<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>योग जगत &#8211; संकल्प शक्ति</title>
	<atom:link href="https://sankalpshakti.in/yog-jagat/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://sankalpshakti.in</link>
	<description>राष्ट्रीय साप्ताहिक समाचार पत्र</description>
	<lastBuildDate>Tue, 01 Jul 2025 05:26:37 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=7.1.2</generator>

<image>
	<url>https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/cropped-01-32x32.jpg</url>
	<title>योग जगत &#8211; संकल्प शक्ति</title>
	<link>https://sankalpshakti.in</link>
	<width>32</width>
	<height>32</height>
</image> 
	<item>
		<title>मधुमेह से बचने के लिए व्यायाम और संयमित भोजन ज़रूरी</title>
		<link>https://sankalpshakti.in/%e0%a4%ae%e0%a4%a7%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b9-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%8f-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/</link>
					<comments>https://sankalpshakti.in/%e0%a4%ae%e0%a4%a7%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b9-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%8f-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Jul 2025 06:15:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[योग जगत]]></category>
		<category><![CDATA[Asan]]></category>
		<category><![CDATA[BP]]></category>
		<category><![CDATA[dhyan]]></category>
		<category><![CDATA[pranayam]]></category>
		<category><![CDATA[Sugar]]></category>
		<category><![CDATA[Yog]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://sankalpshakti.in/?p=10398</guid>

					<description><![CDATA[<p>विश्व मधुमेह जागृति दिवस 27 जून को मनाया जाता है।&#160; आप तेज चलेंगे तो मधुमेह पीछे छूट जाएगा। अगर आप चलना यानी तेज टहलना छोड़ दिए, तो मधुमेह आगे बढ़ जाएगा। ऐसे में हरहाल में सभी को व्यायाम एवं संयमित भोजन का फामूर्ला अपनाना पड़ेगा। मधुमेह रोगियों के लिए दिन में कम से कम 30 [&#8230;]</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in/%e0%a4%ae%e0%a4%a7%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b9-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%8f-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/">मधुमेह से बचने के लिए व्यायाम और संयमित भोजन ज़रूरी</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in">संकल्प शक्ति</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">विश्व मधुमेह जागृति दिवस 27 जून को मनाया जाता है।&nbsp; आप तेज चलेंगे तो मधुमेह पीछे छूट जाएगा। अगर आप चलना यानी तेज टहलना छोड़ दिए, तो मधुमेह आगे बढ़ जाएगा। ऐसे में हरहाल में सभी को व्यायाम एवं संयमित भोजन का फामूर्ला अपनाना पड़ेगा। मधुमेह रोगियों के लिए दिन में कम से कम 30 मिनट तक तेज कदमों से जॉगिंग बहुत लाभकारी होता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वहीं गर्भवती महिलाओं को हरहाल में अपना वजन नियंत्रित रखना चाहिए। वरना उन्हें भी शुगर की समस्या हो सकती है। चिकित्सा विज्ञान संस्थान बीएचयू के चिकित्सक बताते हैं कि मधुमेह होने से बचना ही इसका सबसे अच्छा उपचार है। अन्यथा यह बीमारी अविरल निर्बाध रूप से बढ़ती रहती है। डायबिटीज रोग के बारे में लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से 27 जून को &#8216;मधुमेह जागृति दिवस&#8217; मनाया जाता है। मधुमेह अनुवांशिक कारणों के आलावा अनियमित जीवन शैली, तनाव, शरीरिक व्यायाम का ना होना, इस बीमारी का मुख्य कारण है। मधुमेह रोगियों की संख्या का तेजी से बढ़ना चिंता का विषय बन चुका है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&nbsp;चिकित्सा विज्ञान संस्थान, बीएचयू स्थित इंडोक्राइनोलॉजी एंड मेटाबोलिज्म विभाग के प्रो. एनके अग्रवाल बताते हैं कि मधुमेह पचन संबंधित बीमारी है, जिसमें शुगर न पचने से ब्लड में शुगर ज़्यादा होजाती है और मरीज को उसके द्वारा साइड इफेक्ट्स आते हैं। शुगर मूलत: चार प्रकार की पाई गयी है। इसमें ज़्यादातर लोगों में टाइप दो पाई गयी है। अन्य, जैसे टाइप एक और गर्भावस्था-जनित मधुमेह कम संख्या में देखी गई है। ये सभी प्रकार की मधुमेह की बीमारी धीरे-धीरे बढ़ रही है और हमारा देश विश्व में सर्वाधिक मधुमेह रोगी वाले देशों में चीन के बाद द्वितीय क्रम में है। मधुमेह होने से बचना ही इसका सबसे अच्छा उपचार है। अन्यथा यह अविरल निर्बाध रूप से बढ़ती रहती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>भोजन में परहेज ज़रूरी</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">मधुमेह कुछ लोगों में शुरूआती स्थिति में होता है और ऐसा ही कई साल बना रहता है। इन लोगों को व्यायाम करने के साथ भोजन में परहेज से सबसे ज़्यादा लाभ मिलेगा। जिनकी शुगर ज्यादा बढ़ी हो तो उनको खाने के परहेज और कसरत के साथ-साथ दवाइयां भी देनी पड़ती है।&nbsp;&nbsp;</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in/%e0%a4%ae%e0%a4%a7%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b9-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%8f-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/">मधुमेह से बचने के लिए व्यायाम और संयमित भोजन ज़रूरी</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in">संकल्प शक्ति</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://sankalpshakti.in/%e0%a4%ae%e0%a4%a7%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b9-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%8f-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>आहार-विहार और योग पर दें ध्यान</title>
		<link>https://sankalpshakti.in/%e0%a4%86%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a7%e0%a5%8d/</link>
					<comments>https://sankalpshakti.in/%e0%a4%86%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a7%e0%a5%8d/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 17 Feb 2024 04:26:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[योग जगत]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://sankalpshakti.com/?p=9652</guid>

					<description><![CDATA[<p>आहार अर्थात् भोजन। यदि आपका खान-पान सही और समयबद्ध नहीं है तो आप किसी भी गंभीर रोग की चपेट में आ सकते हैं। विहार का अर्थ है पैदल चलना या भ्रमण करना। क्या आप इतना पैदल चल लेते हैं जिससे की आपकी पाचनक्रिया बलशाली बनीं रहे। यदि नहीं तो आपके लिए खतरे की सूचना है। [&#8230;]</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in/%e0%a4%86%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a7%e0%a5%8d/">आहार-विहार और योग पर दें ध्यान</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in">संकल्प शक्ति</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">आहार अर्थात् भोजन। यदि आपका खान-पान सही और समयबद्ध नहीं है तो आप किसी भी गंभीर रोग की चपेट में आ सकते हैं। विहार का अर्थ है पैदल चलना या भ्रमण करना। क्या आप इतना पैदल चल लेते हैं जिससे की आपकी पाचनक्रिया बलशाली बनीं रहे। यदि नहीं तो आपके लिए खतरे की सूचना है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>आहार-</strong> यह बहुत ज़रूरी है अन्यथा आप कितने ही आसन-प्राणायाम करते रहें, वे निरर्थक ही सिद्ध होंगे। उचित आहार का चयन करें और निश्चित समय पर खाएं। आहार में शरीर के लिए उचित पोषकतत्त्व होना ज़रूरी है। ना कम खाएं और ना ज्यादा, मसालेदार तो बिल्कुल ही नहीं। निरोगी रहकर लम्बी उम्र चाहते हैं तो आहार पर ध्यान दें। यौगिक आहार का चयन करें।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>विहार- </strong>विहार करना हमेशा से ही प्रचलित है और रहेगा। खुली हवा में पैदल विचरण करना। कहते हैं कि सौ दवाई और एक घुमाई।</p>



<p class="wp-block-paragraph">घूमने फिरने जाएं और थोड़ा नंगे पैर भी चले। योग और आयुर्वेद में कहा गया है कि पैर यदि ज़्यादा देर तक ढंके या बंधे हैं तो इसका असर हमारी श्वास पर होता है। विहार करने से शरीर में अतिरिक्त चर्बी इक्कठी नहीं होती तथा स्फूर्ति बनी रहती है। पाचनक्रिया के लिए यह लाभदायक है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>योग-</strong> यदि आपके पास समय नहीं है कि योगासन किया जाए तो योग की हस्त मुद्राओं का सहारा लें। अंग संचालन, हास्य योग, ध्यान, प्राणायाम और योगनिद्रा का अभ्यास करते रहने से अतिरिक्त ऊर्जा का संचार होगा। यह बहुत ही कम समय में हो सकता है। सभी को पाँच-पाँच मिनट में किया जा सकता है। आप चाहें तो योगनिद्रा रात में बिस्तर पर सोते वक्त कर सकते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&nbsp;हंसने पर कोई पाबंदी नहीं और जब चाहें तब मुंह खोल कर हंसे। प्राणायाम में अनुलोम-विलोम और ध्यान में विपश्यना का सहारा ले सकते हैं। यदि आसन करना चाहें तो हनुमानासन, पादहस्त आसन, चंद्रासन, योग मुद्रा, उष्ट्राषन, पवन मुक्तासन करें तथा इनके विलोम आसनों को भी जानें।&nbsp;</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in/%e0%a4%86%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a7%e0%a5%8d/">आहार-विहार और योग पर दें ध्यान</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in">संकल्प शक्ति</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://sankalpshakti.in/%e0%a4%86%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a7%e0%a5%8d/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>षट्कर्म- त्राटक &#124;&#124; त्राटक की प्रक्रिया</title>
		<link>https://sankalpshakti.in/tratak/</link>
					<comments>https://sankalpshakti.in/tratak/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 07 Sep 2023 07:16:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[योग जगत]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://sankalpshakti.com/?p=8398</guid>

					<description><![CDATA[<p>मनुष्य के अंदर अलौकिक शक्ति एवं सामथ्र्य छुपी हुई है, मगर एकाग्रता न होने के कारण वह उसका सही सदुपयोग नहीं कर पाता। मनुष्य के नेत्र ऊर्जा के केन्द्र कहे गये हैं। वह अपने नेत्रों की ऊर्जा के माध्यम से मारण, मोहन, सम्मोहन, स्तम्भन, उच्चाटन कर सकता है व जीवनदान दे सकता है। इसके लिए [&#8230;]</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in/tratak/">षट्कर्म- त्राटक || त्राटक की प्रक्रिया</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in">संकल्प शक्ति</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">मनुष्य के अंदर अलौकिक शक्ति एवं सामथ्र्य छुपी हुई है, मगर एकाग्रता न होने के कारण वह उसका सही सदुपयोग नहीं कर पाता। मनुष्य के नेत्र ऊर्जा के केन्द्र कहे गये हैं। वह अपने नेत्रों की ऊर्जा के माध्यम से मारण, मोहन, सम्मोहन, स्तम्भन, उच्चाटन कर सकता है व जीवनदान दे सकता है। इसके लिए एक बहुत बड़े अभ्यास की आवश्यकता होती है। त्राटक के माध्यम से हम मन को एकाग्र करते हैं और मन की एकाग्रता पर कुण्डलिनी चेतना प्रभावक होकर आज्ञाचक्र व नेत्रों के माध्यम से अपना कार्य करना प्रारम्भ कर देती है। पूर्ण त्राटक सिद्ध होने पर साधक एक स्थान पर रहकर दूरस्थ किसी स्थान पर अपनी एकाग्रता व ध्यान के माध्यम से किसी भी कार्य को अंजाम दे सकता है। इसकी प्रारम्भिक स्थिति में ही बौद्धिक क्षमता बढ़ती है, आरोग्यता की प्राप्ति होती है, विकारों का दमन होता है और प्राणों पर पकड़ मजबूत होती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>त्राटक</strong><strong> </strong><strong>की</strong><strong> </strong><strong>प्रक्रिया</strong><strong></strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">त्राटक करने की अलग-अलग कई प्रक्रियायें हैं, जिसमें प्रमुखता से शक्तिचक्र के माध्यम से किया जाता है। किसी ज्योति पर त्राटक, चंद्र त्राटक एवं सूर्य त्राटक आदि अनेकों प्रक्रियायें हैं। यहां पर प्रारम्भिक शक्तिचक्र त्राटक के विषय में बताया जा रहा है। साधक को समतल भूमि पर किसी आसन पर बैठ जाना चाहिए और अपने नेत्रों की सीध में तीन से पांच फिट की दूरी पर किसी दीवार के ऊपर शक्तिचक्र को लगा लेना चाहिए। फिर खुले नेत्रों से बिना पलक झपकाये शक्तिचक्र के मध्य में अपने नेत्रों को एकाग्र करना चाहिए, प्रारम्भ में दो-चार मिनट ही बिना पलक झपकाये त्राटक हो पाता है। अभ्यास करते-करते कई-कई घंटों का त्राटक सिद्ध होजाता है। इसमें योग्य त्राटकसिद्ध गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक होता है। प्रारम्भिक अवस्था में करने पर इससे नेत्रों के रोग दूर होते हैं और उनकी दृष्टि व क्षमता बढ़ती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">त्राटक में कुछ महत्त्वपूर्ण सावधानियां अवश्य बरतनी चाहिएं। जब शरीर में ज़रूरत से ज्यादा आलस्य हो, बुखार हो या कोई तकलीफ हो, तो त्राटक नहीं करना चाहिए। यदि नेत्रों में दर्द हो या लालिमा हो, तो उस वक्त त्राटक नहीं करना चाहिए। त्राटक करने वाले साधक को यम-नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जितनी देर खुले नेत्र रखकर त्राटक करें, उसके 10 प्रतिशत समय तक नेत्र बंद करके ध्यान में अवश्य बैठें। ध्यान में अंतरत्राटक का क्रम करें, अर्थात् जिस बिन्दु का ध्यान बाह्य त्राटक में कर रहे थे, उसी का ध्यान नेत्र बंद करके करें।</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in/tratak/">षट्कर्म- त्राटक || त्राटक की प्रक्रिया</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in">संकल्प शक्ति</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://sankalpshakti.in/tratak/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>कुण्डलिनी शक्ति चक्र</title>
		<link>https://sankalpshakti.in/kundalini-shakti-chakra/</link>
					<comments>https://sankalpshakti.in/kundalini-shakti-chakra/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 07 Sep 2023 06:50:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[योग जगत]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://sankalpshakti.com/?p=8394</guid>

					<description><![CDATA[<p>मानवशरीर इस दृश्य जगत् में परमसत्ता माता आदिशक्ति जगज्जननी जगदम्बा की सबसे उत्तम कृति है। जिसमें परमसत्ता का अंश दिव्य चैतन्य आत्मा का वास है। मानवशरीर में समस्त दृश्य-अदृश्य लोकों का ज्ञान, शक्ति एवं सामथ्र्य समाहित हैं। सामान्यत: दो प्रकार के जगत् का वर्णन किया जाता है- एक दृश्य जगत्, दूसरा अदृश्य जगत्। जिस प्रकार [&#8230;]</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in/kundalini-shakti-chakra/">कुण्डलिनी शक्ति चक्र</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in">संकल्प शक्ति</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">मानवशरीर इस दृश्य जगत् में परमसत्ता माता आदिशक्ति जगज्जननी जगदम्बा की सबसे उत्तम कृति है। जिसमें परमसत्ता का अंश दिव्य चैतन्य आत्मा का वास है। मानवशरीर में समस्त दृश्य-अदृश्य लोकों का ज्ञान, शक्ति एवं सामथ्र्य समाहित हैं। सामान्यत: दो प्रकार के जगत् का वर्णन किया जाता है- एक दृश्य जगत्, दूसरा अदृश्य जगत्।</p>



