इस वर्ष की पहली और अत्यंत दुर्लभ ‘सोमवती अमावस्या’ 15 जून को पड़ रही है, जो इस बार अधिमास (पुरुषोत्तम मास) के पवित्र संयोग के साथ आई है। भारतीय सनातन पंचांग के अनुसार, जब भी अमावस्या तिथि सोमवार के दिन पड़ती है, तो उसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है। साल में केवल एक या दो बार बनने वाला यह संयोग इस बार खगोलीय और आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्त्व रखता है, क्योंकि यह अधिमास के कृष्णपक्ष में आ रहा है, जिससे इसका फल अक्षय और अनंत गुना हो जाता है।
भारतीय समाज में पर्व केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि प्रकृति और मानवीय मूल्यों के संरक्षण की वैज्ञानिक व्यवस्था हैं। सोमवती अमावस्या के मूल में तीन प्रमुख तत्त्व छिपे हैं, जो आज के आधुनिक दौर में भी पूरी तरह प्रासंगिक हैं।
पर्यावरण चेतना और पीपल वृक्ष की पूजा
इस दिन विवाहित महिलाएँ अपने पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य जीवन के लिए पीपल के वृक्ष की पूजा कर उसकी 108 बार परिक्रमा करती हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो पीपल एकमात्र ऐसा वृक्ष है, जो चौबीसों घंटे ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है। हमारे ऋषियों ने इस जीवनदायिनी वनस्पति को देवत्व से जोड़कर समाज को प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन का संदेश दिया है।
जल का महत्त्व और नदी स्नान
मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को इस दिन के महत्त्व को समझाते हुए नदियों के संरक्षण और उनमें स्नान की महत्ता बताई थी। आज के समसामयिक दौर में, यह परंपरा हमें अपनी जीवनदायिनी नदियों को स्वच्छ और प्रदूषणमुक्त रखने की याद दिलाती है।
सामाजिक समरसता और दान-पुण्य
अमावस्या की सुबह (ब्रह्म मुहूर्त से लेकर सुबह 8:24 बजे तक) स्नान और दान का विशेष मुहूर्त है। इस दिन अन्न, वस्त्र और जल का दान देकर समाज के वंचित तबके की मदद की जाती है। यह व्यवस्था अमीर और ग़रीब के बीच की खाई को पाटने तथा सामाजिक सहानुभूति को बढ़ावा देने का एक सशक्त माध्यम है।
पितृ-तर्पण और मानसिक शांति का पर्व
सोमवार के अधिपति देव स्वयं भगवान शिव और मन के कारक ‘चंद्रमा’ हैं। अमावस्या तिथि मुख्य रूप से पितरों को समर्पित होती है। इस दिन किया गया पितृ-तर्पण न केवल कुल को समृद्धि देता है, बल्कि व्यक्ति के अंतर्मन की व्याकुलता को भी शांत करता है। अधिमास की इस विशेष अमावस्या पर मौन व्रत रखने या शांत रहकर ध्यान करने से मानसिक अशांति दूर होती है और व्यक्ति को आत्मिक बल मिलता है।




























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