केवल एक धर्म तक सीमित नहीं है। वे सांप्रदायिक सौहार्द की प्रतीक हैं। जहां हिंदू उन्हें शक्ति के रूप में पूजते हैं, वहीं स्थानीय मुस्लिम समुदाय उन्हें ‘बीबी नानी’ के रूप में सम्मान देता है और बड़ी अकीदत के साथ उनकी दरगाह की सुरक्षा करता है। यह श्रद्धा सदियों से चली आ रही है, जो भारत और पड़ोसी देशों के सांस्कृतिक रिश्तों को एक सूत्र में पिरोती है।
उल्लास और परंपराएं
17 मार्च को जयंती के अवसर पर माँ हिंगलाज के मंदिरों में विशेष सजावट की जाती है। इस दिन की शुरुआत प्रभात फेरी और मंगल आरती से होती है। भक्तजन सामूहिक रूप से ‘हिंगलाज चालीसा’ का पाठ करते हैं और माता को चुनरी व सिंदूर अर्पित करते हैं। कई स्थानों पर विशाल शोभायात्राएं निकाली जाती हैं, जिनमें श्रद्धालु भजन-कीर्तन करते हुए शामिल होते हैं।
क्षत्रिय समाज के लिए यह दिन विशेष गौरव का है। मान्यता है कि भगवान् परशुराम के क्रोध से रक्षा के लिए माँ हिंगलाज ने ही समाज के पूर्वजों को शरण दी थी। इसलिए इस दिन समाज द्वारा सामूहिक भोज और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन कर एकता का संदेश दिया जाता है।
आध्यात्मिक संदेश
माँ हिंगलाज की पूजा का मुख्य संदेश भय से मुक्ति और सत्य के मार्ग पर चलना है। वर्तमान भागदौड़ भरी जिंदगी में माँ की उपासना मानसिक शांति और शक्ति प्रदान करती है। जयंती का यह अवसर हमें याद दिलाता है कि भक्ति के मार्ग में कोई सीमा नहीं होती और श्रद्धा ही कल्याण का एकमात्र मार्ग है।












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