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	<title>sanatan dharm &#8211; संकल्प शक्ति</title>
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	<description>राष्ट्रीय साप्ताहिक समाचार पत्र</description>
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	<title>sanatan dharm &#8211; संकल्प शक्ति</title>
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		<title>सनातन संस्कारों का महापर्व है ऋषि पंचमी</title>
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		<pubDate>Tue, 15 Sep 2026 13:14:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>गणेश चतुर्थी के ठीक अगले दिन, यानी भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को देश भर में &#8216;ऋषि पंचमी&#8217; का व्रत और त्यौहार पारंपरिक श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष यह पावन पर्व 15 सितंबर को मनाया जा रहा है। सनातन परंपरा में यह एकमात्र ऐसा व्रत है, जिसमें किसी देवी-देवता की [&#8230;]</p>
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<p class="wp-block-paragraph">गणेश चतुर्थी के ठीक अगले दिन, यानी भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को देश भर में &#8216;ऋषि पंचमी&#8217; का व्रत और त्यौहार पारंपरिक श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष यह पावन पर्व 15 सितंबर को मनाया जा रहा है। सनातन परंपरा में यह एकमात्र ऐसा व्रत है, जिसमें किसी देवी-देवता की नहीं, बल्कि समाज को ज्ञान और मर्यादा की राह दिखाने वाले महान ऋषियों की पूजा-अर्चना की जाती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ऋषि पंचमी का मूल उद्देश्य ऋषियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है। हमारे ऋषियों ने अपने कठिन तप, शोध और ज्ञान के माध्यम से मानव सभ्यता को वेदों, उपनिषदों और आयुर्वेद का अमूल्य खजाना दिया। इस दिन पवित्र नदियों या सरोवरों में स्नान कर ऋषियों का तर्पण किया जाता है, जिससे मनुष्य को उनके द्वारा दिखाए गए ज्ञान के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&nbsp;धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह व्रत आत्मशुद्धि, भूलवश हुए पापों के प्रायश्चित और शारीरिक शुद्धता से जुड़ा हुआ है। मान्यताओं के अनुसार, जाने-अनजाने में या दैनिक जीवन में हुए छुआछूत और रजस्वला (मासिक धर्म) के नियमों में हुई अनजानी चूकों के दोष से मुक्ति के लिए महिलाएं इस दिन विशेष रूप से व्रत रखती हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि आत्मिक और मानसिक शांति के लिए जीवन में स्वच्छता और अनुशासन कितना अनिवार्य है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&nbsp; सात्विक जीवन का संदेश: ऋषि पंचमी का व्रत बेहद सात्विक होता है। इस दिन व्रत रखने वाले लोग हल से जोते हुए खेतों का अन्न (जैसे गेहूं, चावल) ग्रहण नहीं करते हैं। इसके बजाय, पसई धान (तिन्नी का चावल) और कंद-मूल या बिना बोई गई सब्जियों का सात्विक आहार लिया जाता है। यह नियम हमें प्रकृति के साथ सीधे जुड़ने और सादगीपूर्ण जीवन जीने का संदेश देता है। यह त्यौहार हमारी समृद्ध सांस्कृतिक और वैज्ञानिक सोच का अनूठा उदाहरण है।</p>
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		<title>अटूट आस्था और त्याग का पावन पर्व ‘हरतालिका तीज’</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 13 Sep 2026 10:49:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[dharm adhyatm]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>भारतीय संस्कृति में त्यौहारों का विशेष महत्त्व है, और इनमें ‘हरतालिका तीज’ का व्रत महिलाओं के लिए सर्वोच्च स्थान रखता है। हर साल भाद्रपद माह के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व अखंड सौभाग्य, वैवाहिक सुख और अटूट निष्ठा का प्रतीक है। इस वर्ष यह पावन पर्व 14 सितंबर को बेहद&#160; [&#8230;]</p>