<p class="wp-block-paragraph">जिस प्रकार दृश्य जगत् में असीम शक्ति, सामथ्र्य एवं ऊर्जा समाहित है, उससे असंख्य गुना सामथ्र्य अदृश्य जगत् में समाहित है। अदृश्य जगत् की शक्तियों का ज्ञान एवं उसकी ऊर्जा व सामथ्र्य को प्राप्त करने के लिए हमारे शरीर में ही सभी चक्र (ऊर्जा केन्द्र) स्थापित हैं, जो अलग-अलग स्वभाव, गुणशक्ति एवं सामथ्र्य से परिपूर्ण हैं और क्रमश: एक-दूसरे को प्रभावित करते हुए संयुक्त रूप से कार्य करते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">शरीर में मुख्यतया सात मूल चक्र हैं। कुछ उनके सहयोगी चक्रों का भी वर्णन मिलता है, मगर सात चक्रों में ही मूल सत्य, ज्ञान, शक्ति एवं ऊर्जा समाहित हैं। ये सातों चक्र हमारे शरीर की रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले भाग से प्रारम्भ होकर सिर के ऊपरी भाग तक स्थापित हैं, जो क्रमश: इस प्रकार हैं-</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>1. मूलाधार चक्र, 2. स्वाधिष्ठान चक्र, 3. मणिपूर चक्र, 4. अनाहत चक्र, 5. विशुद्ध चक्र, 6. आज्ञाचक्र, 7. सहस्रार चक्र।</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">परमसत्ता ने शरीर के अंदर समस्त सातों चक्रों का निर्माण इस प्रकार किया है कि जब इन चक्रों पर कुण्डलिनी शक्ति की ऊर्जा प्रवेश करती है, तो ये खिल उठते हैं, अर्थात् पूरी तरह से क्रियाशील होजाते हैं। सामान्य अवस्था में ये प्राय: सुप्त या निष्क्रिय अवस्था में रहते हैं। सामान्यत: ये चक्र बहुत सामान्य फल, प्रभाव दिखाते रहते हैं, जिसका उपयोग मानव सामान्य जीवन में करता है। इन सप्तचक्रों की सामान्य चेतना से ही मानव का जीवन संचालित रहता है। मगर, जब इन्हीं चक्रों में कुण्डलिनी की ऊर्जा शक्ति प्रवेश करती है, तो ये अपना पूर्ण प्रभाव दिखाते हैं और मानव, सामान्य मानव से महामानव बन जाता है। वह अलौकिक दिव्य शक्तियों का स्वामी बन जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कुण्डलिनी शक्ति का पूर्ण जागरण सहज और सरल प्रक्रिया नहीं है। उसकी पूर्ण ऊर्जा प्राप्त करने के लिए एक प्रबल इच्छाशक्ति, चेतनावान् गुरु का मार्गदर्शन व पूरी लगन व निष्ठा चाहिए। एक लम्बी साधनात्मक यात्रा पर चलने का दृढ़ निश्चय, स्वयं को जानने की इच्छाशक्ति व यम-नियमों का पालन करते हुए आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा-ध्यान-समाधि की एक क्रमिक प्रक्रिया पर चलकर ही कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत् किया जा सकता है। कई बार इष्ट एवं गुरु की प्रबल भक्तिभावना, धर्म के पूर्ण ज्ञान से भी जब मन की पूर्ण एकाग्रता और संयमित जीवन होजाता है, तो कुण्डलिनी शक्ति की कुछ ऊर्जा का प्रभाव साधक को प्राप्त होजाता है, जिससे वह कुछ चमत्कारिक कार्यों को करने की सामथ्र्य प्राप्त कर लेता है। वह उन्हीं सामान्य चमत्कारिक शक्तियों को पूर्ण मानकर एक ठहराव ले लेता है और उन्हीं शक्तियों का उपयोग करने लगता है। इसके कारण वह पूर्ण सत्य को कभी भी प्राप्त नहीं कर पाता। मगर, उसमें अनेकों प्रकार की अच्छाइयाँ समाहित होजाती हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पूर्ण कुण्डलिनीसिद्ध चेतनावान् गुरु शक्तिपात के माध्यम से पात्र एवं योग्य शिष्य की कुण्डलिनी चेतना काल, परिस्थितियों और आवश्यकतानुसार जाग्रत् कर देता है या सतत उस प्रक्रिया की ओर बढ़ाता रहता है। हज़ारों-हज़ारों साल के कालखण्डों में कुछ गिनेचुने दो-चार सिद्ध साधक ऐसे निकलते हैं, जो अपनी पूर्ण कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत् कर पाते हैं। मगर, इस चेतना के प्रारम्भिक परिणाम ही मनुष्य को सामथ्र्यवान् बना देते हैं, अर्थात् कुण्डलिनी चेतना उध्र्वगामी होती है, तो क्रमिक रूप से वह जीवन को रूपांतरित करती रहती है। वह साधक को असत्य से सत्य की ओर बढ़ाती रहती है, अर्थात् कुण्डलिनी चेतना की कुछ ऊर्जा प्राप्त कर लेना ही मानवजीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य होता है। इस कुण्डलिनी शक्तिसाधना की ओर बढऩे वाले साधकों को बड़े ही धैर्य की आवश्यकता होती है। उसे इस ज्ञान की आवश्यकता होती है कि कुण्डलिनी के सातों चक्रों को तत्काल जाग्रत् करके पूर्ण सिद्ध और शक्तिमान बनने की इच्छा न रखकर पहले सातों चक्रों को ऊर्जावान् बनाने का प्रयास करें। आपकी लगन, निष्ठा, विश्वास, समर्पण, संयमित जीवन और गुरु एवं इष्ट के प्रति निष्ठा एक न एक दिन आपको पूर्ण अवश्य बना देगी। वह एक जन्म में भी हो सकता है या अनेकों जन्मों के बाद। यह ज्ञान अजर-अमर-अविनाशी है। इस जीवन में आप जितना कुण्डलिनी चेतना की ऊर्जा को प्राप्त कर लेंगे, नवीन जीवन में संस्कार एवं भाग्य बनकर वह आपकी पूंजी के रूप में सहज प्राप्त होजाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इन सातों चक्रों को जाग्रत् करने के लिए कई बार कुछ अपूर्ण धर्मग्रन्थों या अपूर्ण मार्गदर्शकों के द्वारा अलग-अलग प्रक्रियाएं भी बताई जाती हैं, जो अधिकांशतया सत्य से दूर होती हैं और साधक इन्हीं में उलझकर रह जाता है। अत: इसके लिए एक पूर्ण चेतनावान् कुण्डलिनी शक्तिसम्पन्न सिद्ध गुरु की आवश्यकता होती है। आपको उपर्युक्त नियमों का पालन तो करना ही होगा, तभी आप संयमित जीवन जीकर ध्यान की प्रारम्भिक अवस्था को प्राप्त कर पायेंगे। उसके बाद ही कुण्डलिनी शक्ति के जागरण का पूर्णक्रम प्रारम्भ होता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इन सातों चक्रों में आज्ञाचक्र को राजाचक्र कहा गया है। अत: साधकों को आज्ञाचक्र को माध्यम बना कर ही अन्य चक्रों को जाग्रत् करने का क्रम प्रारम्भ करना चाहिए। कुण्डलिनी शक्ति को सर्पाकार रूप में वर्णित किया जाता है। कुण्डलिनी शक्ति मूलाधार में गुदाद्वार के थोड़ा ऊपर व उपस्थेन्द्रिय के थोड़ा नीचे रीढ़ की हड्डी के प्रारम्भ में स्थित होती है, जो सर्प की भांति साढ़े तीन चक्र कुण्डली मारकर अपनी पूंछ को मुंह में दबाकर बैठी होती है। साधक के प्रयास से यही ऊर्जा के रूप में जाग्रत् होकर सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से रीढ़ की हड्डी से प्रवेश करके ऊपर की ओर बढ़ती है। यह क्रमश: सभी चक्रों को ऊर्जा व चेतना प्रदान करती हुई जब सहस्रार में पहुंच जाती है, तो अपना पूर्ण प्रभाव दिखाने लगती है। यह चेतना एक बार जाग्रत होकर लम्बे समय तक स्थित नहीं रहती। साधक के तप की पात्रता एवं मन की एकाग्रता के आधार पर स्थित रहकर यह पुन: अपने स्थान पर आजाती है, मगर अपना प्रभाव चक्रों पर छोड़ देती है। इससे चक्र निर्धारित सीमा तक अपना कार्य करते रहते हैं और धीरे-धीरे साधक इसमें पूर्ण पात्रता प्राप्त कर लेता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यहां पर कुण्डलिनी चेतना के विषय में बहुत ही संक्षिप्त जानकारी दी गई है व सातों चक्रों का संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>1. मूलाधार चक्र-</strong> </p>



<p class="wp-block-paragraph">यह चक्र गुदाद्वार से लगभग दो अंगुल ऊपर और उपस्थेन्द्रिय से दो अंगुल नीचे स्थित होता है। इसके मूल में सुषुम्ना नाड़ी का स्थान है। इसके बायें इड़ा नाड़ी, जिसे चन्द्रनाड़ी कहते हैं व दायें पिडं्गला नाड़ी, जिसे सूर्यनाड़ी कहते हैं,&nbsp; स्थित होती हैं। इन नाडिय़ों का प्रारम्भ मूलाधार से ही होता है। यहीं से हमारे शरीर की लगभग 72 हजार नाडिय़ां निकलती हैं, जिनसे पूरे शरीर का संचालन होता है। इनमें इड़ा, पिंड्गला और सुषुम्ना सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नाडिय़ां हैं। इसी स्थल पर कुण्डलिनी शक्ति का वास होता है। इसीलिए इसे मूलाधार चक्र कहा गया है। इस चक्र में पृथ्वीतत्व की प्रधानता होती है। इसके चैतन्य होने या प्रथमस्तर पर जाग्रत् होने से साधक में साहस, पराक्रम, वीरता एवं पौरुषता के साथ ही कर्म करने की प्रधानता, धर्म पर आस्था, लगन एवं विश्वास बढऩे लगता है। साथ ही उसके शरीर में आरोग्यता की प्राप्ति होती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मूलाधार चक्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण चक्र है। इसके जाग्रत् होने से ब्रह्म तत्व का ज्ञान प्राप्त होता है, अर्थात् ब्रह्म की शक्तियों की सामथ्र्य प्राप्त होती है। इस चक्र के जाग्रत् होने से दूसरे चक्रों की ऊर्जा भी आंशिक रूप से बढ़ती है। यह साधक के ऊपर है कि वह इस चक्र पर अपनी कितनी पकड़ हासिल कर पाता है? मगर, साधक यहां की शक्ति का उपयोग तभी कर सकता है, जब ऊपर के कुछ महत्त्वपूर्ण चक्र जाग्रत् होते हैं। किन्तु, साधक की अनेकों प्रकार की कार्यक्षमताएं आंशिक रूप से बढ़ जाती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>2. स्वाधिष्ठान चक्र</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">यह चक्र मूलाधार चक्र के ऊपर तथा उपस्थेन्द्रिय के मूल में होता है। इसमें जलतत्व की प्रधानता होती है। इस चक्र को विष्णु चक्र भी कहा जाता है। जब साधक इस चक्र को पूर्णत: जाग्रत् कर लेता है, तो वह भगवान् विष्णु की शक्तियों की सामथ्र्य हासिल कर लेता है। चक्रों के जागरण की एक क्रमिक प्रक्रिया होती है, जो क्रमश: ऊर्जा, चेतना और सामथ्र्य प्रदान करती जाती है। साधक कुछ सीमित शक्तियों का मालिक बन जाता है, मगर उसे शक्तियों का पूर्ण ज्ञान तभी होता है, जब सातों चक्र जाग्रत् होजाते हैं। इन चक्रों के जागरण में सजगता की नितांत आवश्यकता होती है। यदि साधक इस ऊर्जा का भौतिक जगत् में उपयोग करने लगता है, तो वह विकारी और अहंकारी बनकर पतन के मार्ग पर जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>3. मणिपूर चक्र</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">यह चक्र नाभि के मूल में स्थित होता है। इसमें अग्नितत्व की प्रधानता होती है। इसे शिवचक्र भी कहा जाता है, अर्थात् इसके जागरण से शिव भगवान् की शक्तियों की सामथ्र्य प्राप्त होती है। यदि साधक के तीन चक्र मूलाधार, स्वाधिष्ठान और मणिपूर जाग्रत् होजाते हैं, तो वह अनेकों दिव्य शक्तियों का मालिक बन जाता है। मगर, वह इन चक्रों का पूर्ण ज्ञान एवं पूर्ण उपयोग तब तक नहीं कर पाता, जब तक सातों चक्र जाग्रत् नहीं होते। कई बार साधकों को इन चक्रों की प्रारम्भिक ऊर्जा प्राप्त करके भटकते हुए देखा गया है। अत: उच्चता की ओर वही साधक पहुंच पाता है, जो अपने मार्गदर्शक गुरु पर पूर्ण विश्वास करके सतत उनके मार्गदर्शन में आगे की यात्रा तय करता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>4. अनाहत चक्र</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">यह चक्र हृदय के पास सीने के मध्य में स्थित होता है। इसका सीधा सम्बन्ध हृदय से होता है। इसमें वायुतत्व की प्रधानता होती है। यह चक्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण चक्र होता है। इसके बिना साधक अपनी कुण्डलिनी शक्तियों का प्रयोग कर ही नहीं सकता। अगर करेगा भी, तो उसकी दिशा सही नहीं होगी। वह तमोगुणी या रजोगुणी दिशा में ही बढ़ेगा। इस चक्र के जागरण से साधक के जीवन में संतुलन आता है। वह दया, ममता, करुणा एवं वात्सल्य से भरपूर हो जाता है। इसके पीछे मूल रहस्य यह है कि यह शक्ति का केन्द्र है, अर्थात् यह माता आदिशक्ति जगज्जननी जगदम्बा की ऊर्जा से परिपूर्ण चक्र होता है। यह चक्र सातों चक्रों में मध्य का चक्र है। यह एक नियंत्रक चक्र भी कहलाता है। यही चक्र नीचे के चक्रों की दशा और दिशा तय करता है। मानवशरीर में हृदय का सर्वाधिक महत्त्व होता है। जब तक हृदय धड़क रहा है, जब तक हमारा जीवन चल रहा है। हृदय की धड़कन रुकते ही जीवन समाप्त हो जाता है। यही चक्र ऊपर के तीन चकों में कुण्डलिनी शक्ति की ऊर्जा पहुंचाकर हमें ज्ञान, सामथ्र्य एवं शक्ति की पात्रता प्रदान करता है। इस चक्र के जाग्रत होने के बाद ही से साधक की कार्यक्षमता चमत्कारिक रूप से बढऩे लगती है। इसे आगे के चक्रों में वर्णित किया जायेगा। इसी चक्र के कारण कुण्डलिनी शक्ति को माँ रूप में सम्बोधित किया जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जब साधक अपने जीवन को संयमित करके कुण्डलिनी शक्ति का जागरण करता हुआ इस चौथे चक्र में पहुंचता है, तो उसे यही शक्ति एक माँ के रूप में अंतरंग योग में उसी प्रकार आगे बढ़ाती है, जैसे भौतिक जगत् में एक माँ अपने शिशु को उंगली पकड़कर खड़े होना, चलना और दौडऩा सिखाती है। जन्म लेकर अगर सही सहारा न प्राप्त हो, तो हम चलना भी नहीं सीख सकते। इसी प्रकार अंतरंग योग की गहराई में हमारा हृदयचक्र जितना परिपक्व होगा, उतना ही हम आगे की यात्रा पूर्णत्व से तय कर सकेंगे।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>5. विशुद्ध चक्र-</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">यह चक्र गले में कण्ठ के पास स्थित होता है। इसमें आकाशतत्व की प्रधानता होती है। इस चक्र के जाग्रत् होने से साधक के अन्दर जितनी पात्रता निचले चक्रों में प्राप्त होती है, उसके अनुसार उसे वाणी की शक्ति व दिव्यता प्राप्त होती है, अर्थात् अंतरंग येाग में स्थूल से परे सूक्ष्म में जाकर वाणी, ध्वनियों एवं सूक्ष्म जगत् की भाषा का ज्ञान होता है। इससे साधक सूक्ष्म जगत् से सम्बन्ध स्थापित करने में सफल होता है। वह स्थूल जगत् में अपनी वाणी शक्ति के माध्यम से कुछ भी कर सकने में सामथ्र्यवान् बन जाता है। वह किसी को भी शब्दों के माध्यम से आशीर्वाद व शाप देने जैसी अनेकों शक्तियों को प्राप्त कर लेता है। उसकी वाणी पर अमल करने वाले लाखों-लाख लोग उसका अनुकरण करते हैं और उसके आदेशों का पालन करते हैं। इसी चक्र से साधक के द्वारा अपनी शक्तियों का सदुपयोग करने का क्रम प्रारम्भ होता है, जिसका माध्यम सर्वप्रथम उसकी वाणी बनती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>6. आज्ञाचक्र</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">यह चक्र दोनों भौहों के मध्य में स्थित होता है। इसमें मन और ज्ञान की प्रधानता मानी गई है। इसे ज्ञान का चक्र भी कहा जाता है और राजाचक्र भी कहा जाता है। सही मायने में यह त्रिवेणी चक्र कहलाता है, जिसमें इड़ा, पिङ्गला और सुषुम्ना नाडिय़ां एक साथ मिलती हैं और यहीं से विपरीत क्रॉस करके इड़ा और पिङ्गला दिशा बदलकर सहस्रार की ओर प्रवेश करती हैं। इस चक्र को प्रकाशचक्र भी कहा जाता है। इसके जाग्रत् होने से दिव्यदृष्टि प्राप्त होती है और मनुष्य त्रिकालज्ञ बन जाता है। उसकी&nbsp; बुद्धि, मन को पूर्णतया अपने आधीन कर लेती है। उसकी निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है। सत्य-असत्य का ज्ञान इसी चक्र से प्राप्त होता है। इस चक्र के माध्यम से ही हम कुण्डलिनी शक्ति का उपयोग कर पाते हैं और इसी के माध्यम से हम समािध की गहराई में बढ़ पाते हैं तथा सूक्ष्म जगत् की शक्ति का ज्ञान प्राप्त करते हैं। यह चक्र शक्ति को उपयोग करने का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण चक्र है। इसलिए साधकों को आज्ञाचक्र से ही ध्यान में प्रवेश करने की बात कही जाती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस चक्र से ही हम नीचे के अन्य चक्रों को आकर्षित कर लेते हैं। इसको माध्यम बनाकर और इसी पर अधिक से अधिक ध्यान लगाकर नीचे के चक्रों की गतिविधियों का एहसास किया जाता है। सभी चक्र इस चक्र के माध्यम से कार्य करना प्रारम्भ कर देते हैं या इसका निर्देशन मानते हैं। इस चक्र की ऊर्जा को लेकर हम सहस्रार की ओर प्रवेश करते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>7. सहस्रार चक्र</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">यह सिर के ऊपरी भाग में स्थित होता है। इसे सहस्त्रदल कमल भी कहा जाता है, शक्तिचक्र भी कहा जाता है और प्रकृति चक्र भी कहा जाता है। यही वह चक्र हैं, जिसमें कुण्डलिनी चेतना प्रवेश करने पर निर्बीज समाधि की प्रप्ति होती है। इससे मनुष्य के अंदर दिव्य शक्तियों का उदय होता है और वह प्रकृति के रहस्यों को समझ पाता है। इससे स्वस्वरूप का ज्ञान प्राप्त होता है व मनुष्य स्वस्वरूप की जननी से एकाकार करता है। इसी से अनन्त लोकों का ज्ञान प्राप्त होता है तथा कुण्डलिनी शक्ति पूर्ण स्वरूप को प्राप्त करती है। विशेष नोट- कुण्डलिनी शक्ति चक्रों के विषय में यहां पर बहुत ही संक्षिप्त जानकारी प्रदान की गई है। कुण्डलिनी शक्ति का एक-एक चक्र एक-एक लोक की शक्तियों के समान है। उनकी शक्तियों का वर्णन कम शब्दों में नहीं किया जा सकता। साधक को यह ज्ञान गुरु मार्गदर्शन से ही पूर्णता से प्राप्त होता है। यहां पर इस बात का ज्ञान होना आवश्यक है कि ये सातों चक्र एक-दूसरे के पूरक हैं। सातों चक्रों का पूर्ण जागरण एक बहुत लम्बी प्रक्रिया है। मगर, साधक जितने कदम चलता है, उतने कदम की ऊर्जा उसे प्राप्त होती जाती है। अत: धैर्यता के साथ उस ऊर्जा को प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ते रहना चाहिए। इसके लिए ध्यान ही एकमात्र सशक्त माध्यम है और प्रबल इच्छाशक्ति होना आवश्यक है।</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in/kundalini-shakti-chakra/">कुण्डलिनी शक्ति चक्र</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in">संकल्प शक्ति</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://sankalpshakti.in/kundalini-shakti-chakra/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>उंगलियों में पंचतत्व &#124;&#124; हस्तमुद्रायें</title>
		<link>https://sankalpshakti.in/hast-mudra/</link>
					<comments>https://sankalpshakti.in/hast-mudra/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 07 Sep 2023 06:11:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[योग जगत]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://sankalpshakti.com/?p=8390</guid>

