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	<title>धर्म अध्यात्म &#8211; संकल्प शक्ति</title>
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	<description>राष्ट्रीय साप्ताहिक समाचार पत्र</description>
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	<title>धर्म अध्यात्म &#8211; संकल्प शक्ति</title>
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		<title>सावन के आखिरी सोमवार को माना गया है पूर्णता का प्रतीक</title>
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		<pubDate>Sun, 23 Aug 2026 11:31:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>संकल्प शक्ति। सावन का महीना हमारे सनातन संस्कृति में आत्मिक शुद्धि, प्रकृति से जुड़ाव और देवाधिदेव महादेव की आराधना का सबसे पावन काल माना जाता है। इस वर्ष 24 अगस्त को उत्तर भारत के हिंदू कैलेंडर के अनुसार चतुर्थ और अंतिम श्रावण सोमवार है। यह दिन सावन के पूरे महीने चली कठिन साधना, उपवास और [&#8230;]</p>
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<p class="wp-block-paragraph">संकल्प शक्ति। सावन का महीना हमारे सनातन संस्कृति में आत्मिक शुद्धि, प्रकृति से जुड़ाव और देवाधिदेव महादेव की आराधना का सबसे पावन काल माना जाता है। इस वर्ष 24 अगस्त को उत्तर भारत के हिंदू कैलेंडर के अनुसार चतुर्थ और अंतिम श्रावण सोमवार है। यह दिन सावन के पूरे महीने चली कठिन साधना, उपवास और कांवड़ यात्राओं के समापन की ओर बढ़ने का प्रतीक है।&nbsp;&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>चतुर्थ सोमवार का धार्मिक महत्त्व&nbsp;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">शास्त्रों में सावन के आखिरी सोमवार को ‘पूर्णता का प्रतीक’ माना गया है। मान्यता है कि जिन्होंने पूरे महीने व्रत नहीं रखा, यदि वे इस अंतिम सोमवार को पूर्ण निष्ठा से शिव-पार्वती की पूजा करते हैं, तो उन्हें पूरे सावन मास की पूजा का फल प्राप्त होता है।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>&nbsp;समसामयिक परिप्रेक्ष्य&nbsp;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">आज के आधुनिक दौर में सावन का यह अंतिम सोमवार केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन प्रबंधन का एक बड़ा पाठ है।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>पर्यावरण का संरक्षण</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">सावन का महीना प्रकृति के सबसे सुंदर रूप यानी ‘हरियाली’ का उत्सव है। शिवजी को चढ़ाई जाने वाली सामग्री (जैसे बेलपत्र, दूर्वा, जल) हमें प्रकृति के करीब लाती है। यह दिन हमें जल संरक्षण और वृक्षारोपण का संकल्प लेने की प्रेरणा देता है।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>सहनशीलता और&nbsp; मानसिक शांति&nbsp;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और तनाव के बीच शिव का ‘ध्यान मग्न’ स्वरूप हमें मानसिक स्थिरता सिखाता है। समुद्र मंथन के दौरान विष पीकर ‘नीलकंठ’ कहलाने वाले शिव हमें सिखाते हैं कि समाज की कड़वाहट और नकारात्मकता को पचाकर कैसे लोक-कल्याण (सद्भाव) का मार्ग चुना जाता है।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>शिवत्व को आत्मसात करने का दिन&nbsp;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">सावन का आखिरी सोमवार महादेव से दूर होने का दिन नहीं है, बल्कि उनके &#8216;शिवत्व&#8217; (कल्याणकारी गुण) को अपने भीतर स्थापित करने का दिन है। पूजा और उपवास की सार्थकता तभी है जब हम अपने भीतर के अहंकार, ईर्ष्या और क्रोध का विसर्जन करें।&nbsp;&nbsp;</p>
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		<title>सनातन धर्म में हर पूजा में क्यों गूंजती है घंटी और शंख की ध्वनि?</title>
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		<pubDate>Mon, 10 Aug 2026 04:36:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>हमारे सनातन धर्म में किसी भी मांगलिक कार्य, आरती या पूजा-अर्चना की शुरुआत शंख और घंटी की सुरीली ध्वनि के बिना अधूरी मानी जाती है। यह गूंज केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरे आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक रहस्य छिपे हैं।&#160; घंटी की ध्वनि &#160; घंटी की ध्वनि देवताओं का आह्वान और एकाग्रता का [&#8230;]</p>
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<p class="wp-block-paragraph">हमारे सनातन धर्म में किसी भी मांगलिक कार्य, आरती या पूजा-अर्चना की शुरुआत शंख और घंटी की सुरीली ध्वनि के बिना अधूरी मानी जाती है। यह गूंज केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरे आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक रहस्य छिपे हैं।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>घंटी की ध्वनि</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">&nbsp; घंटी की ध्वनि देवताओं का आह्वान और एकाग्रता का माध्यम है। सनातन परंपरा में पूजा के समय घंटी बजाना अनिवार्य माना गया है। शास्त्रों में घंटी की ध्वनि को लेकर स्पष्ट उल्लेख मिलते हैं।