जबलपुर। अड्डा कढ़ाई में कपड़े को लकड़ी के फ्रेम में फंसाया जाता है और फिर कपड़े पर छापे हुए अथवा स्टेंसिल से बनाए हुए पैटर्न पर हाथ से गोटा, कंगन, छड़ी, मोती, टिकली, सितारे और कटदाना लगाए जाते हैं।
जानकारों के अनुसार, जरी जरदोजी कढ़ाई की शैली को 12वीं सदी में नूरजहां ईरान से सीखकर आईं थीं। उस समय इस कला को कपड़ों में कशीदाकारी के साथ महलों की दीवारों पर इस्तेमाल किया जाता था। इसमें जरी जरदोजी कढ़ाई का काम मुलायम कपड़े, जरी वाले कपड़े और रेशमी कपड़ों पर किया जाता है। आज भी शादियों व फैशन शोज में इसे पसंद किया जा रहा है।
बताया जाता है कि शहर के रजा चौक, सुब्बाशाह, मोहरिया, टेढ़ीनीम, पसियाना मोहल्ला में कारखानों में मुलायम व जरी वाले कपड़ों पर गोल्डन, सिल्वर धागों, मोतियों, सुनहरे सितारों, कटदाना से डिजाइन बनाई जाती है। संस्कारधानी जबलपुर में शिल्पकला की मुगलिया तहजीब की अनमोल विरासत आज भी जीवित है। मोहरिया क्षेत्र में 500 कारीगर कपड़ों पर आकर्षक डिजाइन करके उसे बेशकीमती बना रहे हैं। घरों और कारखानों में कपड़ों पर की जाने वाली इस शिल्पकला की मांग महानगरों से होते हुए दुबई, जेद्दा तक पहुंच गई है। इसके बावजूद प्रशासन की ओर से कारीगरों को प्लेटफॉर्म नहीं मिल सका है। आज भी वे दैनिक मज़दूरी करने के लिए मज़बूर हैं।




























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