					<description><![CDATA[<p>पंचतत्व हमारे जीवन में सर्वाधिक महत्त्व रखते हैं, क्योंकि हमारा पूरा शरीर ही पंचतत्त्वों से निर्मित है। हमारे हाथ की पांच उगलियां अलग-अलग तत्त्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं! तात्पर्य यह है कि हमारे हाथ की पांच उगलियां शरीर पर अच्छा बुरा प्रभाव डालने में सक्षम हैं। इसलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने ध्यान-साधना में हाथ की उगलियों [&#8230;]</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in/hast-mudra/">उंगलियों में पंचतत्व || हस्तमुद्रायें</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in">संकल्प शक्ति</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">पंचतत्व हमारे जीवन में सर्वाधिक महत्त्व रखते हैं, क्योंकि हमारा पूरा शरीर ही पंचतत्त्वों से निर्मित है। हमारे हाथ की पांच उगलियां अलग-अलग तत्त्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं! तात्पर्य यह है कि हमारे हाथ की पांच उगलियां शरीर पर अच्छा बुरा प्रभाव डालने में सक्षम हैं। इसलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने ध्यान-साधना में हाथ की उगलियों की मुद्राओं को सर्वाधिक महत्त्व दिया है। इसलिए यहां पर पाठकों को पांचों उंगलियों के पांचों तत्त्वों की जानकारी दी जा रही है। उसके साथ ही यह भी जानकारी दी जा रही है कि हमारी पांचों उंगलियां किस नाम से संबोधित की जाती हैं।</p>



<ol class="wp-block-list">
<li>अंगुष्ठ- अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।</li>



<li>तर्जनी- वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करती है।</li>



<li>मध्यमा- आकाश तत्व का प्रतिनिधित्व करती है।</li>



<li>अनामिका- पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करती है।</li>



<li>कनिष्ठा- जल तत्व का प्रतिनिधित्व करती है।</li>
</ol>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>हस्तमुद्रायें</strong><strong>&#8211;&nbsp;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">हस्तमुद्राओं के माध्यम से हम पंचतत्त्वों को आवश्यकतानुसार नियंत्रित करके अलग-अलग क्षेत्रों का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>1. </strong><strong>ज्ञानमुद्रा</strong><strong>&#8211; </strong>इसमें हाथ के अंगुष्ठ व तर्जनी को मोड़कर उनके अग्रभाग को आपस में मिला लेते हैं। शेष तीनों उंगलियां सीधे खुली रहती हैं। इसे ध्यानमुद्रा भी कहा जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लाभ- इस मुद्रा से मन की एकाग्रता बढ़ती है तथा स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है। यह तनाव, अनिद्रा व काम, क्रोध, लोभ, मोह की नाशक है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>2. </strong><strong>वायुमुद्रा</strong><strong>&#8211;</strong> इसमें तर्जनी को मोड़कर अंगूठे के मूल में लगाते हैं तथा अंगुष्ठ को तर्जनी के ऊपर लगाकर अंगूठे के अग्रभाग को थोड़ा ऊपर उठाकर रखते हैं। शेष तीनों उंगलियां सीधे रखते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लाभ- इससे शरीर में वायु संबंधी सभी विकार नष्ट होते हैं। यह शरीर के कम्पन रोग, गैस, जोड़ों के दर्द, पक्षाघात, घुटनों एवं कमर आदि के दर्द में लाभ पहुंचाती है। चंचलता दूर होती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>3. </strong><strong>शून्य</strong><strong> </strong><strong>मुद्रा</strong><strong>&#8211;</strong> इसमें मध्यमा को मोड़कर अंगूठे के मूल के थोड़ा नीचे लगाते हैं व अंगूठे को ऊपर रख लेते हैं, शेष तीन उंगलियां सीधी रखते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लाभ- यह मुद्रा कान के समस्त रोगों में लाभ पहुंचाती है। जैसे- कान का बहना, दर्द व बहरापन को दूर करने में सहायक है। यह शरीर की हड्डियों को मजबूती प्रदान करती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>4. </strong><strong>पृथ्वीमुद्रा</strong><strong>&#8211;</strong> अनामिका व अंगुष्ठ के अग्रभाग को मिलाकर बनती है। शेष तीनों उगलियां सीधी रखते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लाभ- यह मुद्रा धैर्यता, स्थिरता एवं स्फूर्ति प्रदान करने के साथ ही शरीर की दुर्बलता को मिटाती है तथा संतुलन प्रदान करती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>5. </strong><strong>वरुणमुद्रा</strong><strong>&#8211;</strong> इसमें हाथ के अंगूठे व कनिष्ठा के अग्रभाग को मिलाकर रखते हैं। शेष तीनों उंगलियां सीधे खुली रहती हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लाभ- इससे रक्त संबंधी विकार दूर होते हैं और चर्मरोग में लाभ प्राप्त होता है तथा शरीर का रूखापन मिटता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>6. </strong><strong>प्राणमुद्रा</strong><strong>&#8211;</strong> यह अनामिका व कनिष्ठा तथा अंगुष्ठ के अग्रभाग को मिलाकर बनती है, शेष दोनों उंगलियां सीधी रखते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लाभ- इससे प्राणशक्ति चैतन्य होती है और शरीर में चेतना का संचार होता है। यह नेत्रों की ज्योति बढ़ाता है और थकान एवं भूख-प्यास को मिटाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>7. </strong><strong>अपानमुद्रा</strong><strong>&#8211;</strong> मध्यमा और अनामिका व अंगुष्ठ को मिलाकर बनाते हैं, शेष दो उंगलियां खुली रहती हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लाभ- इससे शरीर के अनेक रोग दूर होते हैं, जैसे-वायु, विकार, बवासीर, कब्ज आदि।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>8. </strong><strong>अपानवायुमुद्रा</strong><strong>&#8211;</strong> इसमें अपान मुद्रा बनाकर तर्जनी उंगली को मोड़कर अंगुष्ठ के मूल में लगाकर रखें और कनिष्ठा को खुली रखते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लाभ- यह तनाव, रक्तचाप एवं पेट की गैस आदि रोगों में लाभदायक है, फेफड़ों और हृदय को मजबूती प्रदान करती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>9. </strong><strong>शक्तिमुद्रा</strong><strong> </strong><strong>(</strong><strong>लिङ्ग</strong><strong> </strong><strong>मुद्रा</strong><strong>)</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">इसमें दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में फंसाकर इस प्रकार रखते हैं कि बायें हाथ का अंगूठा दायें हाथ के अंगूठे के मूल पर हो। दायें हाथ का अंगूठा सीधा खुला रखते हैं और हथेलियों को आपस में मिलाकर रखते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लाभ- यह ऊर्जा व चेतना प्रदान करने वाली मुद्रा है। इससे सर्दी, खांसी व दमा आदि बीमारियां दूर होती हैं। शरीर का कम्पन समाप्त होता है, मन की एकाग्रता प्राप्त होती है तथा स्थिरता व संतुलन प्राप्त होता है।</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in/hast-mudra/">उंगलियों में पंचतत्व || हस्तमुद्रायें</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in">संकल्प शक्ति</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://sankalpshakti.in/hast-mudra/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>प्राणायाम क्या है सम्पूर्ण जानकारी</title>
		<link>https://sankalpshakti.in/pranayam/</link>
					<comments>https://sankalpshakti.in/pranayam/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 29 May 2022 07:09:18 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[योग जगत]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://sankalpshakti.com/?p=2461</guid>

					<description><![CDATA[<p>प्राण ही जीवन है, प्राण ही चेतना है, प्राण ही शक्ति है, प्राण ही सत्य है, प्राण ही औषधि है तथा प्राण ही अंधकार से प्रकाश की ओर लेजाने वाला सशक्त माध्यम है। हमारा शरीर प्राणचेतना से ही संचालित है। प्राणों के बिना जीवन का अस्तित्व ही नहीं है। हमारे शरीर की सभी क्रियायें प्राण [&#8230;]</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in/pranayam/">प्राणायाम क्या है सम्पूर्ण जानकारी</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in">संकल्प शक्ति</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">प्राण ही जीवन है, प्राण ही चेतना है, प्राण ही शक्ति है, प्राण ही सत्य है, प्राण ही औषधि है तथा प्राण ही अंधकार से प्रकाश की ओर लेजाने वाला सशक्त माध्यम है। हमारा शरीर प्राणचेतना से ही संचालित है। प्राणों के बिना जीवन का अस्तित्व ही नहीं है। हमारे शरीर की सभी क्रियायें प्राण के द्वारा ही संचालित हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्राणायाम के माध्यम से हम अपने शरीर के सभी सातों चक्रों को चेतना प्रदान करके तथा अपना पूर्ण आत्मोत्थान करके अपनी दिव्य शक्तियों को हासिल कर सकते हैं। प्राणायाम के द्वारा ही ध्यान और समाधि की अवस्था प्राप्त होती है। हमारे शरीर में पंचप्राणों के द्वारा ही सभी क्रियायें संचालित होती हैं। प्राणायाम के द्वारा ही शरीर के पंचकोषों को जाना और समझा जा सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्राणायाम एक बहुत व्यापक विषय है। समय के साथ प्राणायाम के विषय में एक अलग पुस्तक तैयार करके जनहित में प्रदान की जायेगी। इस शक्तियोग पुस्तक के अन्तर्गत प्राणायाम के विषय में कुछ प्रारम्भिक महत्त्वपूर्ण प्राणायाम व उन्हें करने की विधि का ज्ञान दिया जा रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्राणायाम का अर्थ केवल श्वासों को नियंत्रित करना और उन्हें रोकना ही नहीं है। साधक जब इस सत्य को स्वीकार कर लेता है कि मैं एक अजर-अमर-अविनाशी आत्मा हूँ तथा प्राण ही एक ऐसा माध्यम है, जिससे मैं अपने स्वरूप को जान सकता हूँ, अपनी आत्मा को जान सकता हूँ, तब वह अपने मन को प्राणचेतना में एकाग्र करके अपने आपको प्राण ही समझने का प्रयास करता है। प्राणायाम करते-करते मन सहज एकाग्र होने लगता है। इससे हमारी अंतरकोशिकाएं चैतन्य होजाती हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्राण के प्रथम चरण में पूरक, कुंभक, रेचक और बाह्य कुंभक के क्रम को समझना व प्रारम्भ करना नितांत आवश्यक है। सहज प्राणायाम में यह चार क्रियायें ही होती हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>प्राणायाम</strong><strong> </strong><strong>की</strong><strong> </strong><strong>प्रथम</strong><strong> </strong><strong>प्रक्रिया</strong><strong></strong></p>



<ol class="wp-block-list">
<li><strong>पूरक-</strong> श्वास को अंदर भरने को पूरक कहा जाता है।</li>



<li><strong>कुंभक-</strong> श्वास को भरकर अंदर रोक रखने को कुंभक कहा जाता है।</li>



<li><strong>रेचक- </strong>श्वास को बाहर निकालने की प्रक्रिया को रेचक कहा जाता है।</li>



<li><strong>बाह्य कुंभक-</strong> पूरी श्वास को बाहर निकालकर रोक रखने को बाह्य कुंभक कहते हैं।</li>
</ol>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>प्राणायाम</strong><strong> </strong><strong>के</strong><strong> </strong><strong>नियम</strong><strong> </strong><strong>व</strong><strong> </strong><strong>सावधानियां</strong><strong></strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">प्राणायाम करते समय कुछ बातों को ध्यान में रखना नितांत आवश्यक होता है। वैसे तो इस पुस्तक में योगासन करते समय सावधानियां व नियम लिखे गये हैं, मगर प्राणायाम के पहले कुछ महत्त्वपूर्ण नियम व सावधानियों का उल्लेख करना आवश्यक है:</p>



<ol class="wp-block-list">
<li>प्राणायाम करते समय समतल भूमि का आसन हो। ऐसे किसी भी आसन में बैठें, जिसमे आपकी मेरुदण्ड सीधी रहे, जैसे सुखासन, पद्मासन, सिद्धासन, वज्रासन। अस्वस्थ होने की स्थिति में सीधे पीठ के बल लेटकर या किसी ऐसी कुर्सी पर बैठकर, जिसमें रीढ़ की हड्डी सीधी रहे, प्राणायाम कर सकते हैं।</li>



<li>प्राणायाम ऐसे स्थल पर करना ज्यादा लाभदायक रहता है, जहां शुद्ध वायु हो, सुगन्धित वातावरण हो, प्रदूषण न हो, तीव्र हवाएं न चल रही हों तथा कोलाहलपूर्ण वातावरण नहीं होना चाहिए।</li>



<li>प्राणायाम शरीर की शुद्धता, स्नानादि करके शुद्ध वातावरण में किया जाये, तो ज्यादा फलदायक होता है।</li>



<li>प्राणायाम करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि श्वास नाक से ही लें और नाक से ही छोड़ें। मुख से श्वास नहीं लेना चाहिए। श्वास लेने पर फेफड़ों में श्वास भरने का क्रम होता है, न कि पेट की ओर आकर्षित करके पेट को फुलाएं। वर्तमान में अनेकों बड़े-बड़े योगाचार्य ऐसी गलतियां करते हैं कि जब वे श्वास भरते हैं, तो सीना कम और पेट अधिक फूलता है, जो सर्वथा गलत है।</li>



<li>प्राणायाम में हठपूर्वक श्वास रोकने का प्रयास नहीं करना चाहिए। अपने शरीर की क्षमता के अनुसार सहज रूप से तथा धैर्यता व मन की एकाग्रता से प्राणायाम करना चाहिए।</li>
</ol>



<p class="wp-block-paragraph">शेष अधिकांश सावधानियां वही हैं, जो योगासनों को करने से पहले इस पुस्तक में दी गई है। प्राणायाम करते समय जब हम श्वास को अंदर भरते हैं या हर पल जब हम श्वास लेते रहते हैं, तो इस सत्य का एहसास बना रहना चाहिए कि हमारे शरीर के अंदर केवल सामान्य वायु ही प्रवेश नहीं कर रही है, बल्कि इस वायु में समाहित है संजीवनी शक्ति प्राणचेतना, जो हमारे शरीर में जाकर हमारे प्राणों को बल प्रदान करती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>प्राण</strong><strong> </strong><strong>के</strong><strong> </strong><strong>स्वरूप</strong><strong></strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">शरीर में प्राण के अलग-अलग स्वरूप होते हैं। वैसे तो प्राण एक ही है, जिसे पंचप्राण तथा पंचउपप्राणों में विभक्त किया गया है-</p>



<ol class="wp-block-list">
<li><strong>प्राण-</strong> शरीर में कण्ठ से लेकर हृदय तक के अंगों को जो वायु क्रियाशील रखती है, उसे प्राण कहा गया है।</li>



<li><strong>अपान-</strong> नाभि से लेकर मूलाधार तक के अंगों को जो वायु क्रियाशील रखती है, उसे अपान कहा गया है।</li>



<li><strong>उदान-</strong> कण्ठ से ऊपर सिर तक के अंगों को जो वायु क्रियाशील रखती है, उसे उदान कहा गया है।</li>



<li><strong>समान-</strong> हृदय से नीचे नाभि तक के अंगों को जो वायु क्रियाशील रखती है, उसे समान कहा जाता है।</li>



<li><strong>व्यान-</strong> यह प्राणवायु हमारे पूरे शरीर में फैलकर प्राणचेतना का संचार करती है और शरीर के सभी अंगों को सक्रिय रखती है।</li>
</ol>