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>आध्यात्मिक महत्त्व:</strong> घंटी बजाने का मुख्य उद्देश्य देवताओं को जाग्रत् करना और उन्हें अपनी पूजा स्वीकार करने के लिए आमंत्रित करना है। घंटी की गूंज से मंदिर या घर में एक पवित्र वातावरण बनता है, जिससे मन तुरंत सांसारिक विचारों को छोड़कर परमसत्ता की ओर एकाग्र होजाता है। </p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>वैज्ञानिक दृष्टिकोण:</strong> वैज्ञानिकों के अनुसार, जब पीतल, तांबे और कांसे जैसी धातुओं से बनी घंटी को बजाया जाता है, तो उससे एक तीव्र कंपन पैदा होता है। यह कंपन वातावरण में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया, वायरस और सूक्ष्म जीवाणुओं को नष्ट कर देता है, जिससे आसपास की वायु शुद्ध और स्वच्छ होजाती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>मस्तिष्क पर प्रभाव:</strong> घंटी की गूंज से निकलने वाली तरंगें हमारे मस्तिष्क के बाएं और दाएं हिस्से को संतुलित करती हैं। यह ध्वनि हमारे शरीर के हीलिंग सेंटर्स (ऊर्जा केंद्रों) को सक्रिय करती है, जिससे मानसिक तनाव कम होता है और शांति का अनुभव होता है।       </p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>शंख की ध्वनि&nbsp;&nbsp;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">विजय, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा के प्रतीक शंख को समुद्र मंथन से निकले 14 रत्नों में से एक माना गया है, जिसे माता लक्ष्मी का सहोदर (भाई) भी कहा जाता है। इसलिए जहां शंख होता है, वहां समृद्धि का वास होता है। </p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>आध्यात्मिक महत्त्व:</strong> शंख की ध्वनि को ॐ की मूल ध्वनि के समकक्ष माना गया है। इसकी गूंज को ब्रह्मांड की नाद-ब्रह्म ध्वनि कहा जाता है। पूजा के प्रारंभ में शंख बजाने से आस-पास की सभी नकारात्मक और आसुरी शक्तियां तुरंत दूर भाग जाती हैं और सात्विक ऊर्जा का संचार होता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>वैज्ञानिक दृष्टिकोण:</strong> शंख बजाना एक बेहतरीन श्वसन व्यायाम (ब्रीदिंग एक्सरसाइज) है। इसे नियमित रूप से बजाने से फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ती है, श्वास संबंधी बीमारियां (जैसे अस्थमा) दूर होती हैं और हृदय स्वस्थ रहता है। </p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>वातावरण का शुद्धिकरण:</strong> माना जाता है कि शंख की ध्वनि जहां तक जाती है, वहां तक की हवा शुद्ध होजाती है। इसके शक्तिशाली कंपन पर्यावरण से हानिकारक तत्त्वों को सोख लेते हैं। </p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>जल का औषधीय गुण:</strong> शंख में रात भर रखे गए पानी में फास्फोरस, कैल्शियम और गंधक जैसे तत्त्व समाहित होजाते हैं। सुबह इस जल का छिड़काव करने से घर पवित्र होता है और इसे पीने से त्वचा व पेट की बीमारियां ठीक होती हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>विज्ञान और आस्था का अद्भुत संगम: </strong>सनातन धर्म की यह सुंदर परंपरा यह साबित करती है कि हमारे पूर्वज और ऋषि-मुनि अत्यंत दूरदर्शी थे। उन्होंने जिन क्रियाओं को धर्म और आस्था से जोड़ा, वे सीधे तौर पर मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा से जुड़ी हुर्इं थीं। घंटी और शंख की सम्मिलित ध्वनि हमारे घर-आंगन को केवल पवित्र ही नहीं बनाती, बल्कि हमारे तन, मन और विचारों को भी एक नई सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है।</p>


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<figure class="aligncenter size-full"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="512" height="384" src="https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2026/08/shankh-1.webp" alt="shankh 1" class="wp-image-13111" title="सनातन धर्म में हर पूजा में क्यों गूंजती है घंटी और शंख की ध्वनि? 1" srcset="https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2026/08/shankh-1.webp 512w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2026/08/shankh-1-300x225.webp 300w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2026/08/shankh-1-80x60.webp 80w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2026/08/shankh-1-150x113.webp 150w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2026/08/shankh-1-265x198.webp 265w" sizes="(max-width: 512px) 100vw, 512px" /></figure>
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		<title>पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम में हर्ष और उल्लास से मनाया गया गुरुपूर्णिमा पर्व</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 31 Jul 2026 14:27:54 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>संकल्प शक्ति।&#160;अपने शिष्यों को सदैव कर्मक्षेत्र में बढ़ाने वाले; भक्ति, ज्ञान और आत्मशक्ति के पथ पर बढ़ने की प्रेरणा देने वाले सच्चिदानंंदस्वरूप ऋषिवर सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज को गुरुपूर्णिमा महापर्व पर कोटिश: प्रणाम। ऋषिवर सदैव कहते हैं कि ‘‘परमसत्ता से कुछ मांगो, तो केवल भक्ति, ज्ञान और आत्मशक्ति मांगो, क्योंकि इनमें सबकुछ [&#8230;]</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>संकल्प शक्ति।</strong>&nbsp;अपने शिष्यों को सदैव कर्मक्षेत्र में बढ़ाने वाले; भक्ति, ज्ञान और आत्मशक्ति के पथ पर बढ़ने की प्रेरणा देने वाले सच्चिदानंंदस्वरूप ऋषिवर सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज को गुरुपूर्णिमा महापर्व पर कोटिश: प्रणाम। ऋषिवर सदैव कहते हैं कि ‘‘परमसत्ता से कुछ मांगो, तो केवल भक्ति, ज्ञान और आत्मशक्ति मांगो, क्योंकि इनमें सबकुछ समाहित है।’’</p>



