सनातन धर्म में नवरात्र का त्यौहार आत्मिक शुद्धि और शक्ति की आराधना का सबसे बड़ा पर्व है। वर्ष में कुल चार नवरात्रि आती हैं, जिनमें से दो प्रत्यक्ष (चैत्र और शारदीय) और दो गुप्त (माघ और आषाढ़) होती हैं। इस वर्ष 15 जुलाई से आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि प्रारंभ हो रही है। यह नवरात्रि आम लोगों की सामान्य पूजा के साथ-साथ विशेष रूप से तांत्रिकों, साधकों और अघोरियों के लिए तंत्र-मंत्र की गुप्त साधना के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है।
दसों महाविद्याओं की होती है आराधना
गुप्त नवरात्र के नौ दिनों में माता दुर्गा की दस दिव्य और शक्तिशाली शक्तियों की पूजा की जाती है, जिन्हें ‘दस महाविद्या’ कहा जाता है। ये महाविद्याएं इस प्रकार हैं–माँ काली, माँ तारा, माँ छिन्नमस्ता, माँ षोडशी (त्रिपुर सुंदरी), माँ भुवनेश्वरी, माँ भैरवी, माँ धूमावती, माँ बगलामुखी, माँ मातंगी, माँ कमला। इन देवियों की साधना से जीवन के सभी संकट, शत्रु बाधा, रोग और दरिद्रता का समूल नाश होता है।
क्यों कहा जाता है इसे ‘गुप्त’ नवरात्र?
प्रत्यक्ष नवरात्र में जहाँ माता दुर्गा के नौ स्वरूपों की सार्वजनिक रूप से पूजा-अर्चना और गरबा-पंडालों का आयोजन होता है, वहीं गुप्त नवरात्र इसके बिल्कुल विपरीत होती है। इसमें साधना और पूजा को पूरी तरह गोपनीय रखा जाता है। मान्यता है कि गुप्त नवरात्र में पूजा को जितना गुप्त रखा जाए, उसका फल उतना ही अधिक और तीव्र मिलता है। इसमें साधक अपनी मनोकामनाओं और मंत्रों को किसी के सामने प्रकट नहीं करते हैं।
घटस्थापना (कलश स्थापना)
ज्योतिषविदों के अनुसार, इस दिन घटस्थापना के लिए मुख्य रूप से दो श्रेष्ठ मुहूर्त मिल रहे हैं। सुबह 05:35 बजे से10:15 बजे तक (सर्वोत्तम समय)। दोपहर 11:55 बजे से 12:50 बजे तक।
संयम, नियम और पवित्रता
गुप्त नवरात्रि आध्यात्मिक ऊर्जा को जाग्रत् करने का एक अनूठा अवसर है। 15 जुलाई से शुरू हो रहे इस शक्ति पर्व पर संयम, नियम और पवित्रता का पालन करते हुए यदि माँ जगदम्बा की आराधना की जाए, तो साधक को मानसिक शांति, आंतरिक बल और सांसारिक कष्टों से मुक्ति अवश्य मिलती है।




























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