<p class="wp-block-paragraph">उपर्युक्त इन पांच प्राणों के साथ ही पांच उपप्राण क्रमश: देवदत्त, नाग, क्रकल, कूर्म और धनंजय हैं, जो क्रमश: छींकना, पलक झपकना, जंभाई लेना, खुजलाना और हिचकी लेना क्रियाओं को क्रियान्वित करते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>पंचकोष</strong><strong></strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">मनुष्य के शरीर में पांच कोष होते हैं, जिन्हें पांच शरीर भी कहा जाता है, जो क्रमश: निम्नलिखित हैं:</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>1. </strong><strong>अन्नमय</strong><strong> </strong><strong>कोष</strong><strong>&#8211;</strong> यह शरीर का प्रथम भाग है, जिसे हम सामान्य अवस्था में देखते-समझते व पहचानते हैं। यह अन्न, भोज पदार्थों और आहार-विहार से स्वस्थ होता है व संचालित होता है। इस परिवेश में सामान्य मनुष्य हरपल भोग-विलास आदि का जीवन जीता है। यह कोष पृथ्वी तत्व से संबंधित है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>2. </strong><strong>प्राणमय</strong><strong> </strong><strong>कोष</strong><strong>&#8211;</strong> यह हमारे शरीर का दूसरा भाग है, जिसमें प्राण तत्व की प्रधानता होती है। हमारे शरीर का संचालन पंचप्राण एवं पंचउपप्राणों से होता है। इसमें मनुष्य कुछ सत्य की ओर उठता है और समझने लगता है कि अन्न और शरीर ही सब कुछ नहीं है। हमारा शरीर अन्न से ही जीवित नहीं है, श्वास और इसके साथ महाप्राण भी बहुत जरूरी है। यहां हम इस सत्य को स्वीकार कर लेते हैं कि अन्न से अधिक जरूरी प्राण है, जो अन्नमय कोष को भी संचालित करते हैं और मनोमयकोष को भी ऊर्जा प्रदान करते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>3. </strong><strong>मनोमय</strong><strong> </strong><strong>कोष</strong><strong>&#8211;</strong> यह शरीर का महत्त्वपूर्ण पक्ष है और सूक्ष्म शरीर का प्रथम भाग कहलाता है। इसमें मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त की वृत्तियां, एकाग्रता, ध्यान और संकल्प-विकल्प आदि का ज्ञान होता है। इसमें पांच कर्मेन्द्रियों की क्रियाशीलता आदि समाहित हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>4. </strong><strong>विज्ञानमय</strong><strong> </strong><strong>कोष</strong><strong>&#8211;</strong> यह कोष ज्ञानप्रधान कोष है और सूक्ष्म शरीर का दूसरा चरण कहलाता है। यह पांच ज्ञानेन्द्रियों, बुद्धिक्रम की प्रखरता, निर्णय लेने की क्षमता, सत्य-असत्य तथा धर्म-अधर्म का ज्ञान प्रदान करके सूक्ष्म शरीर को जाग्रत् करके उसे ध्यान समाधि की ओर अग्रसर करता है। इसी कोष के जाग्रत् होने से व्यक्ति सहजभाव से धर्मपथ पर, सत्यपथ पर बढऩे लगता है, उसे सत्यपथ का ज्ञान होने लगता है तथा चित्त की वृत्तियों का पूर्णतया निरोध होकर वह ध्यान समाधि की ओर अग्रसर होता है। यहां से दिव्यता की प्राप्ति का प्रारम्भ होजाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>5. </strong><strong>आनन्दमय</strong><strong> </strong><strong>कोष</strong><strong>&#8211;</strong> यह पांचवा कोष कारण शरीर है। कारण शरीर मूलस्वरूप कहलाता है। इस कोष के जाग्रत् होने पर ही पूर्ण आनन्द, दिव्यता, चैतन्यता व पूर्णत्व की प्राप्ति करके मनुष्य मोक्ष का अधिकारी हो जाता है। वह सम्पूर्ण सत्य का ज्ञान प्राप्त कर लेता है तथा आत्मा की जननी जगज्जननी से जुड़ जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>बंध</strong><strong></strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">प्राणायाम से शरीर में प्राणों के द्वारा जो शक्ति उत्पन्न होती है, उसे रोककर उध्र्वगामी बनाने और सुषुम्ना नाड़ी को चैतन्य करने के लिए बंधों का ज्ञान होना नितांत आवश्यक है। बंधों को&nbsp; क्रमश: चार भागों में बांटा गया है- मूलबंध, उड्डियान बंध, जालंधर बंध और महाबंध। किसी भी बंध को लगाने के लिए सुखासन, सिद्धासन या पद्मासन जैसे आसनों में बैठना ज्यादा श्रेष्ठ होता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>1. </strong><strong>मूलबंध</strong><strong>&#8211;</strong> इसमें हल्का बाह्य कुंभक करके, गुदा द्वार को अंदर की ओर खींचकर पूरी तरह से बंध लगाने का प्रयास करते हैं। इस बंध को अधिक से अधिक समय तक लगाकर बैठ सकते हैं। साधक इस बंध को जितना अधिक से अधिक समय लगाये रखते हैं, उतना ही चेतनाशक्ति उध्र्वगामी होती है तथा कुण्डलिनी शक्ति चैतन्य होती है। सतत अभ्यास करते-करते मूल बंध को हम चलते-फिरते और खड़े होकर भी करने में अभ्यस्त हो जाते हैं। इससे मूलाधार चक्र जाग्रत् होने लगता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>2. </strong><strong>उड्डियान</strong><strong> </strong><strong>बंध</strong><strong>&#8211;</strong> इस बंध में बाह्य कुंभक करके नाभि को अंदर की ओर आकर्षित कर खींचते हैं और खींचकर रोके रखते हैं। दूसरी प्रक्रिया में खड़े होकर दोनों जाघों में हाथ की हथेलियों को टिकाकर थोड़ा आगे की ओर झुककर बाह्य कुम्भक करके नाभि को अंदर की ओर खींचकर रोक रखते हैं। इससे मणीपूर चक्र चैतन्य होता है और नाभि व पेट से संबंधित रोगों में लाभ प्राप्त होता है। इसी क्रम में पेट के कुछ लाभों के लिए नौलिक्रिया भी कर सकते हैं, जिसमें नाभि को अंदर खींचकर दायें-बायें घुमाते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>3. </strong><strong>जालंधर</strong><strong> </strong><strong>बंध</strong><strong>&#8211;</strong> इसमें गर्दन को आगे झुकाते हुए दाढ़ी को नीचे की ओर झुकाकर कंठ की ओर मोड़ते हैं, जिससे कंठ के पास बंध लग जाता है। इससे गले से संबंधित रोगों में लाभ मिलता है। साथ ही, इस बंध से प्राणचेतना चैतन्य होकर सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>4. </strong><strong>महाबंध</strong><strong>&#8211;</strong> उपर्युक्त तीनों बंधों को एक साथ लगाने को महाबंध कहते हैं। इस महाबंध से प्राणचेतना उध्र्वगामी होती है। इड़ा, पिङ्गला और सुषुम्ना नाड़ी संयुक्त होकर उध्र्वगामी व चैतन्य होती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>प्राणायाम के प्रकार</strong><strong></strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">योगशास्त्रों की पुस्तकों में चालीस से पचास प्रकार के प्राणायामों का उल्लेख मिलता है, मगर उनमें से 75 प्रतिशत ऐसे हैं, जिनकी कोई विशेष उपयोगिता या अनिवार्यता नहीं है। मुख्यत: दस से पन्द्रह प्रकार के प्राणायाम ऐसे हैं, जिनसे प्राणायाम का सम्पूर्ण लाभ मिल जाता है। उन्हीं महत्त्वपूर्ण प्राणायामों का यहां पर उल्लेख किया जा रहा है। उनमें भी ध्यान की गहराई में जाने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण ‘माँ’ और ‘ॐ’ का क्रमिक उच्चारण प्राणायाम अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यहां पर उस क्रम को प्रारम्भ किया जा रहा है, जो अनुभवसिद्ध है तथा जिसे अन्य पुस्तकों से प्राप्त नहीं किया जा सकता।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>1.&nbsp; ‘</strong><strong>माँ</strong><strong>’ </strong><strong>और</strong><strong> </strong><strong>‘</strong><strong>ॐ</strong><strong>’ </strong><strong>उद्गीत</strong><strong> </strong><strong>प्राणायाम</strong><strong></strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">‘माँ’ और ‘ॐ’ आध्यात्मिक मंत्र भण्डारों में से सर्वश्रेष्ठ, अत्यन्त महत्त्वपूर्ण, पूर्ण फलदायी, चेतना प्रदान करने वाले तथा मन को एकाग्र करने वाले बीजमंत्र हैं, जो अंत:करण की गहराई में लेजाकर चेतनाशक्ति को चैतन्य करने में पूर्ण सहायक हैं। इनके सस्वर उच्चारण करने से प्राणायाम भी होता है और शरीर के समस्त चक्रों का मंथन भी होता है। ‘माँ’ और ‘ॐ’ बीजमंत्रों का अधिक से अधिक अनवरत उच्चारण और मानसिक जाप करके हम अपनी आंतरिक चेतना को जगा सकते हैं और ध्यान व समाधि की गहराई में जाकर पूर्णत्व को प्राप्त कर सकते हैं। भविष्य में ‘माँ’ और ‘ॐ’ बीजमंत्रों के विषय में समाज को अलग से एक पुस्तक प्रदान की जायेगी। इस संदर्भ में यहां पर संक्षिप्त जानकारी दी जा रही है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सुखासन, पद्मासन, सिद्धासन या वज्रासन आदि किसी भी सुविधायुक्त आसन में बैठकर अपने इष्ट या गुरु का ध्यान करते हुए आज्ञाचक्र पर ध्यान को एकाग्र करें और आंख बंद करके क्रमश: एक बार ‘माँ’ और फिर ‘ॐ’ का सस्वर उच्चारण करें। इसमें अपनी सामथ्र्यानुसार स्वर को दीर्घता प्रदान करें। सामथ्र्य का तात्पर्य जोर से चिल्लाना नहीं हैं, बल्कि धैर्यता, संतुलन और मन की एकाग्रता के साथ मध्यम स्वर में उच्चारण करें। जब ‘माँ’ का उच्चारण करें, तो लगभग एक चौथाई समय ‘म’ का उच्चारण रहे, शेष 75 प्रतिशत समय ‘आं’ का गुंजरण रहे। चिंतन रहे कि हम मकार, उकार और आकार की ओर अपने अंत:करण की ऊर्जा को आकर्षित कर रहे हैं, अर्थात् कारण शरीर की गहराई से अपनी ऊर्जा शक्ति को सूक्ष्म शरीर में लाते हुए स्थूल शरीर से जोडऩे की भावना होनी चाहिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसी प्रकार ‘ॐ’ का उच्चारण करें, तो उसमें 50 प्रतिशत समय ‘ओ’ का उच्चारण हो और 50 प्रतिशत समय ‘म’ का उच्चारण हो। ‘ओ’ से प्रारम्भ करके ‘म’ के उच्चारण तक गुंजरण की ध्वनि इस प्रकार होनी चाहिए, जैसे मंदिर के घंटे को हम एक बार बजा देते हैं, तो धीरे-धीरे उसकी लम्बी ध्वनि गुंजरित होती है। उच्चारण में भावना रहे कि हम अकार-उकार से होते हुए मकार में पहुंचते हैं, अर्थात् स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर, फिर सूक्ष्म शरीर से कारण शरीर होते हुए अंत:करण की शक्ति में समाहित होकर शान्ति और आनन्द में स्थित होने की भावना होती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">निष्कर्ष यह है कि ‘माँ’ के उच्चारण में अपनी आंतरिक चेतना को आकर्षित करके अपने बाह्य स्थूल शरीर तक समाहित करने और चैतन्यता को प्राप्त करने की भावना होती है! ‘ॐ’ के उच्चारण में बाहरी कोलाहलपूर्ण वातावरण से स्थूल को शांत करते हुए अपने अंत:करण में प्रवेश करके शांति में स्थित होने की भावना रहती है। इन दोनों उच्चारणों को क्रमवार करने से शरीर का मंथन होता है, नाडिय़ां चैतन्य होने लगती हैं और रोम-रोम में ऊर्जा समाहित होने लगती है। फलस्वरूप, हमारी कुण्डलिनी चेतना चैतन्य होकर उध्र्वगामी होती है। यही मंथन सहज हमें ध्यान और समाधि की गहराई में पहुंचा देता है। यदि हम सतत प्रयास करते रहें, तो इसके पूर्ण प्रभावक परिणाम दृष्टिगोचर होने लगते हैं। इससे विषय-विकारों का दमन होता है और इन्द्रिय संयमन होता है। उच्चारण के इस क्रम को किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में और गहराई से समझना चाहिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>2. </strong><strong>सहज</strong><strong> </strong><strong>प्राणायाम</strong><strong></strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">इसमें हम शांतचित्त बैठकर धीरे-धीरे गहरी श्वास अंदर भरते हैं। फिर अपनी सामथ्र्यानुसार श्वास थोड़ी देर रोक रखते हैं और फिर धीरे-धीरे बहार निकाल देते हैं। इस तरह बाहर निकालकर थोड़ी देर शरीर को श्वास से रिक्त रखते हैं, अर्थात् पूरक, कुम्भक, रेचक और बाह्य कुम्भक करते हैं। इसको हम स्वभाव में भी अधिक से अधिक ढ़ाल सकते हैं कि चलते-फिरते, बैठे हुए या कोई काम करते हुए गहरी श्वांस भरें और बाहर निकालें। इससे गहरी श्वास लेने की आदत पड़ जाती है, फेफड़े चैतन्य होजाते हैं और हमारे शरीर को भरपूर ऑक्सीजन मिलती रहती है। इससे शरीर स्वस्थ रहता है। बीमार या अस्वस्थ होने की अवस्था में लेटकर भी आप इस प्रक्रिया को कर सकते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>3. </strong><strong>अनुलोम</strong><strong>&#8211;</strong><strong>विलोम</strong><strong> </strong><strong>(</strong><strong>नाड़ीशोधन</strong><strong> </strong><strong>प्राणायाम</strong><strong>)</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">इसमें सुखासन, पद्मासन, सिद्धासन, कमलासन या वज्रासन आदि किसी सुविधायुक्त आसन में बैठें तथा शांतचित्त होकर मन को एकाग्र करें। मेरुदण्ड सीधी रहे। बायें हाथ को सुविधानुसार जैसे घुटनों आदि पर रख लें। दायें हाथ के अंगूठे से दायीं नाक को हल्का सा बंद करें, तर्जिनी उंगली को नाक के ऊपर भौहों के मध्य में रख सकते हैं या थोड़ा उठाये रख सकते हैं। मध्यमा और अनामिका उंगली को बायें नाक के छिद्र पर रखें। फिर बायें नाक से धीरे-धीरे गहरी श्वास लेते हुए पूरक करें, और उसी तरफ से ही श्वास निकाल दें, रेचक करें। इसके बाद बायीं नाक को बंद करके दायीं नाक से श्वास भरें और उसी से ही निकाल दें। इन दोनों प्रक्रियाओं को तीन से पांच बार करें। फिर दूसरे क्रम में बायीं नाक से श्वास भरें और उसे बंद करके, दायीं नाक से निकाल दें। अब दायीं नाक से श्वास भरें और बायीं नाक से निकाल दें। इस क्रम को कम से कम पांच से दस बार करें। श्वास अंदर भरकर यथाशक्ति रोक रखें, फिर दूसरे नाक से निकालें। अर्थात् पूरक, कुम्भक, रेचक करें। इस क्रम से सम्पूर्ण नाडिय़ों का शोधन होता है। इस प्राणायाम से मन की एकाग्रता बढ़ती है, शरीर में चेतना का संचार होता है, शरीर स्वस्थ रहता है तथा यह सभी प्रकार की बीमारियों में लाभदायक है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>4. सूर्यभेदी प्राणायाम</strong></p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="1200" height="630" src="https://sankalpshakti.com/wp-content/uploads/2022/05/8-1024x538.jpg" alt="Suryabhedi Pranayam" class="wp-image-8381" title="प्राणायाम क्या है सम्पूर्ण जानकारी 1" srcset="https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/8-1024x538.jpg 1024w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/8-300x158.jpg 300w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/8-768x403.jpg 768w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/8-150x79.jpg 150w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/8-696x365.jpg 696w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/8-1068x561.jpg 1068w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/8-800x420.jpg 800w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/8.jpg 1200w" sizes="(max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /><figcaption class="wp-element-caption">Suryabhedi Pranayam</figcaption></figure>



<p class="wp-block-paragraph">सुविधायुक्त आसन में बैठकर दाहिने हाथ की मध्यमा और अनामिका से बायें नाक को बंद कर लें। फिर दाहिने नाक से तेजी से श्वास अंदर भरें और यथाशक्ति रोक रखें तथा मूलबंध व जालंधर बंध लगायें। तत्पश्चात् पहले मूलबंध छोड़े, फिर जालंधर बंध छोड़े। अब दायीं नाक को अंगूठे से बंद कर लें और बायीं नाक से श्वास को तेजी से निकाल दें। इससे शरीर में उष्णता प्राप्त होती है, चेतना का संचार होता है तथा स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है व कुण्डलिनी चेतना को जाग्रत् करने में सहायक है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>5. चंद्रभेदी प्राणायाम</strong></p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img decoding="async" width="1024" height="538" src="https://sankalpshakti.com/wp-content/uploads/2022/05/9-1024x538.jpg" alt="chandrabhedi Pranayam" class="wp-image-8383" title="प्राणायाम क्या है सम्पूर्ण जानकारी 2" srcset="https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/9-1024x538.jpg 1024w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/9-300x158.jpg 300w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/9-768x403.jpg 768w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/9-150x79.jpg 150w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/9-696x365.jpg 696w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/9-1068x561.jpg 1068w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/9-800x420.jpg 800w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/9.jpg 1200w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /><figcaption class="wp-element-caption">chandrabhedi Pranayam</figcaption></figure>