<p class="wp-block-paragraph">आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला गुरुपूर्णिमा महोत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपने गुरु के प्रति; शिष्य के आत्मसमर्पण, श्रद्धा और साधना का पावन प्रतीक है। इस वर्ष भी हमारे देश में इस पर्व की धूम रही। विशेषकर, मध्यप्रदेश के शहडोल ज़िले में स्थित पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम में इसे महापर्व के रूप में मनाया गया।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">29 जुलाई 2026 का यह पावन दिवस, पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम में ऋषिवर के शिष्यों व भक्तों का प्रवाह उमड़ पड़ा&nbsp; था। अतुलित श्रद्धाभाव में निमग्न, सिद्धाश्रम पहुँचे सभी शिष्यों-भक्तों ने परम पूज्य गुरुवरश्री की चरणपादुकाओं को स्पर्श करके जीवन को कृतार्थ किया।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमारी भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोपरि है और सनातन परंपरा में गुरु को साक्षात् परब्रह्म माना गया है। ‘गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर:’ यह श्लोक इसी सत्य को प्रतिपादित करता है। एक आध्यात्मिक गुरु अपने शिष्यों के भीतर से अज्ञानतारूपी अंधकार को नष्ट करके ज्ञान का दीप प्रज्ज्वलित करते हैं। समाज के निर्माण में भी सद्गुरुओं की भूमिका चिरकाल से अप्रतिम रही है। एक सुदृढ़, नैतिक और चरित्रवान् समाज का निर्माण सद्गुरु के मार्गदर्शन के बिना असंभव है और जब-जब समाज दिशाहीन हुआ है, गुरुसत्ता ने आगे आकर समाज को सही मार्ग दिखाया है।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>जहाँ से त्रिधाराएं&nbsp; प्रवाहित हैं</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">जहाँ से धर्मरक्षा, राष्ट्ररक्षा और मानवता के कल्याण की त्रिधाराएं प्रवाहित हैं, उसी पावन धाम ‘पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम’ में पूर्व के वर्षों की भांति इस वर्ष भी गुरुपूर्णिमा का पर्व अद्वितीय आध्यात्मिक भव्यता और अनुशासन के साथ मनाया गया। देश-देशान्तर से आए हज़ारों गुरुभाई-बहनों, ‘माँ’ के भक्तों, श्रद्धालुओं ने इस अलौकिक उत्सव में शामिल होकर अपने जीवन में संस्कारों का एक और क्रम जोड़ा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">गुरुपूर्णिमा की प्रात:कालीन बेला में परम पूज्य सद्Þगुरुदेव जी महाराज नित्यप्रति की तरह श्री दुगार्चालीसा अखण्ड पाठ मंदिर में पहुंचे और माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा व सहायक शक्तियों की दिव्य आरती करने के बाद कुछ समय के लिए ध्यानमग्न हो गए। इस दौरान चालीसा पाठ मंदिर में शालीनतापूर्वक पंक्तिबद्ध बैठे हुये हज़ारों भक्त ‘माँ’ का गुणगान करते रहे। आरती व ध्यान का क्रम पूर्ण करने के बाद आपश्री ने मूलध्वज साधना मंदिर में जाकर वहाँ नवीन शक्तिध्वज के रोहण के साथ ही मातेश्वरी की पूजा-अर्चना की और जनकल्याण की कामना को लेकर मंदिर के मुख्य घंटे पर चुनरी बांधी। इस अवसर पर पूजनीया शक्तिमयी माता जी, शक्तिस्वरूपा बहनों व सिद्धाश्रम चेतनाओं की भी पावन उपस्थिति रही।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>गुरुवरश्री का&nbsp; चरण पूजन</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">मूलध्वज साधना मंदिर में दिव्यक्रम सम्पन्न होने के बाद प्रणामभवन में शक्तिस्वरूपा बहनों ने परम पूज्य गुरुवर के श्रीचरणों का पूजन किया और सभी शिष्य पंक्तिबद्ध होकर गुरुवरश्री की चरणपादुकाओं का स्पर्श करके आनन्दित रहे। प्रात:कालीन बेला की तरह सायंकालीन बेला में भी माता जगदम्बे की दिव्य आरती व गुरुचरणपादुकाओं को स्पर्श करने का क्रम पूर्ण किया गया।&nbsp;&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>सभी ने ग्रहण किया महाप्रसाद</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">गुरुपूर्णिमा के इस महोत्सव में नित्यप्रति की तरह अन्नपूर्णा भण्डारे का अनवरत संचालन किया गया, जहां हज़ारों लोगों ने पूड़ी-सब्जी, दाल-चावल के रूप में भोजन प्रसाद सानन्द ग्रहण किया।&nbsp; &nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>गुरुपूर्णिमा महोत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">आज के इस भौतिकवादी समय में, जहाँ मानवीयमूल्यों का निरंतर ह्रास हो रहा है, गुरुपूर्णिमा जैसे पर्व समाज को आत्मिक शांति और सही दिशा दिखाने का कार्य करते हैं। पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम में यह गुरुपूर्णिमा पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं, बल्कि यह बदलते भारत में आत्मोत्थान, समाजसुधार और आध्यात्मिक पुनर्जागरण का जीवंत प्रतीक है। परम पूज्य सद्गुरुदेव योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के श्रीचरणों में समर्पित शिष्यों-भक्तों का प्रवाह, यह प्रमाणित करता है कि यदि अध्यात्म को मानवता की सेवा, धर्मरक्षा और राष्ट्ररक्षा जैसे मानवीय कर्त्तव्यों से जोड़ दिया जाए, तो कलिकाल के अंधकार को मिटाकर एक आदर्श और शांतिपूर्ण समाज की स्थापना निश्चित रूप से की जा सकती है।</p>