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<p class="wp-block-paragraph">भारतीय संस्कृति में त्यौहारों का विशेष महत्त्व है, और इनमें ‘हरतालिका तीज’ का व्रत महिलाओं के लिए सर्वोच्च स्थान रखता है। हर साल भाद्रपद माह के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व अखंड सौभाग्य, वैवाहिक सुख और अटूट निष्ठा का प्रतीक है। इस वर्ष यह पावन पर्व 14 सितंबर को बेहद&nbsp; पूर्ण श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">&nbsp; &nbsp;हरतालिका तीज का व्रत बेहद कठिन माना जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं अपने पति की दीर्घायु और सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए निराहार और निर्जला (बिना अन्न-जल के) व्रत रखती हैं। दिन भर कठिन नियमों का पालन करने के बाद, शाम को प्रदोष काल में भगवान् शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा की जाती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&nbsp; &nbsp;धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत की शुरुआत स्वयं माता पार्वती ने की थी। उन्होंने भगवान् शिव को पति रूप में पाने के लिए जंगलों में कठोर तपस्या की थी। ‘हरतालिका’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है— ‘हरत’ (हरण करना) और ‘आलिका’ (सखी)। पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती की सखियां उनका हरण करके घने जंगल में ले गई थीं, ताकि उनके पिता उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध न कर दें। जंगल में ही माता पार्वती ने रेत के शिवलिंग बनाकर घोर तप किया, जिससे प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>सांस्कृतिक महत्त्व</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">यह पर्व आधुनिक समाज में प्रेम, समर्पण और पारिवारिक मूल्यों को सुदृढ़ करने का संदेश देता है। व्रत के दिन महिलाएं सोलह शृंगार करती हैं, हाथों में मेहंदी रचाती हैं और पारंपरिक गीतों पर नृत्य करती हैं। रात भर जागरण कर शिव-पार्वती के भजनों से माहौल भक्तिमय होजाता है। यह त्यौहार हमारी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने और नई पीढ़ी को संस्कारों से जोड़ने का एक बेहद खूबसूरत माध्यम है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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		<title>पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम में हर्ष और उल्लास से मनाया गया गुरुपूर्णिमा पर्व</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 31 Jul 2026 14:27:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[dharm adhyatm]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>संकल्प शक्ति।&#160;अपने शिष्यों को सदैव कर्मक्षेत्र में बढ़ाने वाले; भक्ति, ज्ञान और आत्मशक्ति के पथ पर बढ़ने की प्रेरणा देने वाले सच्चिदानंंदस्वरूप ऋषिवर सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज को गुरुपूर्णिमा महापर्व पर कोटिश: प्रणाम। ऋषिवर सदैव कहते हैं कि ‘‘परमसत्ता से कुछ मांगो, तो केवल भक्ति, ज्ञान और आत्मशक्ति मांगो, क्योंकि इनमें सबकुछ [&#8230;]</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>संकल्प शक्ति।</strong>&nbsp;अपने शिष्यों को सदैव कर्मक्षेत्र में बढ़ाने वाले; भक्ति, ज्ञान और आत्मशक्ति के पथ पर बढ़ने की प्रेरणा देने वाले सच्चिदानंंदस्वरूप ऋषिवर सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज को गुरुपूर्णिमा महापर्व पर कोटिश: प्रणाम। ऋषिवर सदैव कहते हैं कि ‘‘परमसत्ता से कुछ मांगो, तो केवल भक्ति, ज्ञान और आत्मशक्ति मांगो, क्योंकि इनमें सबकुछ समाहित है।’’</p>



