भारतीय संस्कृति में त्यौहारों का विशेष महत्त्व है, और इनमें ‘हरतालिका तीज’ का व्रत महिलाओं के लिए सर्वोच्च स्थान रखता है। हर साल भाद्रपद माह के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व अखंड सौभाग्य, वैवाहिक सुख और अटूट निष्ठा का प्रतीक है। इस वर्ष यह पावन पर्व 14 सितंबर को बेहद पूर्ण श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा।
हरतालिका तीज का व्रत बेहद कठिन माना जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं अपने पति की दीर्घायु और सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए निराहार और निर्जला (बिना अन्न-जल के) व्रत रखती हैं। दिन भर कठिन नियमों का पालन करने के बाद, शाम को प्रदोष काल में भगवान् शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा की जाती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत की शुरुआत स्वयं माता पार्वती ने की थी। उन्होंने भगवान् शिव को पति रूप में पाने के लिए जंगलों में कठोर तपस्या की थी। ‘हरतालिका’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है— ‘हरत’ (हरण करना) और ‘आलिका’ (सखी)। पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती की सखियां उनका हरण करके घने जंगल में ले गई थीं, ताकि उनके पिता उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध न कर दें। जंगल में ही माता पार्वती ने रेत के शिवलिंग बनाकर घोर तप किया, जिससे प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया।
सांस्कृतिक महत्त्व
यह पर्व आधुनिक समाज में प्रेम, समर्पण और पारिवारिक मूल्यों को सुदृढ़ करने का संदेश देता है। व्रत के दिन महिलाएं सोलह शृंगार करती हैं, हाथों में मेहंदी रचाती हैं और पारंपरिक गीतों पर नृत्य करती हैं। रात भर जागरण कर शिव-पार्वती के भजनों से माहौल भक्तिमय होजाता है। यह त्यौहार हमारी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने और नई पीढ़ी को संस्कारों से जोड़ने का एक बेहद खूबसूरत माध्यम है।




























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