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		<title>महाकाल लोक कॉरिडोर और मुख्य मंदिर परिसर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 31 Jul 2026 04:41:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म अध्यात्म]]></category>
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		<category><![CDATA[mahakal news]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>उज्जैन। सावन मास की तैयारियों को लेकर जिला प्रशासन और श्री महाकालेश्वर प्रबंध समिति ने सोमवार को एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक की। बैठक के बाद कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक ने संयुक्त रूप से घोषणा की कि इस वर्ष भगवान महाकाल की सावन सोमवार सवारी के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को अभूतपूर्व स्तर पर अपग्रेड किया [&#8230;]</p>
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<p class="wp-block-paragraph">उज्जैन। सावन मास की तैयारियों को लेकर जिला प्रशासन और श्री महाकालेश्वर प्रबंध समिति ने सोमवार को एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक की। बैठक के बाद कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक ने संयुक्त रूप से घोषणा की कि इस वर्ष भगवान महाकाल की सावन सोमवार सवारी के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को अभूतपूर्व स्तर पर अपग्रेड किया जा रहा है। पूरे सवारी मार्ग और महाकाल लोक परिसर की निगरानी के लिए 50 से अधिक हाई-टेक ड्रोन और 500 अतिरिक्त सीसीटीवी कैमरे सक्रिय किए गए हैं।</p>
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		<title>दस महाविद्याओं की आराधना का पर्व गुप्त नवरात्र 15 जुलाई से शुरू</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Jul 2026 07:12:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[aaradhna]]></category>
		<category><![CDATA[das mahavidya]]></category>
		<category><![CDATA[gupt navratri]]></category>
		<category><![CDATA[jay mata ki]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सनातन धर्म में नवरात्र का त्यौहार आत्मिक शुद्धि और शक्ति की आराधना का सबसे बड़ा पर्व है। वर्ष में कुल चार नवरात्रि आती हैं, जिनमें से दो प्रत्यक्ष (चैत्र और शारदीय) और दो गुप्त (माघ और आषाढ़) होती हैं। इस वर्ष 15 जुलाई से आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि प्रारंभ हो रही है। यह नवरात्रि [&#8230;]</p>
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<p class="wp-block-paragraph">सनातन धर्म में नवरात्र का त्यौहार आत्मिक शुद्धि और शक्ति की आराधना का सबसे बड़ा पर्व है। वर्ष में कुल चार नवरात्रि आती हैं, जिनमें से दो प्रत्यक्ष (चैत्र और शारदीय) और दो गुप्त (माघ और आषाढ़) होती हैं। इस वर्ष 15 जुलाई से आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि प्रारंभ हो रही है। यह नवरात्रि आम लोगों की सामान्य पूजा के साथ-साथ विशेष रूप से तांत्रिकों, साधकों और अघोरियों के लिए तंत्र-मंत्र की गुप्त साधना के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>दसों महाविद्याओं की होती है आराधना</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">गुप्त नवरात्र के नौ दिनों में माता दुर्गा की दस दिव्य और शक्तिशाली शक्तियों की पूजा की जाती है, जिन्हें &#8216;दस महाविद्या&#8217; कहा जाता है। ये महाविद्याएं इस प्रकार हैं&#8211;माँ काली, माँ तारा, माँ छिन्नमस्ता, माँ षोडशी (त्रिपुर सुंदरी), माँ भुवनेश्वरी, माँ भैरवी, माँ धूमावती, माँ बगलामुखी, माँ मातंगी, माँ कमला। इन देवियों की साधना से जीवन के सभी संकट, शत्रु बाधा, रोग और दरिद्रता का समूल नाश होता है।&nbsp;&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>क्यों कहा जाता है इसे &#8216;गुप्त&#8217; नवरात्र?</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रत्यक्ष नवरात्र में जहाँ माता दुर्गा के नौ स्वरूपों की सार्वजनिक रूप से पूजा-अर्चना और गरबा-पंडालों का आयोजन होता है, वहीं गुप्त नवरात्र इसके बिल्कुल विपरीत होती है। इसमें साधना और पूजा को पूरी तरह गोपनीय रखा जाता है। मान्यता है कि गुप्त नवरात्र में पूजा को जितना गुप्त रखा जाए, उसका फल उतना ही अधिक और तीव्र मिलता है। इसमें साधक अपनी मनोकामनाओं और मंत्रों को किसी के सामने प्रकट नहीं करते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>घटस्थापना (कलश स्थापना) </strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">ज्योतिषविदों के अनुसार, इस दिन घटस्थापना के लिए मुख्य रूप से दो श्रेष्ठ मुहूर्त मिल रहे हैं। सुबह 05:35 बजे से10:15 बजे तक (सर्वोत्तम समय)। दोपहर 11:55 बजे से 12:50 बजे तक।</p>