<p class="wp-block-paragraph">आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला गुरुपूर्णिमा महोत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपने गुरु के प्रति; शिष्य के आत्मसमर्पण, श्रद्धा और साधना का पावन प्रतीक है। इस वर्ष भी हमारे देश में इस पर्व की धूम रही। विशेषकर, मध्यप्रदेश के शहडोल ज़िले में स्थित पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम में इसे महापर्व के रूप में मनाया गया।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">29 जुलाई 2026 का यह पावन दिवस, पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम में ऋषिवर के शिष्यों व भक्तों का प्रवाह उमड़ पड़ा&nbsp; था। अतुलित श्रद्धाभाव में निमग्न, सिद्धाश्रम पहुँचे सभी शिष्यों-भक्तों ने परम पूज्य गुरुवरश्री की चरणपादुकाओं को स्पर्श करके जीवन को कृतार्थ किया।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमारी भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोपरि है और सनातन परंपरा में गुरु को साक्षात् परब्रह्म माना गया है। ‘गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर:’ यह श्लोक इसी सत्य को प्रतिपादित करता है। एक आध्यात्मिक गुरु अपने शिष्यों के भीतर से अज्ञानतारूपी अंधकार को नष्ट करके ज्ञान का दीप प्रज्ज्वलित करते हैं। समाज के निर्माण में भी सद्गुरुओं की भूमिका चिरकाल से अप्रतिम रही है। एक सुदृढ़, नैतिक और चरित्रवान् समाज का निर्माण सद्गुरु के मार्गदर्शन के बिना असंभव है और जब-जब समाज दिशाहीन हुआ है, गुरुसत्ता ने आगे आकर समाज को सही मार्ग दिखाया है।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>जहाँ से त्रिधाराएं&nbsp; प्रवाहित हैं</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">जहाँ से धर्मरक्षा, राष्ट्ररक्षा और मानवता के कल्याण की त्रिधाराएं प्रवाहित हैं, उसी पावन धाम ‘पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम’ में पूर्व के वर्षों की भांति इस वर्ष भी गुरुपूर्णिमा का पर्व अद्वितीय आध्यात्मिक भव्यता और अनुशासन के साथ मनाया गया। देश-देशान्तर से आए हज़ारों गुरुभाई-बहनों, ‘माँ’ के भक्तों, श्रद्धालुओं ने इस अलौकिक उत्सव में शामिल होकर अपने जीवन में संस्कारों का एक और क्रम जोड़ा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">गुरुपूर्णिमा की प्रात:कालीन बेला में परम पूज्य सद्Þगुरुदेव जी महाराज नित्यप्रति की तरह श्री दुगार्चालीसा अखण्ड पाठ मंदिर में पहुंचे और माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा व सहायक शक्तियों की दिव्य आरती करने के बाद कुछ समय के लिए ध्यानमग्न हो गए। इस दौरान चालीसा पाठ मंदिर में शालीनतापूर्वक पंक्तिबद्ध बैठे हुये हज़ारों भक्त ‘माँ’ का गुणगान करते रहे। आरती व ध्यान का क्रम पूर्ण करने के बाद आपश्री ने मूलध्वज साधना मंदिर में जाकर वहाँ नवीन शक्तिध्वज के रोहण के साथ ही मातेश्वरी की पूजा-अर्चना की और जनकल्याण की कामना को लेकर मंदिर के मुख्य घंटे पर चुनरी बांधी। इस अवसर पर पूजनीया शक्तिमयी माता जी, शक्तिस्वरूपा बहनों व सिद्धाश्रम चेतनाओं की भी पावन उपस्थिति रही।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>गुरुवरश्री का&nbsp; चरण पूजन</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">मूलध्वज साधना मंदिर में दिव्यक्रम सम्पन्न होने के बाद प्रणामभवन में शक्तिस्वरूपा बहनों ने परम पूज्य गुरुवर के श्रीचरणों का पूजन किया और सभी शिष्य पंक्तिबद्ध होकर गुरुवरश्री की चरणपादुकाओं का स्पर्श करके आनन्दित रहे। प्रात:कालीन बेला की तरह सायंकालीन बेला में भी माता जगदम्बे की दिव्य आरती व गुरुचरणपादुकाओं को स्पर्श करने का क्रम पूर्ण किया गया।&nbsp;&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>सभी ने ग्रहण किया महाप्रसाद</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">गुरुपूर्णिमा के इस महोत्सव में नित्यप्रति की तरह अन्नपूर्णा भण्डारे का अनवरत संचालन किया गया, जहां हज़ारों लोगों ने पूड़ी-सब्जी, दाल-चावल के रूप में भोजन प्रसाद सानन्द ग्रहण किया।