<p class="wp-block-paragraph">इसमें दायीं नाक को बंद करके बायीं नाक से श्वास भरते हैं। उसके बाद कुंभक करके मूलबंध और जालंधर बंध लगाते हैं तथा यथाशक्ति श्वास को रोक रखते हैं। इसके पश्चात् पहले मूलबंध और फिर जालंधरबंध को छोड़ते हुए बायीं नाक को बंद कर लेते हैं और दायीं से तेजी से श्वास को बाहर निकाल देते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इससे शरीर में शीतलता प्राप्त होती है, थकावट दूर होती है, मन में शांति होती है, रोगों को दूर करने में सहायक है व चेतना प्रदान करता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>6. </strong><strong>कपालभाति</strong><strong> </strong><strong>प्राणायाम</strong><strong></strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">यह प्राणायाम भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। कपालभाति का तात्पर्य है मस्तक को, आभामण्डल को दीप्त करना या चैतन्य करना। यह किसी भी सुविधायुक्त आसन में बैठकर करना चाहिए। इसके दो प्रकार हैं- एक सहज या सौम्य कपालभाति और दूसरी तीक्ष्ण कपालभाति, जिसे भस्रिका भी कहते हैं। इसे खाली पेट करना चाहिए। चैतन्यता से बैठकर सौम्य कपालभाति में नाभि को थोड़ा अंदर की ओर हल्के झटके से खींचते हैं और चेतना को ऊपर की ओर चढ़ाने का प्रयास करते हैं। इसमें श्वास आंशिक रूप से रेचक होती है। मगर, इसमें श्वास को बाहर निकालने का भाव ज्यादा नहीं रखते हैं। हम अपनी नाभि को बार-बार अंदर की ओर झटके देते हुए, अपनी सुषुम्ना नाड़ी की ऊर्जा को मस्तक, सहस्रार की ओर चढ़ाने का प्रयास करते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण क्रम है। इसको नेत्र बंद करके आज्ञाचक्र पर ध्यान लगाकर कर सकते हैं। इससे आलस्य-जड़ता दूर होती है और शरीर में चैतन्यता आती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">तीक्ष्ण कपालभाति में हम उसी प्रकार नाभि को झटके से अंदर खींचते हैं और उसी के साथ ही नासिका से अंदर की वायु को रेचक कर झटके से बाहर निकालते हैं। इसमें पूरक नहीं किया जाता, अर्थात् श्वास को अंदर भरने का प्रयास नहीं करते, बल्कि सहज भाव से कुछ श्वास अंदर चली जाती है। हम बार-बार शीघ्रता से इसी क्रम को सतत करते रहते हैं। हम नित्यप्रति कम से कम सौ बार या अधिकतम हजार बार यदि इसे करते हैं, तो वह पूर्ण फलदायी होता है। यदि किसी के पेट का ऑपरेशन हुआ हो, तो उसके बाद कम से कम छ: माह तक नहीं करते। इस प्राणायाम से सभी प्रकार के रोगों में लाभ प्राप्त होता है, नाडिय़ों का शोधन होता है और अंदर की दूषित वायु बाहर निकल जाती है। वात-पित्त-कफ का शरीर में संतुलन बनता है तथा चेहरे पर चैतन्यता आती है। साथ ही, कुण्डलिनी चेतना को जगाने में सहायता मिलती है। मन शांत और प्रसन्न होता है। विकारों का दमन होता है और मोटापा दूर होता है। लीवर, किडनी एवं हृदय को लाभ प्राप्त होता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>7. भस्रिका प्राणायाम</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">इसके लिए सुखद-सहज आसन में बैठकर और मुह बंद करके नाक से शीघ्रता से श्वास अंदर भरकर पूरक करते हैं और तुरंत नाक से बाहर निकालते हैं, रेचक करते हैं। इस क्रम में तेजी से सिर को ऊपर उठाते हुए पूरक करते हैं और शीघ्रता से सिर को थोड़ा सा नीचे झुकाते हुए रेचक करते हैं। इस प्राणायाम को अपनी शारीरिक सामथ्र्यानुसार सतत करते हैं। इसे कम से कम 50 बार से लेकर क्षमतानुसार हजार बार भी कर सकते हैं। चाहें तो बीच-बीच में रुककर सामान्य श्वास ले सकते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस प्राणायाम को दो-तीन प्रकार से और भी कर सकते हैं। खड़े होकर या बैठकर दोनों हाथों को ऊपर की ओर उठाते हुए, गहरी श्वास अंदर भरें, फिर मुट्ठी बांधकर झटके के साथ श्वास बाहर निकालते हुए हाथों को कंधे तक लायें और पुन: मुट्ठी खोलकर हाथ को ऊपर लेजायें और पुन: वह प्रक्रिया दोहरायें। जितनी शारीरिक क्षमता हो, उतनी बार यह प्राणायाम करें।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दूसरे क्रम में श्वास भरते हुए हाथों को सामने लेजायें और मुट्ठी बंदकरके शीघ्रता से श्वास छोड़ते हुए हाथों को कंधे की ओर खींचें, फिर श्वांस लेते हुए हथेली को बाहर लेजायें। इसी क्रम को शीघ्रता से बार-बार करें।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह शरीर के समस्त रोगों में पूर्ण फलदायी है तथा कुण्डलिनी चेतना को जगाने में पूर्ण सहायक है। इसे तीक्ष्णता से दो-चार मिनट करने से ही शरीर पूरी ऊर्जा से भर जाता है। कई बार अधिक मात्रा में सतत करने से शारीरिक ऊर्जा बढऩे के कारण मूर्छा तक आजाती है। इसलिए किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में सावधानीपूर्वक करें। प्रारम्भ में इसे अभ्यास होने तक के लिए धीमी गति में ही करना चाहिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हृदय के मरीजों को इसे नहीं करना चाहिए। अस्वस्थ होने की अवस्था में भी इसे तीक्ष्णता से नहीं करना चाहिए। साधकों व ब्रह्मचारियों के लिए यह सबसे अधिक फलदायी है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>8. भ्रामरी प्राणायाम</strong></p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img decoding="async" width="1024" height="538" src="https://sankalpshakti.com/wp-content/uploads/2022/05/3-1024x538.jpg" alt="Bhramari Pranayam" class="wp-image-8384" title="प्राणायाम क्या है सम्पूर्ण जानकारी 3" srcset="https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/3-1024x538.jpg 1024w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/3-300x158.jpg 300w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/3-768x403.jpg 768w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/3-150x79.jpg 150w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/3-696x365.jpg 696w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/3-1068x561.jpg 1068w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/3-800x420.jpg 800w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/3.jpg 1200w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /><figcaption class="wp-element-caption">Bhramari Pranayam</figcaption></figure>



<p class="wp-block-paragraph">भ्रामरी का अर्थ है भौंरे की तरह गुंजरण की ध्वनि करना। इस प्राणायाम में किसी भी सुविधायुक्त आसन में बैठकर आज्ञाचक्र पर ध्यान केन्द्रित करते हुए दायें हाथ के अंगूठे से दायें कान को और बायें हाथ के अंगूठे से बायें कान को बंद करें। दोनों हाथों की तर्जनी के द्वारा हल्के से आंखों को बंद करें और दोनों हाथों की मध्यमा को नाक के ऊपर ऐसे रखें कि नाक बंद न होने पाए। दोनों हाथों की अनामिका को होठ के ऊपर और कनिष्ठा को होठ के नीचे रखें। अब मुख को बंद करके, भौंरे की आवाज की तरह गुंजरण करें। इसको पांच से दस बार तक कर सकते हैं। यह मन की एकाग्रता, तनाव से मुक्ति और ध्यान में सहायक है। यह मन की चंचलता को दूर करता है तथा इससे याददाश्त भी बढ़ती है। यह हर उम्र के लोगों के लिए लाभदायक है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>9. मूर्छा प्राणायाम</strong></p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="538" src="https://sankalpshakti.com/wp-content/uploads/2022/05/5-1024x538.jpg" alt="murchha Pranayam" class="wp-image-8385" title="प्राणायाम क्या है सम्पूर्ण जानकारी 4" srcset="https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/5-1024x538.jpg 1024w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/5-300x158.jpg 300w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/5-768x403.jpg 768w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/5-150x79.jpg 150w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/5-696x365.jpg 696w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/5-1068x561.jpg 1068w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/5-800x420.jpg 800w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/5.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /><figcaption class="wp-element-caption">murchha Pranayam</figcaption></figure>



<p class="wp-block-paragraph">किसी भी सुखद आसन में बैठकर दोनों हाथों के अंगूठों से दोनों कान बंद कर लें और तर्जिनी से दोनों आंखें बंद कर लें। मध्यमा को नाक के ऊपर और अनामिका को होठों के ऊपर रख लें तथा कनिष्ठिका को होठों के नीचे रख लें। फिर नासिका से पूरी श्वास अंदर भरकर नासिका को बंद कर लें और जालंधर बंध लगा लें तथा यथाशक्ति अंदर रोकें और फिर नासिका से रेचक कर दें।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह मन को मूर्छा प्रदान करता है, चित्त की एकाग्रता में सहायक है, चेतना के जागरण में सहायक है। सावधानी का ध्यान रखें तथा हाई ब्लडप्रैशर, मिर्गी के मरीज या जिन्हें चक्कर या बेहोशी आती है और हृदय के मरीज, गर्भवती महिलाएं इसे भूलकर भी न करें।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>10. अग्निसार प्राणायाम</strong></p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="538" src="https://sankalpshakti.com/wp-content/uploads/2022/05/4-1024x538.jpg" alt="Agnisaar Pranayam" class="wp-image-8386" title="प्राणायाम क्या है सम्पूर्ण जानकारी 5" srcset="https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/4-1024x538.jpg 1024w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/4-300x158.jpg 300w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/4-768x403.jpg 768w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/4-150x79.jpg 150w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/4-696x365.jpg 696w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/4-1068x561.jpg 1068w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/4-800x420.jpg 800w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/4.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /><figcaption class="wp-element-caption">Agnisaar Pranayam</figcaption></figure>



<p class="wp-block-paragraph">सहज सुखद आसन में बैठकर दोनों हाथों की हथेलियों को घुटनों या जांघों पर रखें तथा पूरी श्वास को रेचक करते हुए, बाह्य कुंभक करें। अब नाभि को पूरा अंदर की ओर खीचें, फिर ढीला छोड़ दें, फिर खींचे, फिर ढीला करें। इस क्रम को शीघ्रता से लगातार अपनी सामथ्र्यानुसार करते रहें। थकान लगने पर रुककर दो-चार सामान्य श्वास लें और फिर इसी प्रक्रिया को दोहराएं। इस तरह दो-तीन बार नित्यप्रति करें। इसे खड़े होकर, बैठकर या पीठ के बल लेटकर भी कर सकते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इससे नाभि की जड़ता दूर होती है, प्राणवायु सक्रिय होती है, पाचनतंत्र ठीक से कार्य करता है और शरीर को पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त होता है। यह पेट की चर्बी को घटाता है, कब्जादि में लाभदायक है व कुण्डलिनी चेतना जाग्रत् करने में सहायक है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>11. </strong><strong>उज्जयी</strong><strong> </strong><strong>प्राणायाम</strong><strong></strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">इसमें सहज आसन पर बैठकर गर्दन को आगे की ओर हल्का झुकाते हैं तथा गले का हल्का संकुचन करके इस प्रकार पूरक करते हैं, जैसे गले से बहुत हल्की खर्राटे की आवाज आती है। श्वास को धीरे-धीरे खींचकर थोड़ी देर कुम्भक करें और फिर धीरे-धीरे गर्दन को सीधा कर रेचक कर दें। इस क्रम को नित्यप्रति दो या तीन बार अवश्य करें। यह गले के समस्त रोगों के लिए लाभदायक है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>12. शीत्कारी प्राणायाम</strong></p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="538" src="https://sankalpshakti.com/wp-content/uploads/2022/05/6-1024x538.jpg" alt="Sheetkari Pranayam" class="wp-image-8387" title="प्राणायाम क्या है सम्पूर्ण जानकारी 6" srcset="https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/6-1024x538.jpg 1024w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/6-300x158.jpg 300w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/6-768x403.jpg 768w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/6-150x79.jpg 150w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/6-696x365.jpg 696w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/6-1068x561.jpg 1068w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/6-800x420.jpg 800w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/6.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /><figcaption class="wp-element-caption">Sheetkari Pranayam</figcaption></figure>



<p class="wp-block-paragraph">किसी भी सुविधायुक्त आसन में बैठकर जिह्वा को ऊपर तालु पर लगाएं और साथ ही होठों को थोड़ा खोलकर जबड़ों (दांतों) को बंद करके श्वास को शीत्कार करते हुए अंदर खींचकर पूरक करें। फिर मुंह बंद करके नाक से धीरे-धीरे श्वास रेचक करें। यह प्राणायाम चार या पांच बार करें।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इससे मुख, दांत जिव्हा आदि के रोग दूर होने के साथ ही अजीर्णता को दूर करने वाला, पित्तनाशक, फेफड़ों को बल प्रदान करने वाला, शरीर को स्वास्थ्य प्रदान करता है। इससे प्यास मिटती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>13. शीतली प्राणायाम</strong></p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="538" src="https://sankalpshakti.com/wp-content/uploads/2022/05/7-1024x538.jpg" alt="Sheetali Pranayam" class="wp-image-8388" title="प्राणायाम क्या है सम्पूर्ण जानकारी 7" srcset="https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/7-1024x538.jpg 1024w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/7-300x158.jpg 300w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/7-768x403.jpg 768w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/7-150x79.jpg 150w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/7-696x365.jpg 696w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/7-1068x561.jpg 1068w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/7-800x420.jpg 800w, https://sankalpshakti.in/wp-content/uploads/2022/05/7.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /><figcaption class="wp-element-caption">Sheetali Pranayam</figcaption></figure>



<p class="wp-block-paragraph">किसी भी सुखद आसन में बैठकर जीभ को थोड़ा बाहर निकालें और उसे हल्का गोलाकर बना लें। अब उसी से श्वास को अंदर की ओर खींचते हुए पूरक करें। फिर कुछ देर कुम्भक करके जीभ अंदर कर लें। अब मुख बंद करके नाक से श्वास को रेचक कर दें। इस क्रम को पांच से दस बार करें। इससे शरीर में शीतलता आती है, भूख-प्यास मिटती है और स्वास्थ्य में लाभदायक है। इससे ज्वर ठीक होता है और यह मुख व गले के रोगों में लाभ प्रदान करता है। उच्चरक्तचाप के रोगियों के लिए भी लाभदायक है। यह तनाव मिटाकर मन को एकाग्रता प्रदान करता है।</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in/pranayam/">प्राणायाम क्या है सम्पूर्ण जानकारी</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in">संकल्प शक्ति</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://sankalpshakti.in/pranayam/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>अष्टांग योग क्या है? Ashtang Yog Sampurn Jankari</title>
		<link>https://sankalpshakti.in/ashtang-yogs/</link>
					<comments>https://sankalpshakti.in/ashtang-yogs/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 29 May 2022 07:05:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[योग जगत]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://sankalpshakti.com/?p=2457</guid>

					<description><![CDATA[<p>मानव शरीर इस निखिल ब्रह्माण्ड की सबसे सुन्दर कृति है। मानव जीवन को सबसे श्रेष्ठ कहा गया है। देवताओं के लिए भी दुर्लभ मानव शरीर में निखिल ब्रह्माण्ड समहित है। सामान्य मानव जब पतन के मार्ग में पहुंच जाता है, तो बहुत ही दीन-हीन, असमर्थ, असहाय, मानसिक विकलांग और अपंग होकर उस अवस्था में पहुंच [&#8230;]</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in/ashtang-yogs/">अष्टांग योग क्या है? Ashtang Yog Sampurn Jankari</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in">संकल्प शक्ति</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">मानव शरीर इस निखिल ब्रह्माण्ड की सबसे सुन्दर कृति है। मानव जीवन को सबसे श्रेष्ठ कहा गया है। देवताओं के लिए भी दुर्लभ मानव शरीर में निखिल ब्रह्माण्ड समहित है। सामान्य मानव जब पतन के मार्ग में पहुंच जाता है, तो बहुत ही दीन-हीन, असमर्थ, असहाय, मानसिक विकलांग और अपंग होकर उस अवस्था में पहुंच जाता है, जहां वह स्वयं के जीवन का भी संचालन नहीं कर पाता। वहीं यह मनुष्य उच्चता की ओर बढ़ता है तथा मानवीय मूल्यों को स्थापित करता हुआ धर्मपथ पर बढ़कर अष्टांग योग के मार्ग में चलता है और अपनी समस्त चित्तवृत्तियों का निरोध करके समाधि की अवस्था वैराग्य को प्राप्त करता है। इस प्रकार वह अपनी पूर्ण आत्मचेतना को जाग्रत् करके अलौकिक दिव्यशक्तियों का मालिक बनता हुआ, अनन्त लोकों से अपना सम्बन्ध स्थापित कर लेता है। अपने अनुसार कुछ भी करने के लिए सामथ्र्यवान् बन जाता है। साथ ही वह प्रकृतिसत्ता का एक सहायक अंग बनकर मानव से महामानव बन जाता है। ऋषित्व पद को प्राप्त करके वह दिव्यधाम का वासी बनता है, जो मानव जीवन का अंतिम पड़ाव और लक्ष्य है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">शून्य से शिखर तक की इस यात्रा को तय करने के लिए हमें अपने तन-मन और बुद्धि को स्वस्थ निर्मल चेतनावान् बनाते हुए बढऩा पड़ता है। मनुष्य को अपनी जीवनचर्या को एक व्यवस्थित स्वरूप देना पड़ता है। आहार-विहार-विचारों को व्यवस्थित रखकर आगे बढऩा पड़ता है। अष्टांग येाग में इस पूरी यात्रा को आठ महत्त्वपूर्ण अंगों में बांटा गया है, जो क्रमश:- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि हैं। इन आठों अंगों में पूर्णतया निष्ठा-विश्वास और समर्पण के साथ चलने पर ही हमें पूर्णत्व का लाभ प्राप्त होता है। यदि मनुष्य साधना की चरम अवस्था को प्राप्त करना चाहता है, तो अष्टांग योग का पूर्णता से पालन करना अनिवार्य है। मगर, इसका तात्पर्य यह नहीं है कि जो पूर्णत्व से पालन नहीं कर सकते, उन्हें कुछ फल प्राप्त होगा ही नहीं। अष्टांग योग का यह पथ एक ऐसी धारा है, जिस पर हम जितना चलेंगे, उतना फल प्राप्त होता जाता है। जिस प्रकार यदि कोई भूखा व्यक्ति अन्न का एक दाना भी खा लेता है, तो उसकी कुछ न कुछ भूख अवश्य मिटती है और भरपेट खा लेता है, तो पूर्णता से भूख मिट जाती है। अत: इस अष्टांग योग का आप जितना पालन करते जायेंगे, उतना फल आपको प्राप्त होता जायेगा। इस पथ पर चलने के लिए ऐसा भी नहीं है कि जब आप एक अंग का पालन कर लें, तभी दूसरे में बढ़ें। आप सभी आठों अंगों को एक साथ अपने जीवन के साथ जोड़ते हुए आगे बढ़ेंगे, तो ज्यादा श्रेष्ठ होगा। धीरे-धीरे अभ्यास के द्वारा योग के आठों अंग मजबूत होते जाते हैं। ये सभी आठों अंग एक-दूसरे के पूरक हैं। इनमें प्रथम पांच अंग यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार बहिरंग योग कहलाते हैं, जो स्थूल जगत् से जुड़े हुए हैं। धारणा, ध्यान और समाधि अंतरंग योग कहलाते हैं, जो सूक्ष्म जगत् से जुड़े हुए हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मानवजीवन के लिए प्रथम दो अंग यम और नियम अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं।&nbsp; इन दोनों के मजबूत होने पर शेष सभी अंगों पर सहज भाव से पकड़ मजबूत होती चली जाती है, चूंकि अंतिम तीन अंगों की गहराई को प्राप्त करने के लिए यम-नियम का पूर्णतया पालन करना अत्यन्त अनिवार्य है। इसके बिना समाधि की पूर्णता को प्राप्त किया ही नहीं जा सकता। यह अष्टांग योग वास्तव में एक शक्ति योग है। इसे जिसने कर लिया, वह शक्तिवान् बन गया और जिसने नहीं किया, वह सामान्य रह गया।</p>