<p class="wp-block-paragraph"> <strong>संयम, नियम और पवित्रता</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">&nbsp;गुप्त नवरात्रि आध्यात्मिक ऊर्जा को जाग्रत् करने का एक अनूठा अवसर है। 15 जुलाई से शुरू हो रहे इस शक्ति पर्व पर संयम, नियम और पवित्रता का पालन करते हुए यदि माँ जगदम्बा की आराधना की जाए, तो साधक को मानसिक शांति, आंतरिक बल और सांसारिक कष्टों से मुक्ति अवश्य मिलती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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		<title>सनातन का अनूठा उत्सव, भगवान् जगन्नाथ की रथयात्रा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Jul 2026 06:09:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[dharm adhyatm]]></category>
		<category><![CDATA[jagannath yatra]]></category>
		<category><![CDATA[rathyatra]]></category>
		<category><![CDATA[shahdol news]]></category>
		<category><![CDATA[udisa news]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सनातन परंपरा में उड़ीसा के पुरी में आयोजित होने वाली भगवान् जगन्नाथ (जगदीश) की रथयात्रा विश्व का सबसे बड़ा और अनूठा रथ उत्सव है। इस वर्ष यह ऐतिहासिक और पावन रथयात्रा 16 जुलाई 2026, दिन-गुरुवार को प्रारंभ होने जा रही है। यह एक ऐसा दिव्य अवसर होता है जब गर्भगृह में विराजमान &#8216;ब्रह्मांड के स्वामी&#8217; [&#8230;]</p>
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<p class="wp-block-paragraph">सनातन परंपरा में उड़ीसा के पुरी में आयोजित होने वाली भगवान् जगन्नाथ (जगदीश) की रथयात्रा विश्व का सबसे बड़ा और अनूठा रथ उत्सव है। इस वर्ष यह ऐतिहासिक और पावन रथयात्रा 16 जुलाई 2026, दिन-गुरुवार को प्रारंभ होने जा रही है। यह एक ऐसा दिव्य अवसर होता है जब गर्भगृह में विराजमान &#8216;ब्रह्मांड के स्वामी&#8217; स्वयं चलकर अपने भक्तों के बीच नगर भ्रमण पर आते हैं। इस उत्सव का न केवल गहरा धार्मिक महत्त्व है, बल्कि यह सामाजिक समरसता (एकता) का भी सबसे बड़ा उदाहरण है। माना जाता है कि जो भी व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस रथ की रस्सी को छू या खींच लेता है, उसे जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति (मोक्ष) मिल जाती है। यह रथयात्रा मुख्य मंदिर से शुरू होकर करीब 3 किलोमीटर दूर स्थित भगवान की मौसी के घर यानी गुंडीचा मंदिर पहुंचती है। यहाँ भगवान 09 दिनों तक विश्राम करते हैं और फिर &#8216;बहुदा यात्रा&#8217; (वापसी यात्रा) के ज़रिए अपने मुख्य मंदिर लौटते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>वैश्विक सनातन एकता का प्रतीक </strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">आज भगवान जगन्नाथ की यह रथयात्रा केवल पुरी या भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से यह दुनिया के 60 से अधिक देशों (जैसे अमेरिका, लंदन, रूस) में बेहद धूमधाम से मनाई जाती है। जाति, धर्म और देश की सीमाओं को तोड़कर जब लाखों लोग एक ही रस्सी को थामकर ‘जय जगन्नाथ’ का जयघोष करते हैं, तो वह दृश्य संपूर्ण विश्व को शांति, प्रेम और भाईचारे का संदेश देता है।&nbsp; &nbsp; &nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>शहडोल में भव्य रथयात्रा</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">मध्यप्रदेश के शहडोल शहर में स्थित ऐतिहासिक श्री मोहनराम मंदिर से हर वर्ष भगवान् जगन्नाथ की भव्य रथयात्रा निकाली जाती है, जो पूरे संभाग में आस्था और सामाजिक समरसता का एक बड़ा केंद्र है। 16 जुलाई को देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ शहडोल नगर के हृदय स्थल में स्थित प्राचीन श्री मोहनराम मंदिर से भगवान् जगदीश (जगन्नाथ), भ्राता बलभद्र और बहन सुभद्रा की भव्य रथयात्रा पूरी धार्मिक भव्यता के साथ निकाली जाएगी। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी इस रथयात्रा को लेकर नगरवासियों और ग्रामीण अंचलों से आने वाले श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखा जा रहा है। श्री मोहनराम मंदिर की यह रथयात्रा वर्षों से शहडोल की सांस्कृतिक पहचान और आपसी भाईचारे का अनूठा प्रतीक रही है।&nbsp; मान्यता है कि शहडोल में रथ की रस्सी खींचने मात्र से पुरी की यात्रा जैसा पुण्य फल मिलता है। इस अवसर पर प्रशासन और पुलिस बल द्वारा यातायात और सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जाते हैं।</p>
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		<title>मैहर वाली शारदा माता मंदिर का कपाट बंद होने पर भी गूंजती हैं घंटियां और अदृश्य रूप से होती है पूजा!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 13 Jul 2026 04:15:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[adhyatm]]></category>
		<category><![CDATA[dharm]]></category>
		<category><![CDATA[hindi news]]></category>
		<category><![CDATA[hindu]]></category>