&nbsp; &nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>गुरुपूर्णिमा महोत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">आज के इस भौतिकवादी समय में, जहाँ मानवीयमूल्यों का निरंतर ह्रास हो रहा है, गुरुपूर्णिमा जैसे पर्व समाज को आत्मिक शांति और सही दिशा दिखाने का कार्य करते हैं। पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम में यह गुरुपूर्णिमा पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं, बल्कि यह बदलते भारत में आत्मोत्थान, समाजसुधार और आध्यात्मिक पुनर्जागरण का जीवंत प्रतीक है। परम पूज्य सद्गुरुदेव योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के श्रीचरणों में समर्पित शिष्यों-भक्तों का प्रवाह, यह प्रमाणित करता है कि यदि अध्यात्म को मानवता की सेवा, धर्मरक्षा और राष्ट्ररक्षा जैसे मानवीय कर्त्तव्यों से जोड़ दिया जाए, तो कलिकाल के अंधकार को मिटाकर एक आदर्श और शांतिपूर्ण समाज की स्थापना निश्चित रूप से की जा सकती है।</p>
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		<title>सनातन धर्मवलम्बियों के लिए पितृमोक्ष अमावस्या पुण्यमयी पर्व है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 20 Sep 2025 05:24:40 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विविध समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Desh Pradesh]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पितृमोक्ष अमावस्या हिन्दूधर्म में मनाया जाने वाला पुण्यमयी पर्व है। पितृपक्ष में आने वाली अमावस्या को सर्व पितृमोक्ष अमावस्या कहा जाता है। मान्यता है कि पितृपक्ष में हमारे पूर्वज इस पृथ्वी पर आते हैं। सर्व पितृमोक्ष अमावस्या पितरों का इस धरती से विदाई लेने का दिन है। इस दिन सभी के पूर्वज इस भवसागर से [&#8230;]</p>
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<p class="wp-block-paragraph">पितृमोक्ष अमावस्या हिन्दूधर्म में मनाया जाने वाला पुण्यमयी पर्व है। पितृपक्ष में आने वाली अमावस्या को सर्व पितृमोक्ष अमावस्या कहा जाता है। मान्यता है कि पितृपक्ष में हमारे पूर्वज इस पृथ्वी पर आते हैं। सर्व पितृमोक्ष अमावस्या पितरों का इस धरती से विदाई लेने का दिन है। इस दिन सभी के पूर्वज इस भवसागर से पुन: मुक्त होकर परलोक की ओर चले जाते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>सर्व पितृमोक्ष अमावस्या की तिथि और मुहूर्त</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">वर्ष 2025 में सर्व पितृमोक्ष अमावस्या का शुभ मुहूर्त 21 सितंबर 2025 को रात्रि 12 बजकर 16 मिनट पर प्रारंभ हो जाएगा और इसका समापन 22 सितंबर को दोपहर 01 बजकर 23 मिनट पर होगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>आश्विन अमावस्या का महत्त्व</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन किया गया श्राद्ध&nbsp; परिवार के सभी पूर्वजों की आत्माओं को प्रसन्न करता है। इसलिए इस दिन सभी पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध करना चाहिए। इस दिन ज्ञात, अज्ञात सभी पितरों के श्राद्ध का विधान है। इसलिए जिन भी लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती; वो सर्व पितृ मोक्ष अमावस्या के पुण्यकारी अवसर पर अपने पितरों का तर्पण और श्राद्ध कर सकते हैं। इस दिन तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करने से पितर प्रसन्न होते हैं और परिवार के सभी लोगों को अपना आशीर्वाद देते हैं।</p>
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		<title>अनंत चतुर्दशी को गणेश जी होंगे विदा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Sep 2025 06:30:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[Desh Pradesh]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>गणेश चतुर्थी से प्रथम पूज्य देवता गणेश जी का जन्मोत्सव प्रारम्भ है, जो अनन्त चतुर्दशी तक चलेगा। इस तिथि को उत्सव के अंतिम दिन के रूप में चिह्नित किया गया है, इसके अगले दिन भक्तगण भगवान् गणेश जी की मूर्तियों को सरोवरों में विसर्जित करके उन्हें विदाई देते हैं।&#160;&#160; ज्ञातव्य है हमारे भारत देश में [&#8230;]</p>
