दिनांक 25 मई को बुंदेलखंड के ऐतिहासिक महानायक आल्हा की जयंती है। 12वीं शताब्दी में जन्मे बनाफर कुल के वीर योद्धा आल्हा और उनके छोटे भाई ऊदल का नाम भारतीय इतिहास में अदम्य साहस, राष्ट्रभक्ति और स्वाभिमान के लिए आदर के साथ लिया जाता है। महाकवि जगनिक द्वारा रचित प्रसिद्ध लोक-काव्य ‘आल्हा-खंड’ (आल्हा) में दर्ज इनकी गाथाएं आज भी जनमानस की रगों में वीर रस का संचार करती हैं।
युद्ध भूमि के अजेय योद्धा: आल्हा विश्व इतिहास के उन विरले योद्धाओं में से हैं, जिन्होंने अपने जीवनकाल में 52 भीषण युद्ध लड़े और उन सभी में अजेय रहे। चंदेल राजा परमाल की सेना के प्रधान सेनापति के रूप में आल्हा-ऊदल ने विदेशी आक्रांताओं और तत्कालीन प्रतिद्वंद्वी राजाओं से अपने राज्य व मातृभूमि की रक्षा के लिए सर्वस्व झोंक दिया। उनकी वीरता की धाक ऐसी थी कि उनके बारे में बुंदेलखंड में यह पंक्ति आज भी प्रसिद्ध है: ‘बड़े लड़ैया महोबा वाले, जिनसे हार गई तलवार!’
माँ शारदा के परम भक्त: आल्हा मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध मैहर धाम की माँ शारदा भवानी के अनन्य भक्त थे। लोक मान्यताओं के अनुसार, उन्होंने देवी की प्रसन्नता के लिए 12 वर्षों तक कठिन तपस्या की थी। जनश्रुति है कि माँ शारदा के आशीर्वाद से आल्हा को अमरता का वरदान मिला था। आज भी बुंदेलखंड के लोगों का अटूट विश्वास है कि मैहर मंदिर के कपाट सुबह खुलने से पहले आल्हा अदृश्य रूप में आकर माता की सबसे पहली पूजा, आरती और पुष्प अर्पण कर जाते हैं।
भेदभाव पर प्रहार: 12वीं शताब्दी की रूढ़िवादिता के बीच आल्हा-ऊदल ने जातिगत, वर्णगत और ऊंच-नीच के सामाजिक भेदभाव को मिटाने का कार्य किया। उन्होंने समाज के हर वर्ग को साथ लेकर भाईचारे और राष्ट्र रक्षा की एक प्रगतिशील विचारधारा को अंकुरित किया, जिसके कारण वे सामाजिक न्याय के आदि प्रणेता माने जाते हैं।




























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