		<category><![CDATA[hindu religion]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मध्यप्रदेश के ज़िला मैहर में स्थित माँ शारदा का मंदिर अपने अलौकिक चमत्कारों और रहस्यमयी आस्था के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। मान्यता है कि रात में मंदिर के कपाट बंद होने के बाद भी यहां घंटियां गूंजती हैं और अदृश्य रूप से पूजा होती है तथा माता का दिव्य शृंगार होजाता है। भारत [&#8230;]</p>
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<p class="wp-block-paragraph">मध्यप्रदेश के ज़िला मैहर में स्थित माँ शारदा का मंदिर अपने अलौकिक चमत्कारों और रहस्यमयी आस्था के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। मान्यता है कि रात में मंदिर के कपाट बंद होने के बाद भी यहां घंटियां गूंजती हैं और अदृश्य रूप से पूजा होती है तथा माता का दिव्य शृंगार होजाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भारत भूमि रहस्यों और चमत्कारों से भरी पड़ी है। देश में कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं, जिनके आगे आज का आधुनिक विज्ञान और तकनीक भी नतमस्तक होजाती है। ऐसा ही एक परम पवित्र और रहस्यमयी धाम है मध्यप्रदेश के त्रिकूट पर्वत पर स्थित माँ शारदा का मैहर मंदिर। समुद्र तल से करीब 600 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह ऐतिहासिक मंदिर माता सती के 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि यहां माता सती का हार गिरा था, जिसके कारण इस जगह का नाम &#8216;माई का हार&#8217; यानी &#8216;मैहर&#8217; पड़ा। लेकिन इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका वह रहस्य है, जो सदियों से अनसुलझा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>रात 9 बजे बंद होजाते हैं कपाट</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">आम दिनों में मैहर देवी मंदिर के कपाट रात 9:00 बजे भक्तों के लिए पूरी तरह बंद कर दिए जाते हैं। नियम के मुताबिक, मंदिर के पुजारी गर्भगृह की पूरी सफाई करते हैं, माता के वस्त्र-आभूषण व्यवस्थित करते हैं और मुख्य कपाट पर भारी ताला लगा देते हैं। इसके बाद मंदिर परिसर और पूरी पहाड़ी को खाली करवा दिया जाता है। रात के सन्नाटे में यहां किसी भी इंसान को रुकने की अनुमति नहीं होती।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>यहीं से होती है रहस्य की शुरुआत</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">&nbsp; &nbsp;स्थानीय निवासियों और पीढ़ियों से जुड़े पुजारियों का दावा है कि कपाट बंद होने के बाद, रात के गहरे सन्नाटे में अक्सर मंदिर के भीतर से घंटियां बजने और मंत्रोच्चार की धीमी आवाजें सुनाई देती है और सबसे हैरान करने वाला दृश्य सुबह ब्रह्ममुहूर्त में देखने को मिलता है। जब मंदिर के सरकारी पुजारी सुबह-सुबह भारी सुरक्षा और नियमों के साथ गर्भगृह का ताला खोलते हैं, तो वे दंग रह जाते हैं। माता शारदा के चरणों में ताजे सुगंधित फूल (अक्सर चमेली के) चढ़े हुए मिलते हैं आ ैर माता का पहले से ही पूजन और शृंगार संपन्न हो चुका होता है। गर्भगृह में ताजे चंदन की खुशबू महक रही होती है और जल का पात्र बदला हुआ मिलता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>आख़िर कौन करता है रहस्यमयी पूजा?</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">अब सवाल उठता है कि जब चारों तरफ कड़ा पहरा था और ताले बंद थे, तो बंद कपाट के पीछे आकर यह पूजा कौन कर गया? कौन करता है यह रहस्यमयी पूजा? पौराणिक कथाओं और स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार, यह दिव्य पूजा कोई इंसान नहीं, बल्कि 12वीं सदी के महान वीर योद्धा &#8216;आल्हा&#8217; और &#8216;ऊदल&#8217; करते हैं। आल्हा और ऊदल बुंदेलखंड के चंदेल राजा परमाल के सेनापति थे और माता शारदा के परम भक्त थे। इतिहास कहता है कि इन दोनों भाइयों ने ही घने जंगलों के बीच इस ऊंचे पर्वत पर माता के इस मंदिर की खोज की थी। उन्होंने ही सबसे पहले देवी को &#8216;शारदा माई&#8217; कहकर पुकारा था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कहा जाता है कि आल्हा ने यहां 12 वर्षों तक कठिन तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर मां शारदा ने उन्हें &#8216;अमरत्व&#8217; (कभी न मरने) का वरदान दिया था। मान्यता है कि अपने उसी वरदान और अटूट भक्ति के कारण वीर आल्हा आज भी अदृश्य रूप से जीवित हैं और हर रात सबसे पहले आकर अपनी &#8216;शारदा माई&#8217; की आरती और पूजा करते हैं। मंदिर के पीछे पहाड़ी के नीचे आज भी &#8216;आल्हा तालाब&#8217; और उनका अखाड़ा मौजूद है, जो इस कहानी को बल देता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>विज्ञान के पास नहीं है कोई जवाब</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">कई बार वैज्ञानिकों, तर्कवादियों और खोजी टीमों ने इस रहस्य के पीछे की सच्चाई जानने की कोशिश की। रात में कैमरे लगाने और कड़ी निगरानी रखने के प्रयास भी हुए, लेकिन इस अलौकिक घटना के पीछे का असली सच आज तक कोई नहीं जान पाया। भक्तों के लिए यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि साक्षात परमसत्ता की उपस्थिति का सबसे बड़ा प्रमाण है। यही कारण है कि हर साल देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु इस दिव्य चमत्कार को महसूस करने और माता का आशीर्वाद लेने 1063 से अधिक सीढ़ियां चढ़कर या रोप-वे के जरिए त्रिकूट पर्वत पर पहुंचते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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		<title>सिद्धाश्रम में योगिनी एकादशी की पावन तिथि पर परम पूज्य गुरुवरश्री के सान्निध्य में हुआ पौधारोपण</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 11 Jul 2026 08:09:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[bmks]]></category>