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<p class="wp-block-paragraph">गणेश चतुर्थी से प्रथम पूज्य देवता गणेश जी का जन्मोत्सव प्रारम्भ है, जो अनन्त चतुर्दशी तक चलेगा। इस तिथि को उत्सव के अंतिम दिन के रूप में चिह्नित किया गया है, इसके अगले दिन भक्तगण भगवान् गणेश जी की मूर्तियों को सरोवरों में विसर्जित करके उन्हें विदाई देते हैं।&nbsp;&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">ज्ञातव्य है हमारे भारत देश में गणपति बप्पा का जन्मोत्सव दस दिनों तक अत्यन्त ही धूमधाम से मनाया जाता है। हिन्दूधर्मावलम्बियों के हर तीसरे-चौथे घर में और हर बस्ती में, नगरों में जगह-जगह गणेश प्रतिमाएं स्थपित करके उनकी विधि-विधान के साथ पूजा की जाती है। कहते हैं कि भगवान् गणेश जी की पूजा-अर्चना, पूर्ण सात्विकता के साथ करने पर बुद्धि-विवेकरूपी चेतनात्मक शक्ति का विकास होता है।</p>
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		<title>गोसेवा समर्पण दिवस</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 03 Sep 2025 08:30:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म अध्यात्म]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>संकल्प शक्ति। भाद्रपद शुक्लपक्ष की अष्टमी, दिनांक 31 अगस्त को हर माह की तरह इस माह भी पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम स्थित त्रिशक्ति गोशाला में गोसेवा समर्पण दिवस मनाया गया। प्रात:कालीन आरतीक्रम के उपरान्त सिद्धाश्रमवासी व आगन्तुक कुछ गुरुभाई-बहन गोशाला पहुंचे और वहाँ की अच्छी तरह सफाई की तथा गऊमाताओं व बछड़ों को अच्छी तरह नहलाया। [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">संकल्प शक्ति। भाद्रपद शुक्लपक्ष की अष्टमी, दिनांक 31 अगस्त को हर माह की तरह इस माह भी पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम स्थित त्रिशक्ति गोशाला में गोसेवा समर्पण दिवस मनाया गया। प्रात:कालीन आरतीक्रम के उपरान्त सिद्धाश्रमवासी व आगन्तुक कुछ गुरुभाई-बहन गोशाला पहुंचे और वहाँ की अच्छी तरह सफाई की तथा गऊमाताओं व बछड़ों को अच्छी तरह नहलाया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रात: लगभग 09:30 बजे परम पूज्य सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज और पूजनीया शक्तिमयी माता जी त्रिशक्ति गोशाला पहुंचे और अपने करकमलों से गायों को, बछड़ों को अपने करकमलों से रोटियाँ खिलाने के साथ ही सभी को अपना प्यार-दुलार दिया।&nbsp;&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">ज्ञातव्य है कि ऋषिवर श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने गोसेवा के प्रति समाज का रुझान बढ़े और सभी के घरों में सुख-शान्ति का वास रहे, इस उद्देश्य को लेकर शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को गोसेवा समर्पण दिवस घोषित किया है। तथापि गऊमाताओं की सेवा के प्रति गुरुभाई-बहनों का रुझान तो बढ़ा ही है, समाज भी इसके लिए प्रेरित हुआ है। ऋषिवर का कथन है कि ‘‘गऊ सेवा, बहुत बड़े पुण्य का कार्य है। हर परिवार में एक-दो गायें अवश्य होनी चाहिए। इससे परिवारजनों को शुद्ध दूध, दही, मक्खन, घी तो प्राप्त होगा ही, गाय के गोबर से घर का आंगन व बाहर लिपाई-पुताई करके वातावरण को शुद्ध बना सकते हैं। इससे संक्रामक बीमारियों से बचा जा सकता है।’’&nbsp;</p>
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		<title>शक्ति और चेतना से आएगा सामाजिक परिवर्तन: सौरभ द्विवेदी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 03 Sep 2025 08:30:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जनजागरण]]></category>