<p class="has-text-align-center wp-block-paragraph"><strong>प्रथम अंग-यम</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">इस अंग को पांच भागों में बांटा गया है। प्रत्येक भाग का विस्तार इतना बड़ा है कि एक भाग में ही एक ग्रन्थ तैयार हो जाये। मगर, यहां पर इन भागों की मूल भावना को ही व्यक्त किया जा रहा है।</p>



<ol class="wp-block-list" type="1">
<li><strong>अहिंसा-</strong> मन-वचन-कर्म के द्वारा किसी प्रकार का ऐसा कार्य न करना, जिससे किसी भी प्राणी, जीव-जन्तु या स्वयं का अहित हो रहा हो अथवा कष्ट पहुंच रहा हो, अर्थात् सभी के हित की और सभी के प्रति प्रेम की भावना ही सच्ची अहिंसा है। किसी दूसरे को भी हिंसा के प्रति प्रेरित नहीं करना चाहिए। अपने सामने किसी दूसरे के द्वारा हो रही ङ्क्षहसा का विरोध करना भी अहिंसा है, अर्थात् न हिंसा करें और न हिंसा होने दें। साथ ही, अपने ऊपर हो रही हिंसा को भी न सहें।</li>



<li><strong>सत्य-</strong> अपनी योग्यतानुसार मन, बुद्धि, अंत:करण व इन्द्रियों द्वारा जो सत्य देखा, सुना व समझा गया, उसे वैसा ही व्यक्त करना सत्य कहलाता है। सदा सत्य बोलें व स्वयं सत्य पर अमल करें। सत्य की ताकत सबसे बड़ी ताकत कही गई है। सत्य के फल का वर्णन कर पाना संभव ही नहीं है। दूसरों को जो भ्रम में न डाले, धोखा न दे, वैसा ज्ञान, वैसी वाणी सत्य कहलाती है। सत्य बोलने में प्रिय हो तथा सदैव सत्य बोलने का प्रयास करना चाहिए। कुछ सत्य ऐसे होते हैं, जहां हमें कटु&nbsp; बोलना पड़ता है, जैसे किसी चोर को चोर कहना, हत्यारे को हत्यारा कहना, देशद्रोही को देशद्रोही कहना आदि इन्हें कहना पूर्ण सत्य माना जाता है। मगर, हम यदि अंधे को अंधा न कहकर सूरदास कह दें, तो वह प्रिय सत्य कहा जाता है। मनुष्य को मन-वचन-कर्म से सदैव सत्य का पालन करना चाहिए।</li>



<li><strong>अस्तेय- </strong>मन-वचन-कर्म से किसी भी ऐसी चीज की इच्छा या प्राप्त करने का प्रयास नहीं करना चाहिए, जिस पर अपना अधिकार न हो, जैसे किसी का सामान चुराकर न लेना, किसी से छलपूर्वक छीनकर, बलपूर्वक या किसी को प्रेरित करके कुछ ऐसा प्राप्त न करना, जिस पर अपना अधिकार न हो। वही अस्तेय है।</li>



<li><strong>ब्रह्मचर्य-</strong> मन-वचन-कर्म से विषय-विकारों-वासनाओं को न अपनाना ही ब्रह्मचर्य है, अर्थात् सभी कामवासनाओं पर पूर्णतया नियंत्रण का नाम ही ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य का पूर्णतया पालन करने से मनुष्य की चेतनाशक्ति प्रभावक होती है, बल-बुद्धि-आयु में वृद्धि होती है तथा मनुष्य सत्यपथ की ओर बढऩे लगता है। गृहस्थ मनुष्य को शादी से पूर्व पूर्णतया ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहिए तथा शादी के बाद एक पतिव्रत/एक पत्नीव्रत धर्म का पालन करना चाहिए। गृहस्थी में रहकर भी अधिक से अधिक वासनाओं पर नियंत्रण करें और उम्र के चौथे पड़ाव में तो पूर्ण ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहिए। जीवन में जो पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वे सर्वश्रेष्ठ हैं।</li>



<li><strong>अपरिग्रह-</strong> अपने जीवन के लिए नितांत आवश्यकता से अधिक सुख-साधन का संग्रह न करना अपरिग्रह है। आवश्यकता से अधिक दान भी नहीं प्राप्त करना चाहिए। &#8216;सादा जीवन, उच्च विचार’ की भावना होनी चाहिए। पंचतत्त्वों से जुड़े संसाधनों, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध के प्रलोभनों से हम जितने मुक्त रहेंगे, उतना ही हमारा अपरिग्रह होगा, उतना ही मन वैराग्य भाव की ओर बढ़ेगा। अपने अंदर उपयोग की भावना हो, उपभोग की नहीं।</li>
</ol>



<p class="has-text-align-center wp-block-paragraph"><strong>द्वितीय अंग-नियम</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>जीवन किस प्रकार जिया जाये और मनुष्य की दिनचर्या कैसी हो? इसके लिए पांच नियम बताये गये हैं-</strong></p>



<ol class="wp-block-list" type="1">
<li><strong>शौच-</strong> शरीर और मन की शुद्धता व पवित्रता को ही शौच कहा गया है। इसमें नियम से नित्यप्रति शौच क्रिया आदि के लिए जाना, शरीर की शुद्धता के लिए स्नानादि करना, सत्कर्मों से उपार्जित सात्त्विक भोजन करना सम्मिलित हैं। सत्कर्मो से भी शरीर की शुद्धता होती है। मन की शुद्धता अत:करण की शुद्धता मानी जाती है। राग-द्वेष, ईष्र्या, काम-क्रोध-लोभ तथा भय का त्याग करने से अंत:करण व मन की शुद्धता होती है।</li>



<li><strong>संतोष-</strong> अपने सत्कर्मों तथा पुरुषार्थ से उपार्जित जो भी धन-संसाधन आदि प्राप्त होजायें, उनसे ही संतुष्ट रहना एवं सुख-दु:ख, लाभ-हानि, यश-अपयश, सिद्धि-असिद्धि, अनुकूलता-प्रतिकूलता आदि के प्राप्त होने पर सर्वदा संतुष्ट व प्रसन्नचित्त रहने का नाम संतोष है।</li>



<li><strong>तप-</strong> जीवन को सत्यपथ पर बढ़ाने के लिए मन व इन्द्रियों के संयमन एवं आत्मचेतना की प्राप्ति के लिए जप-तप-योग-ध्यान तथा व्रत-उपवास हर विपरीत परिस्थिति व सभी मौसमों सर्दी-गर्मी-बरसात में एक समान अपने नियमों का दृढ़ता से पालन करने को ही तप कहा गया है।</li>



<li><strong>स्वाध्याय- </strong>ज्ञान अनुभव की प्राप्ति के लिए सत्संग, गुरुवचनों को सुनना, धर्मग्रन्थों एवं शास्त्रों का अध्ययन करना, स्तुति-स्तोत्र का पाठ करना आदि स्वाध्याय कहलाता है।</li>



<li><strong>ईश्वर प्राणिधान-</strong> मन, वाणी, कर्म के द्वारा इष्ट की भक्ति करना, उनके नाम का जप करना, उनके गुणों का गुणगान करना, स्मरण करना, कीर्तन-भजन करना व पूर्ण समर्पण भाव रखना ही सच्चे अर्थों में ईश्वर प्राणिधान है।</li>
</ol>



<p class="has-text-align-center wp-block-paragraph"><strong>तृतीय अंग-आसन</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">आसन अनगिनत हैं। मनुष्य शरीर की हर गतिविधि व क्रियायें सब आसन ही हैं। हम जो भी दृश्यजगत् में देखते हैं, उन दृश्यों से हमें किसी न किसी आसन का बोध होता है। वैसे हमें जिस आसन पर बैठने से सुख प्राप्त हो, वह भी एक आसन है। आत्मचेतना की प्राप्ति व योग साधना में सहायक कुछ अलग-अलग आसनों का क्रम निर्धारित किया गया है। इनमें कुछ तो शरीर के स्वास्थ्य को ठीक रखते हैं और कुछ मन को एकाग्र रखते हैं। कुछ आसनों से आत्मचेतना प्रभावक होती है। शरीर की समस्त नाडिय़ों के शोधन एवं कोशिकाओं की चैतन्यता आदि के लिए अलग-अलग आसन निर्धारित किये गये हैं। कुछ आसन व्यायाम के लिए तथा कुछ चेतना की प्राप्ति में सहायक होते हैं। वर्तमान समय में मनुष्य की जो जीवनचर्या है, वह आरामपरस्त अधिक है, जिसके कारण उसके शरीर में जड़ता अधिक आ चुकी है। इसी जड़ता को दूर करने के लिए सैकड़ों प्रकार के महत्त्वपूर्ण आसन निर्धारित किये गये हैं। जड़ता के दूर होने पर ही धारणा, ध्यान और समाधि की तरफ बढ़ा जा सकता है, जिनमें से कुछ ऐसे आसन सिद्ध किये जा सकते हैं, जिनमें अधिक से अधिक देर तक बैठकर ध्यान-साधना की जा सकती है। इस पुस्तक में सभी आवश्यक महत्त्वपूर्ण आसन आगे दिए गये हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>नोट-</strong> आसन-प्राणायाम प्रारम्भ करने से पहले यह जानना अति आवश्यक है कि उन्हें किस क्रम से प्रारम्भ किया जाय? शरीर की शिथिलता और चैतन्यता के आधार पर कुछ सावधानियां आवश्यक होती हैं। यहां पर एक ऐसे क्रम की जानकारी दी जा रही है, जिससे करने पर शरीर को अधिक से अधिक लाभ प्राप्त हो सके, क्योंकि नित्यप्रति आसनों के साथ ही कुछ व्यायाम और प्राणायाम भी कर लिये जाते हैं। चूंकि हमारा शरीर सामान्यत: हमेशा चैतन्य नहीं रहता, इसलिए पहले कुछ ऐसे आसन कर लिये जाते हैं, जिससे शरीर में स्फूर्ति, लचीलापन और चैतन्यता आजाय और शारीरिक जड़ता दूर हो जाये। फिर हम कठिन आसन भी करते हैं, तो आसानी से बन जाते हैं। वैसे आप अपनी इच्छा अनुसार आसनों को आगे पीछे भी कर सकते हैं और समयानुसार कम ज्यादा भी कर सकते हैं।</p>



<p class="has-text-align-center wp-block-paragraph"><strong><u>चतुर्थ</u></strong><strong><u> </u></strong><strong><u>अंग</u></strong><strong><u>&#8211; </u></strong><strong><u>प्राणायाम</u></strong><strong><u></u></strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">प्राण ही जीवन है, प्राण ही चेतना है, प्राण ही शक्ति है, प्राण ही सत्य है, प्राण ही औषधि है तथा प्राण ही अंधकार से प्रकाश की ओर लेजाने वाला सशक्त माध्यम है। हमारा शरीर प्राणचेतना से ही संचालित है। प्राणों के बिना जीवन का अस्तित्व ही नहीं है। हमारे शरीर की सभी क्रियायें प्राण के द्वारा ही संचालित हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्राणायाम के माध्यम से हम अपने शरीर के सभी सातों चक्रों को चेतना प्रदान करके तथा अपना पूर्ण आत्मोत्थान करके अपनी दिव्य शक्तियों को हासिल कर सकते हैं। प्राणायाम के द्वारा ही ध्यान और समाधि की अवस्था प्राप्त होती है। हमारे शरीर में पंचप्राणों के द्वारा ही सभी क्रियायें संचालित होती हैं। प्राणायाम के द्वारा ही शरीर के पंचकोषों को जाना और समझा जा सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्राणायाम एक बहुत व्यापक विषय है। समय के साथ प्राणायाम के विषय में एक अलग पुस्तक तैयार करके जनहित में प्रदान की जायेगी। इस शक्तियोग पुस्तक के अन्तर्गत प्राणायाम के विषय में कुछ प्रारम्भिक महत्त्वपूर्ण प्राणायाम व उन्हें करने की विधि का ज्ञान दिया जा रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्राणायाम का अर्थ केवल श्वासों को नियंत्रित करना और उन्हें रोकना ही नहीं है। साधक जब इस सत्य को स्वीकार कर लेता है कि मैं एक अजर-अमर-अविनाशी आत्मा हूँ तथा प्राण ही एक ऐसा माध्यम है, जिससे मैं अपने स्वरूप को जान सकता हूँ, अपनी आत्मा को जान सकता हूँ, तब वह अपने मन को प्राणचेतना में एकाग्र करके अपने आपको प्राण ही समझने का प्रयास करता है। प्राणायाम करते-करते मन सहज एकाग्र होने लगता है। इससे हमारी अंतरकोशिकाएं चैतन्य होजाती हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्राण के प्रथम चरण में पूरक, कुंभक, रेचक और बाह्य कुंभक के क्रम को समझना व प्रारम्भ करना नितांत आवश्यक है। सहज प्राणायाम में यह चार क्रियायें ही होती हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><a href="https://sankalpshakti.com/pranayam/" target="_blank" rel="noreferrer noopener nofollow">प्राणायाम की सम्पूर्ण जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें </a></p>



<p class="has-text-align-center wp-block-paragraph"><strong>पंचम</strong><strong> </strong><strong>अंग</strong><strong>&#8211;</strong><strong>प्रत्याहार</strong><strong></strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रत्याहार अष्टांग योग का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। यह बहिरंग और अंतरंग योग को जोड़ता है, जिसमें हम यम-नियम-आसन का अभ्यास करते हुए, अपने मन को इन्द्रियों के भोग से अलग करने में सफल होते हैं। यहां शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध के प्रभावों से मन अलग हटकर चित्त के साथ अंतरंग योग की तरफ या आत्मतत्व की सहज शक्ति की तरफ आकर्षित होता है तथा अन्नमय कोष से हटकर हमारा प्राणमय कोष से सम्बन्ध स्थापित होता है। यहां हमारी इन्द्रियां अपने सहज स्वभाव को त्यागकर मन के साथ चित्त की एकाग्रता की ओर आकर्षित होती हैं। इसी प्रक्रिया को प्रत्याहार कहते हैं, जहां से हम धारणा की ओर बढ़ते हैं।</p>