		<category><![CDATA[guru ji]]></category>
		<category><![CDATA[janjagran]]></category>
		<category><![CDATA[mata ji]]></category>
		<category><![CDATA[paudaropan]]></category>
		<category><![CDATA[siddhashram dham]]></category>
		<category><![CDATA[yogini ekadashi]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>संकल्प शक्ति।&#160;योगिनी एकादशी के पावन पर्व पर दिनांक 10 जुलाई 2026 को पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम में भगवती मानव कल्याण संगठन के संस्थापक-संचालक परम पूज्य सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के दिव्य सान्निध्य में पौधारोपण कार्यक्रम संपन्न हुआ।&#160; &#160; &#160; &#160;आश्रम परिक्षेत्र में आयोजित इस गरिमामयी पर्यावरण संरक्षण अभियान में 24 घंटे प्राणवायु (आॅक्सीजन) प्रदान [&#8230;]</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>संकल्प शक्ति।</strong>&nbsp;योगिनी एकादशी के पावन पर्व पर दिनांक 10 जुलाई 2026 को पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम में भगवती मानव कल्याण संगठन के संस्थापक-संचालक परम पूज्य सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के दिव्य सान्निध्य में पौधारोपण कार्यक्रम संपन्न हुआ।&nbsp;</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img decoding="async" width="576" height="1024" src="https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2026/07/mata-ji-paudharopan-576x1024.jpeg" alt="mata ji paudharopan" class="wp-image-12804" title="सिद्धाश्रम में योगिनी एकादशी की पावन तिथि पर परम पूज्य गुरुवरश्री के सान्निध्य में हुआ पौधारोपण 2" srcset="https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2026/07/mata-ji-paudharopan-576x1024.jpeg 576w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2026/07/mata-ji-paudharopan-169x300.jpeg 169w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2026/07/mata-ji-paudharopan-768x1365.jpeg 768w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2026/07/mata-ji-paudharopan-864x1536.jpeg 864w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2026/07/mata-ji-paudharopan-236x420.jpeg 236w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2026/07/mata-ji-paudharopan-150x267.jpeg 150w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2026/07/mata-ji-paudharopan-300x533.jpeg 300w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2026/07/mata-ji-paudharopan-696x1237.jpeg 696w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2026/07/mata-ji-paudharopan.jpeg 900w" sizes="(max-width: 576px) 100vw, 576px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">&nbsp; &nbsp; &nbsp;आश्रम परिक्षेत्र में आयोजित इस गरिमामयी पर्यावरण संरक्षण अभियान में 24 घंटे प्राणवायु (आॅक्सीजन) प्रदान करने वाले पीपल और बरगद के&nbsp; पौधे रोपे गए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&nbsp; &nbsp; &nbsp;योगिनी एकादशी की पावन तिथि पर सिद्धाश्रम धाम में प्रकृति की रक्षा को आधार बनाकर मानवता की रक्षा के संकल्प को धरातल पर उतारा गया। पौधारोपण की शुरुआत स्वयं योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने अपने करकमलों से पीपल का बिरवा रोपकर की। इस अवसर पर पूजनीया शक्तिमयी माता जी ने भी पौधारोपण करके समाज को पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।</p>



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		<title>वट पूर्णिमा: पर्यावरण और आस्था का महापर्व</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 28 Jun 2026 03:49:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[समसामयिक]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>हमारे भारतीय संस्कृति में त्यौहार केवल आस्था के लिए ही नहीं जाने जाते, अपितु ये जीवन के मूल्यों, पर्यावरण के प्रति सम्मान और मानवीय रिश्तों कोे सशक्त बनाने के माध्यम हैं। इस वर्ष 29 जून को मनाया जाने वाला वट पूर्णिमा पर्व सनातन परंपरा के उस अटूट विश्वास का प्रतीक है, जहां एक पत्नी का [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">हमारे भारतीय संस्कृति में त्यौहार केवल आस्था के लिए ही नहीं जाने जाते, अपितु ये जीवन के मूल्यों, पर्यावरण के प्रति सम्मान और मानवीय रिश्तों कोे सशक्त बनाने के माध्यम हैं। </p>