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		<category><![CDATA[janjagran]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सीधी। जनकल्याण की दृष्टि से भगवती मानव कल्याण संगठन एवं पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम ट्रस्ट के संयुक्त तत्त्वावधान में देशस्तर पर दिव्य अनुष्ठान कराए जा रहे हैं। इसी क्रम में, दिनांक 30-31 अगस्त को साड़ा भवन, तहसील-बहरी, ज़िला-सीधी, मध्यप्रदेश में 24 घंटे का श्री दुर्गाचालीसा अखण्ड पाठ मनोरम वातावरण मेें सम्पन्न किया गया। समापन अवसर पर [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">सीधी। जनकल्याण की दृष्टि से भगवती मानव कल्याण संगठन एवं पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम ट्रस्ट के संयुक्त तत्त्वावधान में देशस्तर पर दिव्य अनुष्ठान कराए जा रहे हैं। इसी क्रम में, दिनांक 30-31 अगस्त को साड़ा भवन, तहसील-बहरी, ज़िला-सीधी, मध्यप्रदेश में 24 घंटे का श्री दुर्गाचालीसा अखण्ड पाठ मनोरम वातावरण मेें सम्पन्न किया गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">समापन अवसर पर उपस्थित भारतीय शक्ति चेतना पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सिद्धाश्रमरत्न सौरभ द्विवेदी ‘अनूप भइया’ जी ने अपनी चिरपरिचित मधुर शैली में कहा कि ‘‘भाइयों-बहनों, धर्म-अध्यात्म एक मार्ग है और पूजा-पाठ, त्याग-अनुष्ठान एक पद्धति है। जिस प्रकार औषधियों के माध्यम से हम अपनी काया को निरोगी बनाते हैं, उसी प्रकार पूजा-पाठ करने से, विकारों का त्याग करने से और दिव्यअनुष्ठान के माध्यम से हमारा जीवन सुख-शान्ति से परिपूर्ण रहता है और हम सतोगुणी मार्ग पर चलते हुए, इसी पथ पर समाज को आगे बढ़ा सकते हैं, तो श्रीदुर्गाचासलीसा पाठ के माध्यम से समाज में शक्ति और चेतना का संचार किया जा रहा है और इसी के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन आएगा। यदि किसी के जीवन में शान्ति नहीं है, बेचैनी है, विषमताएं चारोंओर से घेरे हुए हैं, तो समझिए कि देवी-देवताओं का आशीर्वाद उसके ऊपर नहीं है। आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आपको धर्म-अध्यात्म के पथ पर चलना ही पड़ेगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यहाँ सम्पन्न यह दिव्य अनुष्ठान, निश्चय ही आप सभी के स्वर्णिम सौभाग्य के उदय का द्योतक है। लेकिन, प्राप्त इस सौभाग्य का लाभ आप तभी प्राप्त कर पाएंगे, जब नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान् जीवन धारण करके अपने कार्य-व्यवहार में सात्विकता बनाए रखेंगे। नित्यप्रति प्रात: उठने के साथ ही यह निश्चय करें कि मैं किसी के प्रति द्वेषभाव नहीं रखूंगा और स्वभाव को मधुर रखूंगा। कोई भी समस्या सामने आने पर विचलित नहीं होऊंगा और उस समस्या को निवेदनार्थ ‘माँ’-गुरुवर की दिव्यछवि के समक्ष रखकर धीरे-धीरे सुलझाने का प्रयास करूंगा। ये विचार ही आपको निश्चिंतता व निर्भयता प्रदान कर सकते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज हम सभी को मानवीय गुणों से ओतप्रोत कर देना चाहते हैं। उनकी व्याकुलता, जो कि मानवता की सेवा, धर्मरक्षा और राष्ट्ररक्षा के लिये भगवती मानव कल्याण संगठन, पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम और भारतीय शक्ति चेतना पार्टी के नाम से त्रिधाराओं के रूप में प्रकट हुई है, उनकी विचारधाराओं के अनुरूप कर्त्तव्यकर्म करते हुए अपनी सद्प्रवृत्तियों के आलोक से परिवार, समाज और देश को प्रकाशित करें।’’&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">उद्बोधनक्रम के पश्चात् उपस्थित जनसमुदाय ने शक्तिजल और प्रसाद ग्रहण किया तथा शुभविचारों से युक्त मन के साथ सभी अपने गन्तव्य की ओर प्रस्थित हुए।</p>



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		<title>ब्राह्मण वामन ने दो पग में नाप लिया था धरती और देवलोक</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 02 Sep 2025 09:50:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[devotional]]></category>
		<category><![CDATA[mythology]]></category>
		<category><![CDATA[news]]></category>