<p class="has-text-align-center wp-block-paragraph"><strong>षष्ठ</strong><strong> </strong><strong>अंग</strong><strong>&#8211;</strong><strong> </strong><strong>धारणा</strong><strong></strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">धारणा का तात्पर्य है, किसी चीज़ को धारण करना। अष्टांग योग में धारणा पूर्णतया अंतरंग योग का विषय है, अर्थात् तमोगुण, रजोगुण से हटकर सतोगुण को धारण करना, अर्थात् उस अवस्था की ओर बढऩा, जहां हमारा सत्य से एकाकार होना प्रारम्भ होता है। सामान्यतया हम सदैव भौतिक जगत् की मान्यताओं रीति-रिवाजों, विचारों एवं परम्पराओं को ही धारण किए रहते हैं। इन समस्त विचारों एवं परम्पराओं से बिल्कुल अलग हटकर अंतरंग की सत्यता को धारण करना, उसके प्रति आकर्षित होना अर्थात् एक पूरी विचारधारा से अलग हटकर चेतना की विचारधारा को धारण करना ही धारणा है, जो सही अर्थों में एक नवीन जन्म कहलाता है। यहां हम सभी पूर्वाग्रहों को त्यागकर अपने चित्त में किसी न किसी सत्य के बिन्दु सप्तचक्रों या ऊर्जा को धारण करने की दिशा में बढ़ जाते हैं और हम पूर्ण निर्विकार होकर सत्य को धारण करते हैं, अर्थात् सत्य को स्वीकार कर लेते हैं। यही हमारी धारणा का मूल अभिप्राय है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">धारणा के बाद ही सही मायने में मनुष्य की मुक्तिपथ की यात्रा प्रारम्भ होती है, जहां हमें हर पल सत्य का सान्निध्य प्राप्त होता है, सत्य का ज्ञान प्राप्त होता है। हमारी बुद्धि इस सत्य को स्वीकार कर लेती है कि दृश्य से परे अदृश्य सत्ता ही पूर्ण है, परिपूर्ण है। यहां हमें ज्ञान होता है कि मैं स्थूल शरीर नहीं, एक दिव्य आत्मा हूँ और मेरी विराट्ता व्यापक है, जिसमें आनन्द ही आनन्द है। मगर, साधक को इस बिन्दु पर बहुत सजग होने की आवश्यकता होती है। कई बार कुछ साधक उस सत्य को जानकर भी उसे धारण करके अपनी ही धारणा बना लेते हैं और भौतिक जगत् के बीच छोटी-मोटी अपनी सत्यता की विचारधारा समाज में धर्मगुरु बनकर प्रवाहित करने लगते हैं, जब कि यह विचारधारा पूर्ण नहीं होती। साधक को धारणा के बाद अपनी कुण्डलिनी शक्ति जागरण की लम्बी यात्रा की ओर बढऩा पड़ता है। ध्यान एवं समाधि की सीढिय़ों को पार करते हुए, सत्य से एकाकार करना ही हमारी सच्ची मुक्ति, सच्चा ज्ञान और सच्चा आनन्द होता है, जहां पर कोई भी पतन नहीं होता।</p>



<p class="has-text-align-center wp-block-paragraph"><strong>सप्तम</strong><strong> </strong><strong>अंग</strong><strong>&#8211;</strong><strong>ध्यान</strong><strong></strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">ध्यान का तात्पर्य है कि किसी एक चीज, एक बिन्दु या एक ऐसी विचारधारा पर एकाग्रता करना, जिसे मन और बुद्धि धारण कर रहे हों। यह बाह्य क्रम की एक सहज अवस्था होती है। हम प्राय: देखते हैं कि कई बार साधारण इन्सानों का भी ध्यान किसी न किसी चीज़ पर लग जाता है, जिसमें वह पूरी तरह से खो जाता है, एकाग्र हो जाता है या किसी एक चीज़ पर उसकी ऐसी लगन लग जाती है, जिसमें वह अन्य सभी बातों को भूल जाता है। अनेकों लोग कई कार्यों को बड़े ध्यान के साथ करते हैं, एकाग्रता के साथ करते हैं, उसे भी ध्यान कहते है। मगर, वह सभी ध्यान हमारे सुख-दु:ख, लाभ-हानि इन्द्रियों के सहज स्वभाव से प्रभावित होता रहता है। हम यहाँ पर उस ध्यान की अवस्था की बात कर रहे हैं, जहाँ पर सत्य का बोध होता है तथा स्वयं का बोध होता है कि मैं कौन हूँ। वस्तुत: कुण्डलिनी चेतना की ऊर्जा का साक्षात्कार या आत्मसाक्षात्कार की प्रथम अवस्था ही ध्यान है, जो क्रमिक रूप से प्राप्त होता है। जितना हम यम-नियमों का ढृढ़ता से पालन करते हैं, उतना हमारे शरीर का संतुलन बनने लगता है, आसन में दृढ़ता आने लगती है, उतना ही हमारा प्राणतत्व सक्रिय होने लगता है और उतनी ही हमारी पकड़ प्राणों पर मजबूत होने लगती है। जितना हमारे प्राण चैतन्य रहेंगे, प्राणचेतना सुचारु रूप से कार्य करेगी, उतना ही हमारा प्रत्याहार सधने लगेगा तथा हम बाह्य इन्द्रियों को अपने वशीभूत करने में सफल होने लगेंगे। इससे हमारा मन सतोगुणी होकर सत्य की तरंगों की ओर आकर्षित होने लगता है और हमारी बुद्धि हमें चित्त की एक ऐसी अवस्था की ओर लेजाती है, जहाँ हम अंतरंग योग में पहुँचकर सत्य को धारण करने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं। हमारे मन व बुद्धि पर आत्मचेतना की तरंगों का आकर्षण होने लगता है और हमें अपने सहज स्वरूप का ज्ञान होने लगता है। हम अपने समस्त भय-शोक, लाभ-हानि से ऊपर उठकर उस अवस्था का स्पर्श करने लगते हैं, जिसे आत्मसाक्षात्कार कहते हैं। यहाँ हम सत्य को जिस रूप में धारण करते हैं, वहीं पर हमारा चित्त एकाग्र होने लगता है। हम एक चेतना के आकर्षण में बंध जाते हैं, अर्थात् ध्यान लगाना नहीं पड़ता। जहाँ ध्यान स्वयं लगने लगे, वहीं सच्चा आत्मसाक्षात्कार का प्रारम्भ है। यहाँ से हम अपनी कुण्डलिनीचक्रों की ओर आकर्षित होने लगते हैं। उसी अवस्था को ध्यान कहते हैं, जहाँ अन्य कोई भाव-विचार स्पर्श नहीं करते। यद्यपि ध्यान की अलग-अलग कई अवस्थायें होती हैं, मगर यहाँ पर ध्यान के प्रारम्भिक स्वरूप का ही वर्णन किया जा रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ध्यान में जाने के लिये हमारे शरीर के सात चक्रों में सबसे महत्त्वपूर्ण चक्र आज्ञाचक्र है, जिस पर ध्यान लगाकर हम भौतिक जगत् की भी उपलब्धियों को प्राप्त कर सकते हैं व अंतरंग योग में उतरकर आत्मसाक्षात्कार कर सकते हैं। आज्ञाचक्र को राजाचक्र कहा गया है। यह चक्र हमारी बुद्धि का, ज्ञान का चक्र कहा जाता है। अत: नित्यप्रति आज्ञाचक्र पर ध्यान लगाने से क्रमश: ध्यान की अवस्था ढृढ़ होते-होते आत्मसाक्षात्कार होजाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ध्यान की गहराई में डूबने के लिये साधक को अपने तन-मन और बुद्धि को निर्मल और पवित्र बनाना पड़ता है। तब कहीं जाकर वह अंतरंग योग में प्रवेश कर सकता है, अन्यथा उसका ध्यान बाह्य जगत् के कुछ छोटे-मोटे लाभों तक सीमित रह जाता है। मन की कुछ संतुष्टि, कुछ अनुभूतियों को ही साधक प्राय: अपनी बहुत बड़ी उपलब्धि मान लेता है और इसी से कई बार उसका पतन शुरू होजाता है। अंतरंग योग की गहराई में प्रवेश करने के लिये, आत्मसाक्षात्कार के लिये एक चेतनावान् अनुभवी, सिद्ध, पूर्ण योगी गुरु की आवश्यकता होती है। वही अपने आशीर्वाद व मार्गदर्शन से साधक को गहराई या उच्चता की ओर लेजा सकता है। ध्यान की गहराई मे डूबने के लिये स्थान, आसन एवं वातावरण अत्यंत मायने रखते हैं, क्योंकि जब हम ध्यान की गहराई में प्रवेश करते हैं, तो हमारे मन और बुद्धि आंशिक रूप से अपना कार्य करते रहते हैं। कई बार कुछ क्षण के लिये हमारा ध्यान लगेगा और फिर छूट जायेगा। कुछ क्षण हमें पूर्ण सत्य की अनुभूति होगी कि मैं एक अलौकिक दिव्यता से जुड़ रहा हूँ, जो मेरे अंदर ही समाहित है। मगर, प्रारम्भ में हम बहुत समय तक उसमें डूबकर नहीं रह सकते। धीरे-धीरे ही हमारे शरीर की पात्रता बढ़ती है। जितना हमारी सुषुम्ना नाड़ी के चक्रों की चैतन्यता बढ़ती है, उतना ही हमको ध्यान में सत्य का सान्निध्य प्राप्त होता है। एक प्रबल लगन, निष्ठा, विश्वास व समर्पण हमें धीरे-धीरे ध्यान की गहराई में ले जाता है और हमारी ध्यान में पकड़ पूर्ण होने लगती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पात्रता होने के बावजूद ध्यान में बैठने पर इन्द्रियाँ आंशिक रूप से मन को कई बार कुछ क्षणों के लिये बाहर की ओर लेजाती हैं। उस समय हमें बहुत सजग रहने की आवश्यकता होती है। हम किसी ऐसे चिंतन पर मन को न लेजायें, जहाँ डर हो या खौफ हो। सामान्य अवस्था में हम चाहे जो भी सोचते रहें, हमें कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता। कई बार लोग आँख बंद करके निरर्थक बातों को सोचते रहते हैं, मगर उससे उन्हें समय की बर्बादी के अतिरिक्त किसी प्रकार की क्षति होने का भय नहीं रहता। मगर, जब अंतरंग योग के ध्यान में प्रवेश करते हैं, तो बहुत सजगता की आवश्यकता होती है, क्योंकि वास्तव में हम प्राणशक्ति के माध्यम से स्थूल शरीर के भान से अलग होते हैं, जहाँ हमें अपने स्थूल शरीर की क्षमताओं का भान समाप्त सा होने लगता है। उस समय हमारे मन की अवस्था बहुत निर्बल और कमजोर होती है। उन क्षणों पर यदि आप का ध्यान ऐसी बातों पर चला जाये कि जैसे ऊँचाई से ढलान की भूमि पर उतर रहे हैं, तो उस समय आपका ध्यान केवल छूटता नहीं हैं, बल्कि एक झटका सा लगता है फिसलकर गिरने का। और, इस झटके से ध्यान छूट जायेगा। इस तरह के विचारों पर जब हमारा थोड़ा सा भी मन चला जाता है, तो उस समय हमारे स्थूल की क्षमता शून्यवत् होती है। उस समय हमारे शरीर की अवस्था छोटे शिशु के समान होजाती है, जिसने केवल अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है। वह बहुत सम्भलकर धीरे-धीरे चल पाता है। उस बच्चे की भी वही अवस्था होती है। यदि उसे ऊँची-पतली मेड़ पर खड़ाकर दिया जाये, तो डगमगाकर गिर जायेगा। वही हमारी मन:स्थिति ध्यान के समय होती है कि ऐसे चिन्तनों से कई बार मन-मस्तिष्क पर तीव्र झटके लग जाते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यदि शारीरिक व मानसिक मजबूती न हो तथा गुरु और इष्ट की कृपा न हो, तो कई बार साधक मानसिक असंतुलन का शिकार भी होजाता है। इसलिये सजगता बहुत आवश्यक है। ध्यान की अवस्था ही एक ऐसी अवस्था होती है, जो हमें सत्य से जोड़ती है। इस अवस्था में साधक का संतुलन बहुत ही आवश्यक होता है। साधक को ऐसे ऊँचे आसन पर बैठकर ध्यान नहीं लगाना चाहिये, जहाँ पर गिरकर चोट लगने का डर हो। अन्यथा, यह मानसिक एहसास भी साधक को ध्यान की गहराई में जाने पर भय पैदा करता है। ये सभी बिन्दु बहुत ही विस्तार एवं अनुभव के हैं कि हम ध्यान की किन अवस्थाओं में किस तरह के विचार बनायें? जीवन का संतुलन कैसा हो? इन सभी बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। इस समय यहाँ पर बहुत संक्षिप्त सा चिंतन दिया गया है। भविष्य में ध्यान की सभी अवस्थाओं में मार्गदर्शन के लिये अलग से एक पुस्तक तैयार करके साधकों को उपलब्ध कराई जायेगी। अंतरंग योग का ध्यान सहज नहीं है। चूंकि इसमें एक पक्ष से दूसरे पक्ष में&nbsp; प्रवेश करते हैं, अत: संतुलन ही हमारा मूल सहारा बनता है। अत: ऐसी अवस्था के साधक गुरु मार्गदर्शन अवश्य प्राप्त करें।</p>



<p class="has-text-align-center wp-block-paragraph"><strong>अष्टम</strong><strong> </strong><strong>अंग</strong><strong>&#8211;</strong><strong>समाधि</strong><strong></strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">ध्यान की पराकाष्ठा का दूसरा नाम समाधि ही है। यह एक ऐसी अवस्था है, जहां पर हम स्वयं के सत्य पर केन्द्रित होकर आत्मसाक्षात्कार की दिशा में स्थिर हो जाते हैं। ध्यान में हमें आंशिक रूप से इस चीज़ का भान बना रहता है कि मैं ध्यान कर रहा हूँ। किस तरह कर रहा हूँ, किस माध्यम से कर रहा हूँ और किसका कर रहा हूँ? अर्थात् कर्ता, क्रिया और कर्म का भान बना रहता है। मगर, समाधि एक ऐसी अवस्था है, जहां साधक, साधन और साध्य एक रूप होजाते हैं, अर्थात् आत्मस्वरूप होजाते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">समाधि की प्रारम्भिक अवस्था को शून्यता की अवस्था भी कहा गया है- एक ऐसी न्यूट्रल अवस्था, जहां पर हम अपनी इन्द्रियों, मन और बुद्धि के सभी क्रियात्मक पक्षों के भान को ही भूल जाते हैं। समाधि वहीं से प्रारम्भ होती है, जो हमारी पूर्ण आत्मसाक्षात्कार की यात्रा है और उसमें भी अलग-अलग कई अवस्थायें हैं। मगर, यहां पर साधकों को इतना ही जान लेना पर्याप्त है कि समाधि की अवस्था में भी सबीज और निर्बीज समाधि होती है। जब हम निर्बीज समाधि को प्राप्त कर लेते हैं, तो वही हमारी पूर्ण मुक्ति की अवस्था होती है, जहां से हमारा पतन नहीं होता।</p>



<p class="wp-block-paragraph">समाधिस्थ सिद्धसाधक को भी बहुत संतुलित जीवन जीना चाहिए। उसे यह नहीं मान लेना चाहिए कि मैं समाधिस्थ सिद्धसाधक हूँ, तो मैं चाहे जैसा जीवन जिऊँ, समाधि पर मेरी पकड़ बनी रहेगी! चूंकि कोई भी साधक हमेशा समाधि में नहीं रहता, उसे सामाजिक जीवन जीना पड़ता है, इसलिए उसे अपनी सद्बुद्धि के द्वारा हर अच्छे-बुरे कर्म का निर्णय करके सदैव सन्मार्ग पर ही चलना चाहिए, अन्यथा समाधि प्राप्त करने की क्षमताएं कब नष्ट हो जायें, कुछ कहा नहीं जा सकता। अत: यदि सत्य से जुड़े रहना है, तो सत्यपथ पर चलकर सत्कर्म करना होगा। जो उच्चकोटि के मुक्तिपथ के अभिलाषी साधक होते हैं, वे अधिकांशतया लम्बे समय तक समाधिस्थ रहते हैं, मुक्तिपथ ही उनकी मात्र यात्रा होती है और समाज से उनका कोई सरोकार नहीं रहता। जब वे पूर्णत्व से अपनी प्रकृतिसत्ता से एकाकार कर लेते हैं, उसी के बाद कहा जा सकता है कि फिर उनका कभी भी पतन नहीं होता।</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in/ashtang-yogs/">अष्टांग योग क्या है? Ashtang Yog Sampurn Jankari</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in">संकल्प शक्ति</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://sankalpshakti.in/ashtang-yogs/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>योग का प्रारम्भ एवं आवश्यक सावधानियां</title>
		<link>https://sankalpshakti.in/start-yoga/</link>
					<comments>https://sankalpshakti.in/start-yoga/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 17 May 2022 04:39:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[योग जगत]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://sankalpshakti.com/?p=1258</guid>

					<description><![CDATA[<p>योग को पूर्णत्व के रूप में समझना चाहिए कि योग ही शक्ति है और शक्ति ही योग है। जड़-चेतन-जीव तथा इस सम्पूर्ण सृष्टि का और इस सृष्टि की जननी माता आदिशक्ति जगज्जननी जगदम्बा का सम्बन्ध ही योग है। सृष्टि का प्रारम्भ ही जगज्जननी ने योग बल से किया है। अत: जब से यह सृष्टि है, [&#8230;]</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in/start-yoga/">योग का प्रारम्भ एवं आवश्यक सावधानियां</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in">संकल्प शक्ति</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">योग को पूर्णत्व के रूप में समझना चाहिए कि योग ही शक्ति है और शक्ति ही योग है। जड़-चेतन-जीव तथा इस सम्पूर्ण सृष्टि का और इस सृष्टि की जननी माता आदिशक्ति जगज्जननी जगदम्बा का सम्बन्ध ही योग है। सृष्टि का प्रारम्भ ही जगज्जननी ने योग बल से किया है। अत: जब से यह सृष्टि है, तभी से योग है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">योग की मूल शक्ति माता आदिशक्ति जगज्जननी जगदम्बा हैं, उसके देव ब्रह्मा-विष्णु-महेश हैं और उसके ऋषिश्रेष्ठ स्वामी सच्चिदानन्द जी महाराज हैं। सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर अब तक हर काल परिस्थिति में योग किसी न किसी रूप में मानव जीवन में समाहित रहा है। अनेकों ऋषि-मुनियों ने योग को अपने-अपने तरीके से स्थापित किया है, मगर उसका मूल स्वरूप लगभग एक समान ही रहा है। महर्षि पतंजलि ने योग को व्यापकता प्रदान की, जो वर्तमान समय में सभी प्रक्रियाओं का मूल लक्ष्य रहा है। कुण्डलिनी के सातों चक्रों को जाग्रत् करके तथा आत्मचेतना को प्राप्त करके आत्मा की जननी मूल सत्ता से एकाकार करना योग है। योग का स्वरूप व्यापक है, मगर उसके मूल सार को अष्टांग योग में पिरोने का प्रयास किया गया है, जो प्रवाह के रूप में जन-जन तक पहुंच रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वर्तमान काल में मनुष्य जिन विषम परिस्थितियों में घिर चुका है, उनमें अष्टांग योग सबसे सशक्त माध्यम है। इक्कीसवीं सदी को यदि योग व अध्यात्म की सदी कहा जाय, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व में सैकड़ों धार्मिक संस्थानों से योग का प्रवाह जनमानस तक पहुंच रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>आवश्यक सावधानियां</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">योग पथ पर चलने के लिए योग के प्रति पूर्ण निष्ठा, विश्वास और समर्पण की आवश्यकता होती है। स्वयं के द्वारा स्वयं के प्रति वचनबद्धता के साथ ही एक योग्य चेतनावान् गुरु की आवश्यकता होती है, जो योग में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे मनुष्य की आयु व उसकी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार उचित मार्गदर्शन कर सके।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>योगासनों के लिए निम्न बातों का ध्यान रखें-</strong></p>