<p class="wp-block-paragraph">इस वर्ष 29 जून को मनाया जाने वाला वट पूर्णिमा पर्व सनातन परंपरा के उस अटूट विश्वास का प्रतीक है, जहां एक पत्नी का समर्पण मृत्यु के देवता यमराज को भी झुकने पर विवश कर देता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस वर्ष का वट पूर्णिमा व्रत पंचांगीय गणना के दृष्टिकोण से भी अतिविशेष है। ज्येष्ठ अधिकमास होने के कारण इस बार वट सावित्री (अमावस्या) और वट पूर्णिमा के बीच लगभग 45 दिनों का एक लंबा अंतराल देखने को मिला है। उदयातिथि के अनुसार, सोमवार और पूर्णिमा का पावन संयोग सुहागिन महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य का वरदान लेकर आया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वट पूर्णिमा मुख्य रूप से सती  सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा से प्रेरित है। सावित्री ने अपने अथक संकल्प, बुद्धिमत्ता और पातिव्रत्य धर्म के बल पर बरगद के वृक्ष के नीचे ही यमराज से अपने पति के प्राण वापस मांगे थे। आज के आधुनिक युग में भी, जब रिश्तों की परिभाषाएं बदल रही हैं, यह पर्व वैवाहिक जीवन में आपसी सामंजस्य, त्याग और एक-दूसरे के प्रति अगाध प्रेम की याद दिलाता है। सुहागिनें इस दिन अपने पति की दीघार्यु और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>पर्यावरण संरक्षण का संदेश  </strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">इस पर्व का एक और सबसे खूबसूरत और प्रासंगिक पहलू है—प्रकृति की आराधना। वट यानी बरगद का वृक्ष हमारी प्रकृति का एक ऐसा अनमोल उपहार है, जो सबसे अधिक ऑक्सीजन देता है और सदियों तक जीवित रहता है। भारतीय ऋषियों ने इस वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास मानकर इसकी महत्ता को रेखांकित किया है। आज जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण असंतुलन के संकट से जूझ रही है, तब महिलाओं के द्वारा बरगद के वृक्ष की परिक्रमा करना, उसे सूत का धागा बांधना और जल सींचना यह संदेश देता है कि प्रकृति की रक्षा में ही मानवजीवन की रक्षा निहित है। यह पर्व प्राचीनकाल से चली आ रही हमारी पर्यावरण के अनुकूल  जीवनशैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। सामाजिक समरसता और आधुनिक सरोकार बदलते दौर में इस त्योहार का स्वरूप भी व्यापक हुआ है। </p>



<p class="wp-block-paragraph">वट पूर्णिमा का यह पावन दिन हमें याद दिलाता है कि हमारी जड़ें कितनी गहरी और समृद्ध हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि आत्मबल और संकल्प से विपरीत परिस्थितियों को भी बदला जा सकता है। आइए, इस वट पूर्णिमा पर हम न केवल अपने परिवार की खुशहाली की कामना करें, बल्कि अपनी धरती माँ को भी हरा-भरा रखने का सच्चा संकल्प लें, ताकि परंपरा और प्रगति का यह चक्र अविरल चलता रहे।</p>
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		<title>इस वर्ष की चारधाम यात्रा में श्रद्धालुओं की रिकॉर्ड भीड़</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 27 Jun 2026 09:12:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[समसामयिक]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>देहरादून। उत्तराखंड में इस वर्ष की चारधाम यात्रा में श्रद्धालुओं भारी भीड़ उमड़ रही है, जिसके चलते प्रशासन ने केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम में हाई अलर्ट जारी कर दिया है। इस साल यात्रा की शुरूआत से ही तीर्थयात्रियों की संख्या पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ रही  केदारनाथ में भारी भीड़: बाबा केदारनाथ के दर्शन के लिए [&#8230;]</p>
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<p class="wp-block-paragraph">देहरादून। उत्तराखंड में इस वर्ष की चारधाम यात्रा में श्रद्धालुओं भारी भीड़ उमड़ रही है, जिसके चलते प्रशासन ने केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम में हाई अलर्ट जारी कर दिया है। </p>



<p class="wp-block-paragraph">इस साल यात्रा की शुरूआत से ही तीर्थयात्रियों की संख्या पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ रही  केदारनाथ में भारी भीड़: बाबा केदारनाथ के दर्शन के लिए प्रतिदिन हजारों की संख्या में भक्त पहुंच रहे हैं। </p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>बद्रीनाथ में कतारें: </strong>बद्रीविशाल के कपाट खुलने के बाद से ही मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में पैर रखने की जगह मिलना मुश्किल है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>  सुरक्षा व्यवस्था सख्त: </strong>मुख्य पड़ावों और संवेदनशील रास्तों पर अतिरिक्त पुलिस बल और एसडीआरएफ तैनात की गई है। पंजीकरण की जांच: बिना वैध रजिस्ट्रेशन के आने वाले यात्रियों को रोकने के लिए जगह-जगह चेकिंग प्वाइंट बनाए गए हैं। </p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>स्वास्थ्य सुविधाएं: </strong>ऊंचाई वाले क्षेत्रों में यात्रियों की सुविधा के लिए अतिरिक्त मेडिकल कैंप और आॅक्सीजन बूथ सक्रिय किए गए हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>   प्रशासन की अपील:</strong> प्रशासन ने यात्रियों से अपील की है कि यात्रा पर निकलने से पहले आधिकारिक पोर्टल पर अपना पंजीकरण जरूर कराएं।  </p>
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