		<category><![CDATA[sanatan dharm]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>श्री वामन भगवान् विष्णु के अवतार है। त्रेतायुग के प्रारम्भ होने में भगवान् विष्णु ने बक्सर में मां गंगा के तट पर सिद्धाश्रम स्थल पर वामन रूप में देवी अदिति के गर्भ से उत्पन्न हुए। इसीलिए इस स्थान को वामन जन्मस्थली एवं वामनाश्रम भी कहते हैं। इसके साथ ही यह भगवान् विष्णु के पहले ऐसे [&#8230;]</p>
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<p class="wp-block-paragraph">श्री वामन भगवान् विष्णु के अवतार है। त्रेतायुग के प्रारम्भ होने में भगवान् विष्णु ने बक्सर में मां गंगा के तट पर सिद्धाश्रम स्थल पर वामन रूप में देवी अदिति के गर्भ से उत्पन्न हुए। इसीलिए इस स्थान को वामन जन्मस्थली एवं वामनाश्रम भी कहते हैं। इसके साथ ही यह भगवान् विष्णु के पहले ऐसे अवतार थे, जो मानव रूप में प्रकट हुए।&nbsp; &nbsp;दक्षिण भारत में इनके मूल नाम उपेन्द्र से जाना जाता है। इनके पिता प्रजापति कश्यप थे तथा माता अदिति थीं।&nbsp;&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">&nbsp;कथा के अनुसार, भगवान् विष्णु ने इन्द्र का देवलोक में अधिकार पुन: स्थापित करने के लिए यह अवतार लिया, क्योंकि देवलोक को असुर राजा बलि ने हड़प लिया था। बलि विरोचन के पुत्र तथा विष्णु भक्त प्रह्लाद के पौत्र थे और एक दयालु असुर राजा के रूप में जाने जाते थे। यह भी कहा जाता है कि अपनी तपस्या तथा शक्ति के माध्यम से बलि ने त्रिलोक पर अधिपत्य पा लिया था।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">वामन, एक बौने ब्राह्मण के वेष में बलि के पास गये और उनसे अपने रहने के लिए तीन पग भूमि देने का आग्रह किया। उनके हाथ में एक लकड़ी का छत्र (छाता) था। गुरु शुक्राचार्य के चेताने पर भी बलि ने वामन को वचन दे डाला कि तभी ब्राह्मण वामन ने अपना आकार इतना बढ़ा लिया कि पहले ही पग में पूरा भूलोक (पृथ्वी) को और दूसरे पग में देवलोक नाप लिया। तीसरे पग के लिए कोई भूमि बची ही नहीं। वचन के पक्के बलि ने तब वामन को तीसरा पग रखने के लिए अपना सिर प्रस्तुत कर दिया। वामन बलि की वचनबद्धता से अतिप्रसन्न हुये और बलि को पाताललोक देने का निश्चय किया तथा अपना तीसरा पग बलि के सिर में रखा, जिसके फलस्वरूप बलि पाताल में पहुँच गये।</p>



<p class="wp-block-paragraph">एक और कथा के अनुसार, वामन ने बलि के सिर पर अपना पैर रखकर उनको अमरत्व प्रदान कर दिया। विष्णु अपने विराट रूप में प्रकट हुये और राजा को महाबलि की उपाधि प्रदान की, क्योंकि बलि ने अपनी धर्मपरायणता तथा वचनबद्धता के कारण अपने आप को महात्मा सिद्ध कर दिया था। विष्णु ने महाबलि को अध्यात्मिक आकाश पर जाने की अनुमति दे दी, जहाँ उनका अपने दादा भक्त प्रहलाद व अन्य दैवीय आत्माओं से मिलना हुआ।&nbsp;</p>
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		<title>नित्यप्रति करें ‘माँ’ की साधना-आराधना</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Jul 2025 07:00:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जनजागरण]]></category>
		<category><![CDATA[chalis path]]></category>
		<category><![CDATA[hindu]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>कानपुर सौरभ मिश्र। हर माह की भांति इस माह भी द्वितीय रविवार को भगवती मानव कल्याण संगठन एवं पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम ट्रस्ट के संयुक्त तत्त्वावधान में राम जानकी वाटिका, हमीरपुर रोड, ज़िला- कानपुर नगर में महाआरतीक्रम संपन्न किया गया। समापन अवसर पर संगठन के केन्द्रीय प्रवक्ता रमेशचंद्र मिश्र जी&#160; ने कहा कि मानवजीवन पाने के [&#8230;]</p>