<ol class="wp-block-list" type="1">
<li>आसन के लिए समय का महत्त्व सबसे अधिक होता है। आसन ऐसे समय पर करें, जब मौसम सामान्य रूप से हल्का ठण्डा हो। अत्यधिक गर्म वातावरण में आसन नहीं करना चाहिए। सुबह-शाम का समय आसन करने के लिए सबसे उपयुक्त होता है।</li>



<li>आसन करते समय बहुत कसे और तंग वस्त्र नहीं पहनने चाहिएं। वस्त्र ऐसे हों, जिन्हें पहनकर आसन करने में असुविधा न हो।</li>



<li>आसन करने के समय पेट अधिक से अधिक खाली हो, तो ज्यादा अच्छा होता है।</li>



<li>आसन के लिए समतल भूमि हो व बिछौना जैसे-दरी, चद्दर या हल्के पतले गद्दे, कम्बल उपयुक्त होते हैं।</li>



<li>आसन अपने अंदर पूर्ण प्रसन्नता व चैतन्यता का भाव लेकर करना चाहिए।</li>



<li>किसी भी आसन को सीखने के लिए धैर्यता के साथ नित्यप्रति धीरे-धीरे अभ्यास को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। हठपूर्वक एक दिन में ही किसी भी आसन को करने का प्रयास नहीं करना चाहिए।</li>



<li>आसन करते समय बीच में बार-बार पानी का सेवन नहीं करना चाहिए। बहुत आवश्यकता महसूस होने पर थोड़ी मात्रा में जल लिया जा सकता है।</li>



<li>आसन प्रारम्भ करने से पहले नाक साफ कर लेना चाहिए व मलमूत्र आदि का त्याग कर लेना चाहिए।</li>



<li>आसन के प्रारम्भ में कुछ सहज प्राणायाम की क्रियायें कर लेना चाहिए व सरल आसनों से शुरूआत करना चाहिए, जिससे शरीर में प्राणवायु प्रभावक होकर शारीरिक चैतन्यता आजाय। उसके बाद कोई भी आसन किये जा सकते हैं।</li>



<li>आसन क्रोध, आवेश, तनाव व ज्यादा दु:ख-कष्ट की स्थिति में नहीं करने चाहिएं। योग संतुलन बनाकर शारीरिक क्षमता के अनुसार ही करें।</li>



<li>बुखार आदि किसी विशेष तकलीफ में आसन न करें।</li>



<li>किन्हीं कठिन रोगों से ग्रसित होने पर किसी योग्य चिकित्सक के परामर्श के बाद ही योगासन प्रारम्भ करना चाहिए।</li>



<li>योगासन करते समय निरर्थक बातचीत नहीं करना चाहिए। जो आसन कर रहे हों, उसी में मन की एकाग्रता रखने से आसन फलदायी बन जाते हैं।</li>



<li>योगासन शौचक्रिया आदि से निवृत्त होकर स्नानादि करके करने में ज्यादा हल्कापन महसूस होता है। आवश्यकतानुसार स्नान करने से पहले भी कर सकते हैं।</li>



<li>आसन किसी उद्यान, खुले वातावरण या किसी स्वच्छ जगह में करें, जहां वायु का अधिक से अधिक आना-जाना हो सके।</li>



<li>योगासन पूर्ण करने के बाद कम से कम 15 मिनट तक कोई भोजन न करें, तो ज्यादा अच्छा है। योगासन के वक्त यदि अत्यधिक पसीना आ रहा हो, तो तुरंत स्नान न करें।</li>



<li>गर्भवती महिलायें यदि तीन माह की अवस्था हो गई हो, तो आसन बिल्कुल न करें। किसी योग्य प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में सहज अवस्था में किये जाने वाले आसनों को कर सकती हैं।</li>



<li>यदि किसी के पेट, किडनी, ब्रेन, हार्ट या कोई भी बड़ा ऑपरेशन हुआ हो, तो छ: माह तक योगासन न करें। उसके बाद चिकित्सक की सलाह लेकर योग प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में ही करें।</li>



<li>एक साल से कम उम्र के बच्चों को आसन बिल्कुल भी न करवायें। 1-2 साल के बच्चों को सावधानीपूर्वक सरल आसन योग प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में करायें।</li>
</ol>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in/start-yoga/">योग का प्रारम्भ एवं आवश्यक सावधानियां</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in">संकल्प शक्ति</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://sankalpshakti.in/start-yoga/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>सन्दर्भ- संध्या शुक्ला (योगसाधिका, ज्योतिषाचार्य)</title>
		<link>https://sankalpshakti.in/sandarbh-sandhya-shukla/</link>
					<comments>https://sankalpshakti.in/sandarbh-sandhya-shukla/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 17 May 2022 04:35:17 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[योग जगत]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://sankalpshakti.com/?p=1255</guid>

					<description><![CDATA[<p>सभी पाठकों, &#8216;माँ’ के भक्तों और योग साधकों को जय माता की, जय गुरुवर की! मेरे जीवन का यह एक बड़ा सौभाग्य है कि धर्मसम्राट् युग चेतना पुरुष सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के पास बैठकर मुझे योग की इस पुस्तक को तथा उनके निर्देशनों एवं विचारों को लिखने का अवसर प्राप्त हुआ। [&#8230;]</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in/sandarbh-sandhya-shukla/">सन्दर्भ- संध्या शुक्ला (योगसाधिका, ज्योतिषाचार्य)</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in">संकल्प शक्ति</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="has-text-align-center wp-block-paragraph"><strong>सभी पाठकों, &#8216;माँ’ के भक्तों और योग साधकों को जय माता की, जय गुरुवर की!</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">मेरे जीवन का यह एक बड़ा सौभाग्य है कि धर्मसम्राट् युग चेतना पुरुष सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के पास बैठकर मुझे योग की इस पुस्तक को तथा उनके निर्देशनों एवं विचारों को लिखने का अवसर प्राप्त हुआ। मुझे यह पहली पुस्तक लिखने का सुअवसर गुरुदेव जी ने प्रदान किया है, इसलिए यह और भी महत्त्वपूर्ण है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">गुरुदेव जी ने योग की इस पुस्तक में जीवनोपयोगी आसनों को व उसके साथ ही अष्टांग योग एवं अन्य महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं पर अपने विचार लिखवाये हैं। इसी अंतराल में योग-ध्यान-साधना की कुछ गूढ़तम रहस्यमयी जानकारियां भी मेरी जिज्ञासानुसार गुरुदेव जी मेरे सामने स्पष्ट करते रहे हैं। इस पुस्तक में उन रहस्यों की जानकारी तो नहीं दी गई है, क्योंकि यहां पर उन सब बातों का वर्णन करना आवश्यक नहीं है। किन्तु, मैंने इस बात को गहराई से महसूस किया है कि जीवन में गुरुमार्गदर्शन नितांत आवश्यक है। मैंने स्वयं गुरुमार्गदर्शन में यौगिक क्रियाओं को सीखने का सौभाग्य प्राप्त किया है। वर्तमान समय में मनुष्य के लिए योग पथ पर चलना नितांत आवश्यक है। हर काल में जब-जब भी अनीति-अन्याय-अधर्म अपनी चरम सीमा पर पहुंचता है, तब परमसत्ता माता आदिशक्ति जगज्जननी जगदम्बा अपने चेतना अंशों को भेजती हैं, जो सत्यधर्म की स्थापना करके भटकी हुई मानवता को सत्यपथ की राह दिखाते हैं और समाज में सुख-शांति समृद्धि की स्थापना करते हैं। वर्तमान समय में भी वही प्रक्रिया समाज के बीच चल रही है, जिसके अंतर्गत परमसत्ता की कृपा से सिद्धाश्रम सिरमौर योगेश्वर स्वामी सच्चिदानन्द जी महाराज इस धरती पर परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के रूप में समाज के बीच मौजूद हैं। वे एक महान् तपस्वी ऋषि हैं, जिन्होंने सम्पूर्ण विश्व आध्यात्म जगत् को अपने साधनात्मक तपबल की चुनौती दी है। वे एक बहुत ही सामान्य एवं सादगीपूर्ण साधनात्मक जीवन जीते हैं। वर्तमान में भी परम पूज्य सद्गुरुदेव जी महाराज चौबीस घण्टे में मात्र चार घण्टे का ही विश्राम करते हैं तथा शेष समय साधनात्मक एवं जनकल्याण के क्रमों में व्यतीत करते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वर्तमान में उन्होंने इस घोर कलियुग में लाखों शक्ति साधकों के साथ सतयुग की स्थापना का महाशंखनाद किया है तथा समाज को नशे-मांस से मुक्त चरित्रवान् एवं चेतनावान् बनाकर मानवता की सेवा, धर्मरक्षा व राष्ट्ररक्षा के लिए अग्रसर किया है। सौभाग्यशाली होंगे वे लोग, जो एक चेतनावान् ऋषि के सान्निध्य एवं मार्गदर्शन में आगे बढ़ सकेंगे। आशा है योग की यह पुस्तक पाठकों को चेतनावान् बनाने में सहायक सिद्ध होगी।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8211; संध्या शुक्ला<br>(योगसाधिका, ज्योतिषाचार्य)</strong></p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in/sandarbh-sandhya-shukla/">सन्दर्भ- संध्या शुक्ला (योगसाधिका, ज्योतिषाचार्य)</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in">संकल्प शक्ति</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://sankalpshakti.in/sandarbh-sandhya-shukla/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>आशीर्वचन-परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज</title>
		<link>https://sankalpshakti.in/aashirvachan/</link>
					<comments>https://sankalpshakti.in/aashirvachan/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[संकल्प शक्ति]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 14 May 2022 04:46:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[योग जगत]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://sankalpshakti.com/?p=1059</guid>

					<description><![CDATA[<p>मानव शरीर दिव्य शक्तियों से परिपूर्ण है, जिसे देवता भी प्राप्त करने के लिए तरसते हैं। यह बात अतिशयोक्तिपूर्ण लगती है, मगर यही पूर्ण सत्य है। क्योंकि, मनुष्य के पास ही वह मार्ग है कि वह कर्म करता हुआ, अपने सातों चक्रों को जाग्रत् करके ऋषित्व के मार्ग में बढ़ सकता है और परमसत्ता से [&#8230;]</p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in/aashirvachan/">आशीर्वचन-परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in">संकल्प शक्ति</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">मानव शरीर दिव्य शक्तियों से परिपूर्ण है, जिसे देवता भी प्राप्त करने के लिए तरसते हैं। यह बात अतिशयोक्तिपूर्ण लगती है, मगर यही पूर्ण सत्य है। क्योंकि, मनुष्य के पास ही वह मार्ग है कि वह कर्म करता हुआ, अपने सातों चक्रों को जाग्रत् करके ऋषित्व के मार्ग में बढ़ सकता है और परमसत्ता से एकाकार होकर दिव्य लोक का वासी बन सकता है, जो देवताओं के लिए दुर्लभ है। देवता बनना आसान है, मगर पूर्ण ऋषित्व को प्राप्त करना बहुत कठिन है। देवत्व सदा ऋषित्व के आधीन होता है। आज वही मानव जीर्ण-शीर्ण, रोगग्रस्त, असहाय, निष्क्रिय, भयग्रस्त, तनावों और समस्याओं से ग्रसित होकर दैहिक, दैविक और भौतिक तापों में जल रहा है। इसका मूलकारण है, उसका अपने मूलस्वरूप से दूर होना और इन्द्र्रियों को भौतिक जगत् के आधीन कर देना। पराधीन मनुष्य कभी सुखी नहीं रह सकता, जबकि वह पराधीनता नश्वर जगत् से जुड़ी हुई हो। और, इन्द्रियों के आधीन जीवन जीने वाला मनुष्य सत्य का ज्ञान प्राप्त कभी भी नहीं कर सकता। वर्तमान में मनुष्य भौतिक जगत् की उपलब्धियों से तृप्ति पाना चाहता है। आत्मा का सहज स्वभाव है, आनन्द की प्राप्ति और आनन्द भौतिक जगत् से प्राप्त हो नहीं सकता। वह तो शक्ति के सान्निध्य से ही प्राप्त होता है।<br>इन विषम परिस्थितियों में घिरे हुए मनुष्य के पास सिर्फ एकमात्र मार्ग है कि उसे वर्तमान को संवारना पड़ेगा, सत्यपथ का राही बनना पड़ेगा और गुरु की शरण में जाना होगा, उसे भक्ति, ज्ञान व आत्मशक्ति के पथ पर बढऩा ही होगा और इन सब के लिए हमारे शरीर का स्वस्थ होना नितांत आवश्यक है। जीर्ण-शीर्ण शरीर से न तो भक्ति हो सकती है, न तो ज्ञानार्जन और न ही आत्मशक्ति की प्राप्ति हो सकती है। अत: यदि मनुष्य अपना भला चाहता है, तो उसे शक्तियोग एवं धर्म के पथ पर चलना पड़ेगा। हमारे ऋषि-मुनियों ने भी इसी पथ पर चलकर अपने पूर्णत्व को प्राप्त किया है। हमें भी योगमार्ग पर चलना होगा। योग का तात्पर्य है, जोडऩा। जो जड़ को चेतन बना सके, अंधकार में प्रकाश ला सके तथा निष्क्रिय को सक्रिय कर सके। मगर, इसके लिए भी साधक के अंदर इच्छाशक्ति का होना नितांत आवश्यक है।<br>मनुष्य की इच्छाशक्ति संकल्प शक्ति में बहुत बड़ी ताकत होती है। अपनी संकल्प शक्ति के बल पर मनुष्य असंभव को भी संभव बना लेता है। वर्तमान में विज्ञान ने इतनी तरक्की की है कि हम अन्य ग्रहों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। ज्ञान से विज्ञान की उत्पत्ति होती है, न कि विज्ञान से ज्ञान की। विज्ञान भौतिक जगत् में ही सफलता अर्जित कर सकता है। आध्यात्मिक सफलता और अपने &#8216;मैं’ की खोज केवल ज्ञान और धर्म पथ पर चलकर ही संभव है।<br>वर्तमान में मनुष्य की जीवन शैली पतन की चरम सीमा पर है। उसका आहार-विचार और व्यवहार तमोगुणी और रजोगुणी है तथा शारीरिक श्रमशक्ति क्षीण हो चुकी है। मनुष्य शारीरिक अंगों का बहुत कम उपयोग कर रहा है, जिसके फल स्वरूप उसकी शारीरिक जड़ता और रोगों की वृद्धि हो रही है। हमारे ऋषि-मुनियों ने इसी जड़ता और रोगमुक्ति, &#8216;मैं’ की खोज और मुक्ति के लिए योग मार्ग के अन्तर्गत अष्टांग योग की जानकारी दी है। अत: वर्तमान में मनुष्य यदि स्वस्थ जीवन, मन और बुद्धि चाहता है, सुख-शान्ति-समृद्धि चाहता है, तो इस पथ पर चलना ही होगा। इस पुस्तक में आवश्यक सभी प्राणायाम व आसनों के साथ ही आवश्यक व्यायाम की भी क्रियाओं जोड़ा गया है। यम, नियम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि का भी संक्षिप्त वर्णन किया गया है। कुण्डलिनी रहस्य व त्राटक आदि की भी संक्षिप्त जानकारी दी गई है। साधक को योगमार्ग साधनापथ पर चलकर अपनी इन्द्रियों का संयमन कर ध्यान और समाधि की ओर बढऩे की लालसा होनी चाहिए। इस मार्ग पर चलने वालों को उतावलापन नहीं होना चाहिए। धैर्य के साथ दृढ़ इच्छाशक्ति लेकर बढऩे वाला व्यक्ति सफलता अवश्य प्राप्त करता है।</p>



<p class="has-text-align-center wp-block-paragraph"><strong>शक्ति का अर्जन ही योग है, शक्ति का विसर्जन ही भोग है।<br>शक्ति का उपयोग ही जीवन, शक्ति का उपभोग ही मृत्यु है।</strong></p>
<p>The post <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in/aashirvachan/">आशीर्वचन-परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज</a> appeared first on <a rel="nofollow" href="https://sankalpshakti.in">संकल्प शक्ति</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://sankalpshakti.in/aashirvachan/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>
