वाशिंगटन। अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने बुधवार को ब्याज दरों में 0.75 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर दी है। यह साल 1994 के बाद से सबसे बड़ी वृद्धि दर है। फेडरल रिजर्व ने यह फैसला महंगाई पर नियंत्रण लगाने के लिए उठाया है। इस फैसले का असर लाखों अमेरिकी व्यवसाइयों और परिवारों पर पड़ेगा। अमेरिका में होम, कार और दूसरे तरह के ऋणों के लिए उधार लेने की लागत बढ़ जाएगी। अमेरिका में शुक्रवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिकी मुद्रास्फीति पिछले चार दशक के उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है। अमेरिका में मई महीने में मुद्रास्फीति दर 8.6 प्रतिशत पहुंच चुकी है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों में हुई बढ़ोतरी से भारतीय मुद्रा पर संकट गहरा गया है। ब्याज दरों में बढ़ोतरी की वजह से डालर को मज़बूती मिलेगी लेकिन इससे रुपया और ज़्यादा नीचे गिर सकता है।
फेडरल रिजर्व बैंक के मौज़ूदा अध्यक्ष जेरोम पावेल ने एक प्रेस कान्फ्रेंस में कहा, हमने सोचा था कि इस बैठक में कड़ी कार्रवाई करने की ज़रूरत है और हमने ऐसा ही किया है। मुद्रास्फीति को फेडरल की लक्ष्य दर पर वापस लाने के लिए केंद्रीय बैंक की प्रतिबद्धता पर जोर दिया गया है। पावेल ने कहा कि आर्थिक विकास धीमा होने की वजह से बेरोजगारी की दर थोड़ी अधिक हो सकती है। इस फैसले के बाद बेंचमार्क अल्पकालिक दर में वृद्धि होगी, जो कई उपभोक्ता, व्यावसायिक और लोन धारकों को प्रभावित कर सकता है। दर-निर्धारण फेडरल ओपन मार्केट कमेटी ने अपने बेंचमार्क फंड दर के स्तर को 1.5 प्रतिशत से लेकर 1.75 प्रतिशत की सीमा तक लाने का फैसला किया, जो मार्च 2020 में कोविड महामारी शुरू होने से ठीक पहले का उच्चतम स्तर है।
ब्याज दर क्यों बढ़ा रहा है अमेरिका?
ज्ञात हो कि ब्याज दर बढऩे से सभी प्रकार के लोन महंगे होजाते है। इसकी वजह से लोग खर्च कम करते हैं, जिससे बाज़ार में वस्तुओं की मांग और कीमतें दोनों घटती है।




























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