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<p class="wp-block-paragraph">कानपुर सौरभ मिश्र। हर माह की भांति इस माह भी द्वितीय रविवार को भगवती मानव कल्याण संगठन एवं पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम ट्रस्ट के संयुक्त तत्त्वावधान में राम जानकी वाटिका, हमीरपुर रोड, ज़िला- कानपुर नगर में महाआरतीक्रम संपन्न किया गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">समापन अवसर पर संगठन के केन्द्रीय प्रवक्ता रमेशचंद्र मिश्र जी&nbsp; ने कहा कि मानवजीवन पाने के साथ, एक ऋषिवर की यात्रा&nbsp; भी मिल जाए, तो जीवन में इससे बड़ा सौभाग्य और कुछ हो ही नहीं सकता। आपका चयन गुरुवर ने समाज में परिवर्तन लाने के लिए किया है, आप साधारण व्यक्ति नहीं है। साधक बनो, माता भगवती की नित्यप्रति साधना-आराधना करो, आपकी&nbsp; हर समस्या का&nbsp; समाधान होगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&nbsp; टीम प्रमुख सुनीता शर्मा जी ने उपस्थित जनसमुदाय को सम्बोधित करते हुए कहा कि महाआरती का यह क्रम ऊर्जा का स्रोत है। यहाँ से ऊर्जा को प्राप्त करके हम स्वयं तो चेतनावान् बनते ही हैं, समाज को भी चेतनावान् बनाने का कार्य करते हैं। आप सभी श्री दुर्गाचालीसा का पाठ नित्यप्रति अपने घरों में करें, इससे आपके घर में&nbsp; शांति आएगी और माता जगदम्बे की कृपा मिलेगी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उद्बोधनक्रम के पश्चात् अनूप बाजपेई जी ने कार्यक्रम में आए हुए ‘माँ’ के भक्तों के प्रति आभार जताया।</p>
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		<title>51 शक्तिपीठों में से एक है कामाख्या मंदिर</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 08 Jul 2025 04:20:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[dharm adhyatm]]></category>
		<category><![CDATA[gowahati news]]></category>
		<category><![CDATA[hindu dharm]]></category>
		<category><![CDATA[kamakhya mandir]]></category>
		<category><![CDATA[puja path]]></category>
		<category><![CDATA[sanatan dharm]]></category>
		<category><![CDATA[shakti peeth]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#160;गुवाहाटी। असम की नीलांचल पहाड़ी पर स्थित कामाख्या मंदिर देवी शक्ति और अध्यात्मिक ऊर्जा का एक बहुत ही पवित्र और खास स्थान है। मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है और दुनियाभर से लाखों भक्त यहां दर्शन के लिए आते हैं। यहां का सबसे बड़ा त्योहार अंबुबाची मेला है, जो देवी कामाख्या के मासिक धर्म [&#8230;]</p>
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<p class="wp-block-paragraph">&nbsp;गुवाहाटी। असम की नीलांचल पहाड़ी पर स्थित कामाख्या मंदिर देवी शक्ति और अध्यात्मिक ऊर्जा का एक बहुत ही पवित्र और खास स्थान है। मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है और दुनियाभर से लाखों भक्त यहां दर्शन के लिए आते हैं। यहां का सबसे बड़ा त्योहार अंबुबाची मेला है, जो देवी कामाख्या के मासिक धर्म (पीरियड्स) से जुड़ी एक अनोखी और पुरानी परंपरा के साथ सम्बद्ध है। इस वर्ष अंबूबाची मेला 22 जून से प्रारम्भ हुआ और 26 जून तक चला।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अंबुबाची, ये नाम मॉनसून और देवी के मासिक धर्म, दोनों को दर्शाता है। इस त्यौहार को कामाख्या देवी के सालाना मासिक धर्म चक्र के रूप में मनाया जाता है। इसकी शुरुआत तांत्रिक परंपरा और मान्यताओं से जुड़ी हुई है। माना जाता है कि जब भगवान&nbsp; शिव तांडव कर रहे थे, तब देवी सती की योनि (गर्भस्थान) यहीं गिरी थी। इसलिए ये जगह शक्ति का प्रतीक मानी जाती है। इस त्यौहार के दौरान लोग&nbsp; मासिक धर्म जैसी चीजों की सुरक्षा करने वाली माता को पूजते हैं। पहले के समय में, जब ये पर्व हुआ करता था, तब खेतों में काम भी रोक दिया जाता था। अंबुबाची केवल एक धार्मिक पर्व ही नहीं है, ये एक प्राकृतिक प्रक्रिया (जैसे पीरियड्स) को समझने और सम्मान देने का भी तरीका है। माना जाता है कि इस दौरान देवी की शक्ति मंदिर के अंदर आराम करती हैं।</p>
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